फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सविता देवी और पंडित रविशंकर: गुरु की भूमिका में पंडित जी

विज्ञापन
पंडित रविशंकर का कलात्मक सौंदर्य बोध उच्च कोटि का था। - फोटो : file photo
विज्ञापन

तक़रीबन छः - सात वर्ष पूर्व भारतवर्ष से मीलों दूर शाम के समय प्रशांत महासागर के तट पर फीजिलैंड के 'सुवा' शहर में मैं अपनी गुरु विदुषी सविता देवी (जिन्हें, मैं मां ' संबोधित करती हूं ) के साथ बैठी हुई थी। उस शाम मां गुरु- शिष्य परम्परा के बारे में कुछ बता रही थीं। कहने लगीं कि जिस समय 'गुरु साक्षात् परब्रह्मः ' का मतलब आत्मसात् कर लोगी तब इस रिश्ते का निर्वाह करना भी आ जाएगा। मैं निःशब्द उन्हें सुन रही थी। गुरु के प्रति समर्पण और गुरु में विश्वास बहुत आवश्यक है। आज के समय में इस रिश्ते में थोड़ा परिवर्तन आ गया है।

विज्ञापन


आप सभी जानते हैं कि विदुषी सविता देवी स्वयं बनारस घराने की एक हस्ताक्षर गायिका थीं और ठुमरी साम्राज्ञी पद्मश्री स्वर्गीया सिद्धेश्वरी देवी की पुत्री थीं। ठुमरी उन्होंने अपनी मां से सीखी और सितार की शिक्षा सितार सम्राट भारत रत्न पंडित रविशंकर जी से ली थी। वे पंडितजी की गंडाबंध शिष्या थीं। वे दिल्ली विश्वविद्यालय में सितार की विभागाध्यक्ष भी थीं। इस प्रकार वे दो-दो विधाओं में पारंगत थीं।

मैं मनोविज्ञान की छात्रा रही हूं तो चीजों को देखने का मेरा नजरिया भी भिन्न है। मैंने उनसे कौतूहलवश पूछा कि मां आप तो दो विधाओं में पारंगत है। आपकी गुरु और मां के बारे में तो हम सुनते रहते हैं पर आज आप पंडितजी के बारे में बताएं कि शिक्षण प्राप्ति में गुरु के रूप में आपके व्यक्तित्व पर उनका क्या प्रभाव पड़ा ? उन्होंने कुछ सोंचते हुए कहा कि हां मां तो गुरु थीं पर पंडितजी की छाप भी मुझपर बहुत आई। वे बड़े ही अनुभवी और जानकार गुरु थे।
विज्ञापन


 

पंडित जी कहते थे मनुष्य को अपने संघर्षो से सीखना चाहिए। - फोटो : file photo
कला का प्रचार-प्रसार 
भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रचार-प्रसार के लिए करीब-करीब उन्होंने पूरे विश्व का भ्रमण किया और बड़े-बड़े कलाकारों के साथ काम किया और कईयों को विदेश में शिक्षा भी दी। उस समय हिन्दुस्तान में सभागारों में इतने कार्यक्रम नहीं होते थे। ज्यादातर कार्यक्रम राजा-महाराजाओं के दरबार में होता था या जमींदारों और धनी लोगों के घरों में महफिलों के रूप में। पंडित जी ने इस संगीत को मंच तक लाने में बहुत मेहनत की। मंच पर प्रस्तुति देने का एक विशेष तौर-तरीका होता है।

उनका 'सौंदर्यबोध' बहुत परिष्कृत था। वे कहते थे कि कलाकारों के जीवन में सौंदर्य का होना बहुत जरूरी है। श्रोता आपसे कुछ विशेष अपेक्षाएंं रखते हैं। आपका वेशभूषा , आपके बोलने का तरीका, उठने-बैठने का ढंग, अभिवादन का तरीका बहुत कुछ। इन सबको उत्कृष्ट बनाने के लिए मंच पर समुचित लाइट की व्यवस्था, कलाकार और साजिंदो के बैठने का स्थान, अच्छा माइक्रोफोन आदि सभी कुछ उच्च कोटि का होना चाहिए। ये सब तो भौतिक चीजें हैं। इसके अलावा कलाकार के चेहरे का हाव-भाव, उसकी मनः स्थिति और श्रोताओं से जुड़ने की कला सब बहुत जरूरी है। पूरे कार्यक्रम में श्रोता गण आपको देखते रहते हैं तो प्रस्तुति देते समय आपको सचेत रहना है कि कार्यक्रम में श्रोताओं की रुचि बनी रहे।

