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'ब्रेस्ट टैक्स' खत्म कराने वाली नांगेली की दास्तान, सामंती सोच पर ऐसे कड़े प्रहार होते रहने चाहिए

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औरतों को समाज में हेय दृष्टि से देखे जाने, उन्हें बेइज्जत करने, उनकी अस्मत का मजाक उड़ाने, उनके स्तन पर टैक्स लगाने के खिलाफ नांगेली ने अभूतपूर्व और साहसिक कदम उठाया। - फोटो : Social Media
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साल 2013 में एक खबर ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा। हॉलीवुड स्टार एंजलिना जॉली ने मस्टेकटॉमी सर्जरी के जरिए अपने स्तन हटवा दिए। ब्रेस्ट, जिसे न केवल भारतीय बल्कि पाश्चात्य टैबू में भी स्त्री की सुंदरता या यूं कहिए कि आकर्षण से जोड़कर देखा जाता है। उन्होंने अपने स्तन सर्जरी को इतना गुप्त रखा था कि एंजलिना के पिता जॉन वाइट और परिवार के अन्य सदस्यों को भी इतनी बड़ी बात मीडिया से मालूम हुई। सभी अवाक रह गए। एंजलिना ने यह कदम एहतियातन उठाया था। उन्हें अपने शरीर में स्तन कैंसर का खतरा पैदा करने वाले बीआरसीए1 जीन(BRCA1 Gene) का पता चला था। साल 2007 में उन्होंने गर्भाशय के कैंसर की वजह से अपनी मां को खो दिया था। और वे नहीं चाहती थीं कि उनके बच्चे भी अपनी मां को खो दें। 

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एंजलिना की चर्चा फिर कभी, महिला दिवस पर आज बात करते हैं नांगेली की। वही नांगेली, जिन्होंने 19वीं सदी में त्रावणकोर सामंतवादी समाज के खिलाफ बिगुल फूंका। अन्याय बर्दाश्त करने की बजाय विद्रोह किया। औरतों को समाज में हेय दृष्टि से देखे जाने, उन्हें बेइज्जत करने, उनकी अस्मत का मजाक उड़ाने, उनके स्तन पर टैक्स लगाने के खिलाफ नांगेली ने अभूतपूर्व और साहसिक कदम उठाया। ब्रेस्ट टैक्स की मांग करने पर उन्होंने अपने ही हाथों चाकू से अपने दोनों स्तन काटकर सामंतियों के सामने रख दिया और उनका यह बलिदान उनके बाद एक आंदोलन बन गया। आखिरकार सामंती व्यवस्था को हार माननी पड़ी। 

दरअसल, 19वीं सदी में केरल के त्रावणकोर में शासनकाल में निम्न जाति नायर की महिलाओं को कमर से ऊपर बदन को कपड़े से ढकने का अधिकार नहीं था। यानी उन्हें अपना स्तन खुला ही रखना होता। ये महिलाएं अर्धनग्न अवस्था में न रहकर यदि कपड़े से अपना स्तन ढकती थीं तो उन्हें ब्रेस्ट टैक्स देना होता था। जी हां, ब्रेस्ट टैक्स, जिसे मूलाकरम कहा जाता था। यह बात और ज्यादा शर्मिंदा करने वाली है कि यह ब्रेस्ट टैक्स महिलाओं के स्तन के आकार के आधार पर लिया जाता था। 
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लघु फिल्ममेकर योगेश पगारे ने इसको लेकर मूलाकरम नाम से ही एक शॉर्ट फिल्म बनाई है। महज 14 मिनट 30 सेकेंड की इस शॉर्ट फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे सार्वजनिक जीवन में महिलाओं को खासकर उच्च जाति के पुरुष हेय दृष्टि से देखते थे और उनके नंगे बदन को घूरते हुए चटखारे लेते थे। नांगेली ने इस बारे में खूब सोचा। पति से बात की और निर्णय लिया कि किसी न किसी को तो आवाज उठानी ही होगी। पति ने नांगेली के विरोध में साथ देने का फैसला लिया और अगले ही दिन से नांगेली अपना स्तन ढकने लगी। 

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केरल जैसे प्रगतिशील माने जाने वाले राज्य में भी महिलाओं को अंगवस्त्र या ब्लाउज पहनने का हक पाने के लिए 50 साल से ज्यादा सघन संघर्ष करना पड़ा - फोटो : Social Media
नांगेली का यह कदम सामंतवादी समाज के पुरुषों को उनके मुंह पर करारे तमाचे जैसा था। बात आगे पहुंची और फिर नांगेली और उसके पति से ब्रेस्ट टैक्स की मांग की जाने लगी। एक महीने बाद अधिकारी टैक्स लेने घर आ धमके। नांगेली का स्तन मापा गया। इसके बाद नांगेली घर के भीतर गई और चाकू से अपने दोनों स्तन काट केले के पत्ते पर लेकर बाहर आईं। टैक्स अधिकारी के होश उड़ गए और वे डरकर भाग गए। कुछ देर बाद ही नांगेली की मृत्यु हो गई, लेकिन उनके इस साहसिक कदम ने समाज की अन्य महिलाओं को हिम्मत दी। 

इस टैक्स के विरोध में नांगेली का साथ देने का वादा करने वाले उनके पति चिरकंडुन ने उसकी चिता में कूदकर अपनी इहलीला समाप्त कर ली। किसी पुरुष के 'सती' होने की यह पहली घटना थी। देखते ही देखते ब्रेस्ट टैक्स के खिलाफ आंदोलन खड़ा हो गया। सभी जगह महिलाएं पूरे कपड़ों में बाहर निकलने लगीं। मद्रास के कमिश्नर ने त्रावणकोर के राजा को खबर भिजवाई कि महिलाओं को कपड़े न पहनने देने और राज्य में हिंसा और अशांति को न रोक पाने के कारण उसकी बदनामी हो रही है। अंग्रेजों के और नादर आदि अवर्ण जातियों के दबाव में आखिर त्रावणकोर के राजा को घोषणा करनी पड़ी कि सभी महिलाएं शरीर का ऊपरी हिस्सा वस्त्र से ढंक सकती हैं। 

26 जुलाई 1859 को राजा के एक आदेश के जरिए महिलाओं के ऊपरी वस्त्र न पहनने के कानून को बदल दिया गया। और इस तरह नांगेली के बलिदान से महिलाओं ने अपना हक छीन कर हासिल किया। अजीब लग सकता है, पर केरल जैसे प्रगतिशील माने जाने वाले राज्य में भी महिलाओं को अंगवस्त्र या ब्लाउज पहनने का हक पाने के लिए 50 साल से ज्यादा सघन संघर्ष करना पड़ा। नांगेली और उसके पति ने जहां अपने प्राण त्यागे थे, उनके सम्मान में उस जगह को मुलाचीपराम्बु(महिलाओं के स्तन की भूमि) नाम दिया गया। हालांकि अब इसे मनोरमा कवाला के नाम से जाना जाता है।

आजादी के सातवें दशक में पहुंचने के बावजूद स्थितियां बहुत बदली नहीं हैं। सुबह घर से कार्यस्थल तक हमारा सामना ऐसे पुरुषों से होता है, जिनके मन में स्त्रियों के प्रति सम्मान नहीं होता। मेट्रो से लेकर बसों में रोज ही कई पुरुष महिलाओं को घूरते दिख जाते हैं। महिला दिवस पर महिलाओं से ज्यादा यह पुरुषों के लिए खास दिन होना चाहिए, जब पुरुष महिला सम्मान का संकल्प लें। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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