मायावती लगातार कांग्रेस पर निशाना साध रही है।
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आखिर क्यों सफल नहीं हो पा रही बसपा?
लोकसभा चुनाव के कुछ समय बाद ही मायावती ने समाजवादी पार्टी से अपने सभी तरह के गठबंधन को समाप्त करते हुए अकेले चलने की रणनीति अपनाई थी। लेकिन उसके बाद उत्तर प्रदेश में जितने भी उपचुनाव हुए उसमें बसपा अपनी प्रभावी भूमिका निभाने में सफल नहीं हो पाई।
इससे चिंतित मायावती को लगता है कि यदि उसने कांग्रेस के साथ उसके पिछलग्गू की छवि से पीछा नहीं छुड़वाया तो आने वाले समय में उसका रहा सहा जनाधार भी जाता रहेगा।
कांग्रेस के दलित वोटों के बल पर ही देश भर में बसपा का अपना वोट बैंक तैयार हुआ था। जो कांग्रेस के साथ गठबंधन करने से धीरे-धीरे फिर से कांग्रेस की तरफ खिसकने लगा है। जिससे बसपा का जनाधार भी कम होता जा रहा है।
बसपा के संस्थापक कांशीराम ने अपने जीवन में ही बसपा की कमान पूरी तरह से मायावती के हाथों सौंप कर उन्हे अपना उत्तराधिकारी बना दिया था। काशीराम के जमाने में बसपा का देश के कई राज्यों में प्रभाव था जो अब सिमटकर उत्तर प्रदेश तक ही रह गया है।
बसपा ने 1989 के से लेकर 2019 तक के लोकसभा चुनाव में देश भर में कुल 86 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की है। जिनमें पंजाब की पांच, मध्य प्रदेश की चार, हरियाणा की एक व उत्तर प्रदेश की 77 सीटें शामिल है।
2009 के लोकसभा चुनाव में बसपा को 21 सीटों पर जीत हासिल हुई थी तथा उसे पूरे देश में 6.17 प्रतिशत वोट मिले थे। जो बसपा का अब तक का सर्वोच्च प्रदर्शन था। 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने 10 सीटों पर विजय हासिल कर देश में 3.63 प्रतिशत मत प्राप्त किए जो 1996 के बाद से अब तक का सबसे हल्का प्रदर्शन था।
मायावती के नेतृत्व में बसपा उत्तर प्रदेश में अब तक चार बार सरकार बना चुकी है
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मायावती की चार बार सरकार लेकिन?
मायावती के नेतृत्व में बसपा उत्तर प्रदेश में अब तक चार बार सरकार बना चुकी है तथा 1993 से 2017 तक वहां कुल 537 विधानसभा सीटें भी जीत चुकी हैं। इसके अलावा 1990 से 2018 तक बसपा के मध्य प्रदेश में 30 विधायक जीत चुके हैं। वहीं राजस्थान में बसपा के 19, छत्तीसगढ़ में 7, बिहार में 13, दिल्ली में 3, हरियाणा में 4, हिमाचल प्रदेश में 01, जम्मू एवं कश्मीर में 5, झारखंड में 01, कर्नाटक में 01, पंजाब में 10, तेलंगाना में 02 व उत्तराखंड में 18 विधायक जीतने में सफल रहे हैं।
देश के कई प्रदेशों में अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराने वाली बसपा का जनाधार धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है। 2014 के लोकसभा चुनाव में तो बसपा का खाता भी नहीं खुल पाया था। जबकि उस चुनाव में बसपा ने पूरे देश में 530 प्रत्याशी मैदान में उतारे थे जिन्हे पूरे देश में 4.3 प्रतिशत मत मिले थे।
2014 का लोकसभा चुनाव व 2017 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा के लचर प्रदर्शन से डर कर ही पिछले लोकसभा चुनाव में मायावती ने उत्तर प्रदेश में अपनी सबसे बड़ी दुश्मन समाजवादी पार्टी से भी हाथ मिलाने से भी गुरेज नहीं किया था। जिसका मायावती को लोकसभा चुनाव में बड़ा लाभ भी मिला।
मई 2018 के लोकसभा चुनाव के बाद से मायावती ने अब तक चार बार लोकसभा में अपनी पार्टी का नेता बदल चुकी है। उन्होने सबसे पहले अमरोहा से सांसद व पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा के करीबी कुंवर दानिश अली को लोकसभा में पार्टी का नेता मनोनीत किया था। लेकिन संसद में धारा 370 पर पार्टी लाईन से हटकर राय रखने के कारण उनको हटाकर जौनपुर के सांसद श्याम सिंह यादव को नेता बना दिया था। मगर यादव का झुकाव समाजवादी पार्टी की तरफ देखकर फिर से कुंवर दानिश अली को नेता बनाया था। लेकिन चौथी बार फिर से फेरबदल करते हुये मायावती ने अम्बेडकरनगर के सांसद रितेश पांडे को लोकसभा में नेता मनोनित किया है।
लोकसभा में बार-बार बसपा का नेता को बदलना मायावती में व्याप्त असुरक्षा की भावना को ही दर्शाता है। बसपा में काशीराम के जमाने के अधिकांश पुराने नेताओं को या तो पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया या फिर उन्हे अपनी अलग राह चुनने पर मजबूर किया गया था। जिस कारण आज बसपा में बहुत कम पुराने नेता रह गये हैं।
बसपा में अब अन्य दलों से आने वाले नेताओं को तरहीज दी जाने लगी है। जिस कारण बसपा का मूल काडर स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहा है। यह बसपा के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा सकता है।
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