वे कहते थे कि कलाकार का मंच ऊंचा होना चाहिए। वे कार्यक्रम के दौरान श्रोताओं को भी कार्यक्रम सुनने का तरीका सिखाने कि हर वक़्त कोशिश करते और जोर से बोलकर तारीफ़ नहीं करते या जब-तब तालियां नहीं बजाते इससे कलाकार और साजिंदे दोनो को परेशानी होती है। पर सही समय पर वाह-वाही जरूर करनी चाहिए, ये हौसला अफ़ज़ाई या प्रेरणा का बहुत बड़ा सोत्र होता है।

पश्चिमी देशों से उन्होंने काफी कुछ सीखा था। फिर भी हर देश की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति भी अलग-अलग होती है। मनोवैज्ञानिक भाषा में कहा जाए तो पंडितजी का 'ऐस्थेटिक कोशेंट ' (सौंदर्यलब्धि) बहुत ही उच्च दर्जे का था। उनका व्यक्तित्व बहुत ही आकर्षक था। उनकी शिष्या सविताजी का व्यक्तित्व भी बहुत आकर्षक था और वे भी इन सब बातों पर ध्यान देती थीं।

मनोवैज्ञानिक स्वार्ट्ज एवं फाउट ने (2003) में कहा था कि विशेष प्रकार की संगीत में रुचि से व्यक्ति के व्यक्तित्व के बारे में अनुमान लगाया जा सकता है। सविता जी आगे खुद ही पंडितजी के बारे में बताती हैं जो उपरोक्त वैज्ञानिकों के विचार से काफी मेल खाता है- वे अपने शिष्यों से कहते थे कि रागों के चयन, उसके विस्तार के तरीके और प्रस्तुति के अंदाज से एक कलाकार के व्यक्तित्व का पता चलता है।

फिर मैंने पूछा वे कभी - कभी निराश भी होते होंगे ? तब उन्होंने कहा अपने मनोभाव को शिष्यों के साथ बहुत नियंत्रित रखते थे। और कभी - कभी कहते कि एक इंसान या एक कलाकार के जीवन और उसकी कला को उसका व्यक्तिगत विश्वास, निराशा, खुशी, इच्छा, सुख-दुःख सब कुछ प्रभावित करता है। हमें जीवन के संघर्षों से भयभीत होने की जरूरत नहीं है क्योंकि जीवन है तो संघर्ष भी रहेगा। पर जरुरी है कि हम सकारात्मक सोच के साथ आशावादी बने रहें। यहां पर रविशंकर जी पर पाश्चात्य देशों का पूरा प्रभाव दिखता है क्योंकि उन देशों में मनोवैज्ञानिक कारकों पर काफी जोर दिया जाता है। हिन्दुस्तान में इन कारकों पर सविताजी के समय ही नहीं आज भी इन चीजों पर जोर नहीं देते हैं।
 

सविता देवी ने सितार की शिक्षा सितार सम्राट भारत रत्न पंडित रविशंकर जी से ली थी। - फोटो : मीनाक्षी प्रसाद
गुरु शिष्य संबंध और पंडित जी 
एक बार शिक्षण के दौरान पंडितजी को किसी शिष्य की कोई बात अच्छी नहीं लगी तो उन्होंने उन्हें फटकार लगाई। कुछ याद करते हुए सविताजी की आंखें नम हो गईं और आगे कहने लगीं कि गुरुजी ने कहा कि 'बाबा अल्लाउद्दीन खान ' अर्थात् मेरे गुरु ने भी मेरे अहम् को तोड़ दिया था। मैं विदेशों में नृत्य करता था वहां वाह-वाही भी मिलती थी पर 'बाबा ' ने मुझसे कहा कि सच्ची शिक्षा हासिल करो। ये तभी होगा जब तुम अपने भाई पंडित उदयशंकर जी के साथ विदेश भ्रमण बंद करोगे। पर बाबा सकारात्मक व्यक्तित्व के धनी इंसान थे।

