आज जेपी के पुण्य स्मरण के साथ उनकी विरासत के पुनर्मूल्यांकन की भी आवश्यकता है।
गांधी जिस कांग्रेस को सेवा संघ में बदलने की बात कर रहे थे उसे नेहरू और इंदिरा ने परिवार की विचारशून्य पैदल सेना बना दिया। सम्पूर्ण क्रांति असल में भारत के उसी नवनिर्माण को समर्पित एक जनांदोलन था जिसमें गांधी के सपनों को जमीन पर उतारने की बचनबद्धता समाई हुई थी। नवनिर्माण आंदोलन ने इंदिरा गांधी की सत्ता को उखाड़ा देश ने एक वैकल्पिक सरकार भी देखी लेकिन यह एक असफल विकल्प भी था जो असल में इस आंदोलन के अग्रणी नेताओं के नैतिक स्खलन का परिणाम भी था।
जेपी की विरासत है तो बहुत लंबी पर आज निष्पक्ष होकर कहा जा सकता है कि जो वैचारिक हश्र गांधी का कांग्रेस की मौजूदा पीढ़ियों ने किया है, वही मजाक जेपी और समाजवादी आंदोलन के लोहिया, नरेंद्र देव, बिनोवा, अच्युत पटवर्द्धन, अशोक मेहता, मीनू मसानी, जनेश्वर मिश्र जैसे नेताओं के साथ उनके काफिले में चलने वाले समाजवादी नेताओं ने किया।
आज लालू यादव, नीतीश कुमार, शरद यादव, हुकुमदेव यादव, सुशील मोदी, रविशंकर प्रसाद, मुलायम सिंह, मोहन, विजय गोयल, आजम खान, रामविलास पासवान, रेवतीरमण सिह, केसी त्यागी, स्व अरुण जेटली, स्वर्गीय सुषमा स्वराज, बीजू पटनायक, चरण सिंह से लेकर उतर भारत और पश्चिमी भारत के सभी राज्यों में जेपी आंदोलन के नेताओं की 60 प्लस पीढ़ी सक्रिय हैं। इनमें से अधिकतर केंद्र और राज्यों की सरकारों में महत्त्वपूर्ण पदों पर रहे हैं।
यूपी और बिहार जैसे देश के सबसे बड़े राज्यों में जेपी आंदोलन के वारिस लंबे समय तक सत्ता में रहे है
- फोटो : social media
सवाल यह उठाया ही जाना चाहिए कि जिस नवनिर्माण के लिए जेपी जैसी शख्सियत ने कांग्रेस में अपनी असरदार हैसियत को छोड़कर समाजवाद और गांधीवाद का रास्ता चुना उस जेपी के अनुयायियों ने देश के पुनर्निर्माण में क्या योगदान दिया है?
लालू यादव, नीतीश कुमार, रामविलास, मुलायम सिंह के रूप में जेपी के चेले सिर्फ इस बात की गवाही देते हैं कि राजनीतिक क्रांति तो हुई लेकिन सिर्फ मुख्यमंत्री और दूसरे मंत्री पदों तक। जेपी और लोहिया का नारा लगाकर यूपी , बिहार, ओडिसा, गुजरात, कर्नाटक जैसे राज्यों के सीएम बने नेताओं ने भारत के भीतर उस व्यवस्था परिवर्तन के लिये क्या किया है जिसके लिए सम्पूर्ण क्रांति की अवधारणा और अपरिहार्यता को जेपी ने अपने त्याग और पुरुषार्थ से प्रतिपादित किया था।
क्या जातियों की गिरोहबंदी, अल्पसंख्यकवाद, जातीय प्रतिक्रियावाद, भाई भतीजावाद, भ्रष्टाचार, शैक्षणिक माफ़ियावाद जैसी उपलब्धियां नहीं है जेपी के वारिसों के खातों में। सामाजिक न्याय के नाम पर लालू, मुलायम, बीजू, देवगौडा, अजीत सिंह ने शासन का विकृत संस्करण इस देश को नहीं दिए।
इंदिरा और संजय के सर्वाधिकार को चुनौती देने वाला था जेपी की समग्र क्रांति
मां-बेटे (इंदिरा -संजय) के सर्वाधिकार को चुनोती देने वाली जेपी की समग्र क्रांति से सैफई, पाटिलीपुत्र, भुवनेश्वर और हासन के समाजवादी सामंत किस राजनीतिक न्याय की इबारत लिखते है? यह सवाल क्या आज पूछा नहीं जाना चाहिए। यूपी और बिहार जैसे देश के सबसे बड़े राज्यों में जेपी आंदोलन के वारिस लंबे समय तक सत्ता में रहे है क्या आज इन दोनों राज्यों में शिक्षा क्रांति से कोई नया भारत गढ़ा जा चुका है? बिहार और यूपी बोर्ड की परीक्षाओं के दृश्य असल में माफ़ियावाद की क्रांति की कहानी ही कहते है। तेजस्वी,अखिलेश, मीसा, चिराग़ नवीन, कुमारस्वामी जैसे चेहरो को ध्यान से देखिये और जेपी आंदोलन के उस नारे को याद कीजिये जो संजय और इंदिरा गांधी को लेकर देश भर में सम्पूर्ण क्रान्ति के अलमबरदार गुनगुनाते थे।
आज जेपी के पुण्य स्मरण के साथ उनकी विरासत के पुनर्मूल्यांकन की भी आवश्यकता है। हकीकत यह है कि भारत से समाजवाद का अंत इसी के उपासकों ने कर लिया है। भारत में जेपी को आज एक महान विचारक और सत्ता से सिद्धांतो के लिए जूझने वाले योद्धा की तरह याद किया जाएगा। इस त्रासदी के साथ कि उनके अनुयायियों ने उनके विचारों के साथ व्यभिचार की सीमा तक अन्याय किया। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लिखा था-"
क्षमा करो बापू तुम हमको
वचनभंग के हम अपराधी
राजघाट को किया अपावन ,भूले मंजिल यात्रा आधी। जयप्रकाश जी रखो भरोसा
टूटे सपनों को जोड़ेंगे
चिता भस्म की चिंगारी से
अंधकार के गढ़ तोड़ेंगे"
टूटते विश्वास के इस तिमिर में आशा कीजिए अटल जी की बात सच साबित हो।भारत के संसदीय लोकतंत्र के लिए जेपी की समग्र क्रांति और गांधी दोनो आज भी सामयिक आवश्यकता है।
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