शिक्षा के क्षेत्र में मुस्लिम महिलाओं का पिछड़ापन उन्हें समाज के प्रत्येक स्तर पर पिछड़ा ही बनाए हुए है
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संसार के विभिन्न धर्मो की तरह इस्लाम भी शिक्षा को समाज की प्रगति के लिए अनिवार्य स्वीकार करता है। इस्लाम शिक्षा को केवल पुरूषों तक ही सीमित नहीं रखना चाहता बल्कि स्त्रियों को भी पुरूषों के समक्ष, समर्थ एवं प्रभावी बनाने का पक्षधर है। स्वयं पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब स्त्री-पुरूष दोनों को घर में, मस्जिद में, सभाओं में, अवसर के अनुसार शिक्षा देते थे। इस्लाम लिंग के आधार पर स्त्रियों की शिक्षा पर पाबंदी नहीं लगाता। इस्लाम में ऐसी कई विदुषी महिलाएं हुई हैं जिनके अनुभव से समाज और संसार ने लाभ उठाया है।
पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब की पत्नी हजरत आयशा सिददीकी के बारे में कहा जाता है कि उनसे ही मुसलमानों को इस्लाम का एक तिहाई ज्ञान प्राप्त हुआ है। पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब की पहली पत्नी हजरत खदीजा मक्का शहर की बहुत बडी और सफल व्यापारी थी। उनका कारोबार दूर-दूर तक फैला था। स्वयं हजरत मुहम्मद साहब ने हजरत खदीजा के व्यावसायिक प्रतिनिधि के रूप में अपनी सेवाएं दी थीं।
सच्चर समिति की रिपोर्ट के अनुसार देशभर में मुस्लिम महिला साक्षरता दर 53.7 प्रतिशत है। इनमें से भी अधिकांश महिलाएं केवल अक्षर ज्ञान तक ही सीमित है। 7 से 16 आयु वर्ग की स्कूल जाने वाली लड़कियों की दर केवल 3.11 है। शहरी इलाकों में 4.3 और ग्रामीण इलाकों में 2.26 लड़कियां ही स्कूल जाती हैं। प्राइमरी से जूनियर विद्यालयों तक पहुंचते ही इनकी उपस्थिति लगातार घटनें लगती है। सरकार भी मुस्लिम शिक्षण संस्थानों की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाती।
शिक्षा के क्षेत्र में मुस्लिम महिलाओं का पिछड़ापन उन्हें समाज के प्रत्येक स्तर पर पिछड़ा ही बनाए हुए है। परिणामस्वरूप वे अपने अधिकारों की मांग करना तो दूर, अधिकारों के प्रति पूर्ण रूप से जागरूक भी नहीं हैं। अधिकांश मुस्लिम बालिकाओं को केवल मदरसों की शिक्षा तक ही सीमित रखा जाता है। यद्यपि बदलते समय के साथ मुस्लिम महिलाओं की शैक्षणिक स्थिति में सुधार हो रहा है। परंतु अन्य वर्ग की महिलाओं की तुलना में उनकी स्थिति अभी भी बहुत खराब हैं।
भारत का संविधान महिलाओं समेत समाज के सभी कमजोर वर्गों को सुरक्षा और सार्मथ्य प्रदान करता है। किसी भी देश की कानूनी व्यवस्था दर्शाती है कि राजसत्ता अपने नागरिको के हकों के प्रति कितनी संवेदनशील व जिम्मेदार हैं। हमारे देश का कानून पितृसत्तात्मक है, इसका सबसे सरल उदाहरण है कि कानून पुरुषों को परिवार का मुखिया मानता है, उन्हें बच्चो का स्वाभाविक संरक्षक व संपत्ति का मुख्य उत्तराधिकारी मानता है। न्यायपालिका, विधान पालिका और कार्यपालिका राज्यसत्ता की इन तीनों महत्वपूर्ण इकाईयों में पुरुषों का वर्चस्व है। संसद हो, कोर्ट हो, पंचायत हो या फिर पुलिस थाने कानून बनाने से लेकर उसके कार्यान्वयन तक पितृसत्तात्मक मानसिकता का वर्चस्व है।
इन सब स्थितियों परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक-2019 विभिन्न संवैधानिक बंधों-उपबंधों के तहत संरक्षण प्रदान करता है। उनके सशक्तीकरण के अनेक प्रावधान करता है। क्योंकि भारतीय मुस्लिम महिलाओं से जुड़ा तीन तलाक का मुद्दा स्वतंत्र भारत के ज्वलंत मुददों में से एक है। यह आधुनिक लोकतांत्रिक सामाजिक व्यवस्था के माथे पर कलंक है। भारतीय समाज में मुस्लिम महिलाओं को आंदोलित करने वाले भावनात्मक मुद्दों से कहीं ज्यादा सामाजिक, राजनीतिक और व्यवस्थागत मुद्दे है। उनकी पारिवारिक स्थिति से जुड़े मुद्दे, आर्थिक मुद्दे, गृह क्लेश, तलाक और पारिवारिक झगड़े जैसे विभिन्न सामाजिक मुद्दे भी कम नहीं है।
निरंतर घरेलू हिंसा से होने वाले उत्पीड़न जैसे गंभी मसले हैं। मुस्लिम महिलाओं के विकास और उनकी बदलती स्थिति, मुस्लिम महिलाओं में अपने हक अधिकारों को समझने की नई दृष्टि तथा नए समाज सृजन के लिए महिला मुद्दे व समस्याओं को समझने के लिए यह पहला कदम निश्चित रुप से बडा फैसला साबित होगा और मील के पत्थर की तरह एक दिशा प्रदान करेगा। इसी आशा, अपेक्षा और प्रतिबद्धता के साथ यह कानून मुस्लिम महिलाओं के लिए संजीवनी साबित होगा। जिससे आने वाले दिनों में कई सलीना अपनी हक की लड़ाई जीत सकेंगी।
लेखिका युवा एडवोकेट हैं।
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