उन्होंने कहा कि तुममे बड़े कलाकार बनने की काफी संभावनाएं हैं। 18  वर्ष की आयु में मैंने जिंदगी के सारे ऐशो- आराम छोड़कर चंद कपड़ो के साथ बाबा के घर मैहर चला गया और एक छोटे से कमरे में रहकर बाबा से सितार सीखने लगा। सुबह चार बजे से छः बजे तक रियाज़, फिर सात बजे से रियाज़। इस प्रकार तक़रीबन 8- 9 घंटे का रियाज़ पूरे अनुशासन के साथ करना पड़ता था। ये सिलसिला करीब सात वर्षों तक चला। बाबा का गुस्सा बहुत तेज था पर उन सबकी धीरे-धीरे आदत होने लगी थी, क्योंकि एक गुरु सिर्फ एक गुरु ही नहीं माता-पिता की भूमिका भी निभाते हैं।

उन्होंने उस शिष्य से कहा की सीखने की इच्छा रखते हो तो मेहनत से शिक्षा ग्रहण करो। उत्कृष्ट ज्ञान आत्मविश्वास में वृद्धि करता है। मंच पर कलाकार दो वजहों से घबराता है - एक तो  अच्छे ज्ञान की कमी और दूसरा उस माहौल से रूबरू या सामना नहीं होना। कहते थे मेरी पत्नी हमेशा युगल कार्यक्रम देना चाहती है क्योंकि उत्कृष्ट ज्ञान के होने के बाद भी उन्हें मंच का अनुभव नहीं है। वैसे मुझे यहां एक मनोवैज्ञानिक की दृष्टिकोण से लिंग - असमानता (जेंडर इन इक्वलीटी ) ज्यादा दिखती है।

फिर कुछ याद करते हुए मां खुद कहती हैं कि वे हमेशा कहते कि हमारा वाद्य हमें रोजी-रोटी, प्रतिष्ठा और यहां तक की आध्यात्म के मार्ग पर भी ले जाता है तो हमें अपने वाद्य की बहुत इज्ज़त करनी चाहिए। जब मैंने पूछा कि मां- पंडितजी की रचनात्मकता पर क्या राय थी? तो कहने लगीं कि बताते थे कि जैसे-जैसे ज्ञान बढ़ता है रचनात्मकता भी बढ़ती जाती है।

मनुष्य की जीवन शैली उसकी रचनात्मकता
मशहूर मनोवैज्ञानिक अल्फ्रेड ऐडलर का कहना है कि मनुष्य की जीवन शैली उसकी रचनात्मकता से प्रभावित होती है। पंडितजी कहते आपकी रचनात्मकता आपके लक्ष्य तक पहुंचने में मदद करती है। पहले आपको गुरु की चीजों को  अक्षरशः बजाने आना चाहिए अर्थात् आपकी 'याददाश्त ' बहुत अच्छी होनी चाहिए। जब चीजें आपको याद हो जाती’हैं तो उन चीजों पर ' चिंतन ' (थिंकिंग ) करना चाहिए।

हर चीज के पीछे कुछ तर्क होता है , जितना सोचोगे उस विषय पर उतनी गहराई में उतरोगे। कभी-कभी सोच उलझा भी देती है पर इससे घबराना नहीं चाहिए। बार-बार सोचो और यही वो प्वाइंट है जहां रचनात्मकता पैदा होती है। एकाएक दिमाग में कोई नई और सुंदर चीज आ जाती है। उसे तभी नोट कर लेना चाहिए क्योंकि ये जरूरी नहीं कि वे चीजें दुबारा आपके दिमाग में आए।

