मी टू अभियान से क्या महिलाएं सशक्त हुईं?
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दूसरी मुख्य बात इस मी-टू आंदोलन के कारण यह पूछी जानी चाहिए कि क्या इससे महिलाएं सशक्त हुई? मी-टू को लेकर एक सहानुभूति की लहर अवश्य उठी पर इससे महिलाओं को क्या लाभ हुआ। क्या उनके अधिकारों में बढ़ोतरी हुई या उनका सशक्तीकरण हुआ?
दरअसल, इस बात को लेकर एक विश्लेषण भी किया गया है जिसके परिणाम यहीं बताते हैं कि मी-टू की महिलाओं को सशक्त बनाने में कोई भूमिका नहीं बन पाई। अमेरिका की कारनेगे विश्वविद्यालय ने मी-टू द्वारा महिलाओं को सशक्त बनाने के प्रभाव के रोल के बारे में एक अध्ययन किया। फ्लोरेंस में एंजेली फील्ड ने भी मी-टू पर की गई अपनी रिसर्च का पेपर प्रस्तुत किया है।
एंजेली ने जब यह पेपर प्रस्तुत किया तो तुरंत इस पर चर्चा होने लगी कि मी-टू अभियान से तो महिलाओं को और अधिक सशक्तीकरण को मजबूती मिलनी चाहिए थी व उनके व्यक्तित्व को लेकर और अधिक सम्मान की बातें की जानी चाहिए थी। लेकिन ऐसा होता हुआ कुछ नजर तो नहीं आ रहा। जिस तरह से मीडिया में मी-टू अभियान की घटनाओं की भाषा तथा उनमें प्रयुक्त शब्दों का प्रयोग हुआ उससे तो कहीं यह जाहिर नहीं हुआ कि इससे महिलाओं की स्थिति में अंतर आया और महिलाएं सशक्त हुईं हैं। उनकी बातों में वजन है और अब भविष्य में इस वजन की अनदेखी नहीं की जा सकती या की जाएगी।
मी-टू अभियान की सारी बातें और उसमें बताई गई सारी घटनाएं एक किस्सागोई बनकर रह गईं।
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दरअसल, मी-टू अभियान की सारी बातें और उसमें बताई गई सारी घटनाएं एक किस्सागोई बनकर रह गईं। इन घटनाओं का वर्णन करने में मीडिया व स्वयं पीड़िताओं ने भी जिस तरह से इसे कहा वह सब एक घटना घटित होनी की ही बातें लगीं और उनमें कहीं वजन और गहराई या यूं कहें कि गंभीरता नहीं थी।
इन घटनाओं के बारे में जो भी जानकारी मिली उससे शोषित महिला या युवती के प्रति सहानुभूति तो हुईं व संवेदनाएं भी जागीं पर इससे महिलाओं की छवि सशक्त बनाने में कोई मदद नहीं हुई। घटनाओं का केवल मात्र वर्णन जिस तरह की भाषा का प्रयोग करके किया गया वह मात्र घटना का नेरेशन होकर रह गया। महिलाओं की स्थिति में कोई विशेष बदलाव इस मी-टू आंदोलन से दिखाई नहीं दे रहा।
यूलिया तवेस्तकोव जो कम्प्यूटर साईंस की भाषा टेक्नोलॉजिस इंस्टीट्यूट की असिस्टेंट प्रोफेसर मानती हैं कि- अभी भी मीडिया पुरुषों को एक ताकतवर व प्रभुतासंपन्न व्यक्तित्व वालों की छवि में ही प्रस्तुत करता है जबकि उन पर यौन शोषण के इतने आरोप लग चुके हैं इसलिए ही महिलाओं की मी-टू अभियान के बावजूद यथास्थिति ही बनी हुई है।
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