रचनात्मकता के क्रम में उन्होंने कहा कि पाश्चात्य संगीत की शैली 'जैज़' (उन्हें पाश्चात्य संगीत का काफी अच्छा ज्ञान था ) और विश्व के किसी भी देश के शास्त्रीय संगीत के प्रेमी में आत्मसम्मान और रचनात्मकता तो बराबर होती है पर जैज़ के शौकीन बहिर्मुखी होते हैं और शास्त्रीय संगीत के शौकीन अमूमन अंतर्मुखी और स्थिर स्वभाव के होते हैं। ऐसा लगता है कि पंडितजी की पाश्चात्य संगीतज्ञों के साथ इन मुद्दों पर भी बातें होती थी।

जब मैंने मां से पूछा कि क्या उनका व्यक्तित्व सत्तावादी (आथोरिटेटिव ) था? तब वे कहती हैं कि कम से कम मैंने एक शिष्या के रूप में ऐसा ही महसूस किया। हमेशा अनुशासन और रियाज़ की बात करते थे। कहते थे अपने को पूर्वाग्रह से दूर रखो। तुम्हारी सोंच नकारात्मकता से जितनी दूर होगी तुम्हारा प्रत्यक्षण (परसेप्शन ) उतना ही सकारात्मक होगा। बातों-बातों में सविताजी मुझसे कहती हैं क्या बेटा क्रोध, अहम् , चिन्ता, मोह को नियंत्रित करना इतना आसान है ? मैंने कहा नहीं। पर फिर खुद कहती हैं कि मगर इसके बगैर आप गुरु से कुछ सीख भी नहीं सकती हैं।

अपने आप कुछ सोंचते हुए मां कहती कि एक अच्छे तंत्रवाद्य  बजाने वाले को अच्छा गायक भी होना चाहिए, तभी तो हम कुछ अच्छा कम्पोज कर पाएँगे। मैंने अपनी मां से गायन सीखा था तो कहते कि चूंकि सविता तुम्हें संगीत वंशानुगत मिला है (अर्थात् खून में संगीत है) मिला है और तुम्हें संगीत का अच्छा माहौल भी मिला है तो मैं तुमसे एक उम्दा कलाकार और एक सुंदर सांगितिक व्यक्तित्व की अपेक्षा रखता हूं। यहां ये वर्णित करना उचित होगा कि पंडितजी के घर में भी उनके पिता और भाइयों को ध्रुपद, धमार, ख्याल, ठुमरी, टप्पा सबका ज्ञान था, इसलिए रविशंकरजी में भी संगीत की  असाधारण प्रतिभा थी। संगीत का माहौल तो उन्हें बचपन से ही मिला था, इन कारकों ने उन्हें इतना बड़ा कलाकार बनने में मदद किया। यहां ये लिखना उचित होगा कि जनेटिक्स हमारे अंदर कच्चा माल की आपूर्ति करता है पर माहौल और उत्कृष्ट शिक्षा उस कच्चे माल को गुणों में परिवर्तित करता है, और संगीत के क्षेत्र में वातावरण और जेनेटिक्स के योग से एक सांगितिक व्यक्तित्व का निर्माण होता है। ये बात हर क्षेत्र में लागू होता है।

मैंने मां से पूछा कि क्या वे कलाकारों में संवेगात्मक बुद्धि (इमोशनल इंटेलिजेंस ) अर्थात् अपने आवेग पर नियंत्रण, उसके प्रबंधन की बात भी करते थे क्या? कहने लगी वे प्रोफेशनल लाइफ में पारम्परिक संबंधों को बहुत मजबूत रखने पर बहुत जोर देते थे। अपने अनुभव से सीखना, अपने सहपाठियों से सीखने पर जोर देते थे। कहते- पिछले अनुभव से हमें सीखना चाहिए और भविष्य में आने वाले परिस्थितियों का अनुमान होना चाहिए।

पंडित जी कहते थे कि एक बार मुझे 102 बुखार में भी प्रस्तुति देनी पड़ी। मैं बजाने की स्थिति में नहीं था पर भविष्य में हर कार्यक्रम से पहले ही हल्की सी भी तबियत खराब होने पर दवा पहले से ही लेना शुरू कर देता हूं और साथ में भी रखता हूं।

पंडितजी कहते हमारी बुद्धि जितनी प्रखर होती है हमारा संवेदना पर नियंत्रण उतना ही ज्यादा होता है। हम कितने भी दुखी हों पर हमें अपनी संवेदना लोगों के बीच सोच- समझ कर रखना चाहिए। हमें रुलाई आ रही हो और हमे प्रस्तुति देनी है तो हम रो नहीं सकते। अपनी संवेदनाओं का ठीक से उपयोग करके और उनका प्रबंधन करके (इसे संवेदनात्मक नियंत्रण और संवेदनात्मक प्रबंधन कहते हैं) हम कई कठिन परिस्थितियों पर नियंत्रण ला सकते हैं। विशेषकर यदि आपको कोई संगीत का कार्यक्रम आयोजित करना हो या प्रस्तुति देनी हो तो उसमें कई छोटी-छोटी चीजों पर ध्यान देना होता है और ये सब हम संवेगात्मक सूझ-बूझ से समझ सकते हैं, पर हर व्यक्ति के संवेगात्मक प्रबंधन की क्षमता अलग-अलग होती है।
विज्ञापन

मां ने उस दिन अपने गुरु की कई स्मृतियां साझा कीं। - फोटो : file photo
कलाकार और संवेदना 
हमारे पास संवेगात्मक बुद्धि अच्छी होगी तो हम लोगों को अच्छे काम के लिए प्रेरित कर सकते हैं और बेहतरीन परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। पंडितजी को व्यवहारिक जिंदगी की काफी अच्छी और गहरी समझ थी तभी तो वे 'भारत रत्न' बने। मेरी गुरु सविता जी ने कहा कि मैं भाग्यशाली थी जो पंडितजी से शिक्षा प्राप्त करने का मौका मिला। वे एक उत्कृष्ट कलाकार के साथ-साथ एक अच्छे संगीतकार, नर्तक और एक अच्छे मार्गदर्शक (गुरु) भी थे। वे कहते गुरु-शिष्य के परस्पर संबंध बहुत अच्छे  होने चाहिए। आशा करती हूं कि इस मनोवैज्ञानिक विश्लेषण का लाभ पाठक और युवा कलाकार उठा पाएंगे।

हमारी लगभग तीन घंटे की बातचीत हो चुकी थी। आकाश में इक्के-दुक्के तारे आ रहे थे। मां ने कहा कि बहुत दिनों के बाद पंडितजी के बारे में इतनी विस्तृत बात हुई। आज तुमने मुझे फिर से एक युवा छात्रा बना दिया। मैंने मां का हाथ पकड़ा और हम अपने होटल की तरफ प्रस्थान कर गए। रास्ते में मां कहने लगी कि मीनाक्षी मैं ये शाम कभी नहीं भूल पाऊंगी। सारी पुरानी यादें तरोताजा हो गईं। वे बड़ी खुश थीं। आज मैं संगीत नाटक अकादमी के पत्रिका- सम्पादन विभाग की आभारी हूं जिन्होंने मुझे पंडितजी की शताब्दी वर्षगांठ पर श्रद्धांजलि अर्पित करने का मौका दिया और अपनी दिवंगत गुरु विदुषी सविता देवी जी के साथ फिर से जीने का मौका दिया।

मैं विदुषी सविताजी की शिष्या की हैसियत से ये बताना चाहती हूं कि सविताजी ने भी गुरु बनने के बाद अपनी शिष्याओं को इन मनोवैज्ञानिक कारकों से अवगत कराया था। इस प्रकार ये स्पष्ट है कि भारत में गुरु-शिष्य परम्परा आज भी बरकरार है और गुरु से मिला ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता जा रहा है। इनके लिए यहां ये पंक्तियां लिखकर मैं अपनी लेखनी को विराम देती हूं। 

"रहें- ना- रहें हम
महका करेंगे।
बनके कली, बनके सबा
बागे वफ़ा में।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।



                                                                                                                               
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें