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मुस्लिम महिलाओं को संबल देता विवाह अधिकार संरक्षण कानून-2019

Fri, 05 Feb 2021 04:27 PM IST
डॉ. नाज परवीन डॉ. नाज परवीन
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भारतीय मुसलमान देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा हैं - फोटो : Pixabay
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शायरा बानों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक की अमानवीय प्रथा को असंवैधानिक करार दिया था। कोर्ट का मानना था कि यह इस्लाम के खिलाफ है। आगे चलकर सरकार ने मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण कानून-2019 पारित कर महिलाओं के सशक्तीकरण का एक बड़ा कदम उठाया। अभी हाल ही में इंदौर की बेटी सलीना खान को उसके शौहर जीशान फैसल खान द्वारा तीन तलाक दिए जाने के संबंध में न्यायालन ने 35 हजार रूपये प्रतिमाह अंतरिम भरण पोषण राशि देने और वर्ष 2019 से अब तक बकाया करीब 4 लाख से अधिक भरण पोषण राशि 6 किश्तों में अदा करने का निर्देश दिया है। जो कि तीन तलाक बोलने वाले पुरूषों के लिए एक ताकीद होनी चाहिए। 

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     19 सितंबर 2018 से प्रभावी इस कानून के तहत कई प्रावधान किए गए हैं-

  • तुरंत तीन तलाक यानी तलाक-उल-बिद्दत को रदद एवं गैर कानूनी बनाना।
  • तीन तलाक को संज्ञेय अपराध मानने का प्रावधान जिसके तहत पुलिस बिना वारण्ट गिरफ्तार कर सकती है।
  • इसके तहत तीन साल की सजा का प्रावधान है।
  • मजिस्ट्रेट आरोपी को जमानत दे सकता है लेकिन जमानत तभी दी जाएगी जब पीड़िता का पक्ष सुना जाएगा।
  • पीड़िता के अनुरोध में मजिस्ट्रेट समझौते की अनुमति दे सकता है।
  • पीड़िता पति से गुजारा भत्ते का दावा कर सकती है, गुजारे भत्ते की रकम मजिस्ट्रेट तय करेगा।
  • पीड़िता नाबालिग बच्चों को अपने पास रख सकती है, इस विषय पर मजिस्ट्रेट तय करेगा। आदि कई प्रावधानों के जरिए मुुसलमान महिलाओं के अधिकारों की बात की गई है।



भारतीय मुसलमान देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा हैं। उनका एक समुदाय के रुप में उत्तरोत्तर विकास देश के हित मे बहुत जरूरी प्रक्रिया है। मुस्लिम समाज दस्तकारी, कारखानदारी और कुटीर उधोग-धंधो से जुडा हुआ है। मुस्लिम महिलाएं हर कार्य क्षेत्र मे मेहनत मशक्कत करती हैं। उनका रहन-सहन, खान-पान, सोच-विचार अपने व्यवसाय से जुडी कठिनाइयां और नैतिकताएं बहुत उलझी हुई हैं। अपनी विभिन्न विशेषताओं और मजबूतियों के बावजूद महिलाओं के मसलें बेहद पेचिदें और संगीन बने हुए हैं। मुस्लिम महिलाओं की स्थिति धर्म, समाज, कानून, राजनीति सबके दायरे में बहुत बेहतर नही है। 

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ऐसी स्थिति में प्रसिद्ध नारीवादी इतिहासकार फातिमा जी की यह टिप्पणी’’मुस्लिम महिलाऐं अपना इतिहास जानने के लिए विद्वान या किसी अन्य पर निर्भर नहीं रह सकती, फिर चाहे वह इंसान उनका पक्षधर हो या निष्पक्ष। अपने इतिहास को पढ़ना-समझना उनका अपना दायित्व भी है और कर्त्तव्य भी मानव अधिकारों को पूरी तरह पाने के लिए हमें अपने इतिहास को जानना होगा, उसे बार-बार पढ़ना होगा और एक व्यापक और खुले मुस्लिम अतीत को पुनः गढ़ना होगा’’  महिलाओं को अपने हक-अधिकारों के लिए एक सजग प्राणी की तरह खड़ा होना होगा। अपने पुर्नजागरण का प्रारंभ स्वयं तय करना होगा। तभी इन सामाजिक समस्याओं से निज़ात मिल सकती है।

भारत को आजाद हुए सात दशक हो रहे हैं। परंतु आज भी भारतीय मुस्लिम महिलाएं समाज की अंतिम पंक्ति में कम शिक्षित, आर्थिक पिछडेपन से ग्रस्त, राजनैतिक हाशिए पर नजर आती हैं। मुस्लिम समाज की महिलाओं के वाजिब हक के मुददे हो या भारतीय नागरिक की हैसियत से उनके अधिकारों का प्रश्न, तमाम पहलुओं पर गौर करने की अत्यंत आवश्यकता है। शिक्षा ऐसी शक्ति है जिसे प्राप्त कर के हर मुश्किल से बाहर निकला जा सकता है। इस्लाम दुनिया का पहला मजहब है जिसने स्त्री को सर्वाधिक अधिकार दिए हैं। लेकिन अफसोस पुरूषवादी समाज अपने ही इतिहास का सामना नहीं करना चाहता। जिसके कारण अकसर महिलाएं प्रताड़ित होती हैं।

कुरान में स्पष्ट है कि मानव अधिकारों के आधार पर स्त्री-पुरूष में कोई भेद नहीं है। और न ही मानवीय आधार पर कोई अंतर। इस्लाम लिंगभेद के आधार पर कोई बाधा नहीं रखता। कोई भी व्यक्ति अपने चरित्र और सद्गुणों के आधार पर जितनी कामयाबी हासिल करना चाहे, हासिल कर सकता है। जिसका उदाहरण हम इस्लामी इतिहास में "रबिया बसरी" के रूप में पाते हैं, जिन्होंने श्रेष्ठता का वह उच्च स्थान प्राप्त किया जहां तक बडे़-बडे़ सूफी संत नहीं पहुंच सके।

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भारत का संविधान महिलाओं समेत समाज के सभी कमजोर वर्गों को सुरक्षा और सार्मथ्य प्रदान करता है...

 शिक्षा के क्षेत्र में मुस्लिम महिलाओं का पिछड़ापन उन्हें समाज के प्रत्येक स्तर पर पिछड़ा ही बनाए हुए है - फोटो : पीटीआई
संसार के विभिन्न धर्मो की तरह इस्लाम भी शिक्षा को समाज की प्रगति के लिए अनिवार्य स्वीकार करता है। इस्लाम शिक्षा को केवल पुरूषों तक ही सीमित नहीं रखना चाहता बल्कि स्त्रियों को भी पुरूषों के समक्ष, समर्थ एवं प्रभावी बनाने का पक्षधर है। स्वयं पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब स्त्री-पुरूष दोनों को घर में, मस्जिद में, सभाओं में, अवसर के अनुसार शिक्षा देते थे। इस्लाम लिंग के आधार पर स्त्रियों की शिक्षा पर पाबंदी नहीं लगाता। इस्लाम में ऐसी कई विदुषी महिलाएं हुई हैं जिनके अनुभव से समाज और संसार ने लाभ उठाया है। 

पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब की पत्नी हजरत आयशा सिददीकी के बारे में कहा जाता है कि उनसे ही मुसलमानों को इस्लाम का एक तिहाई ज्ञान प्राप्त हुआ है। पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब की पहली पत्नी हजरत खदीजा मक्का शहर की बहुत बडी और सफल व्यापारी थी। उनका कारोबार दूर-दूर तक फैला था। स्वयं हजरत मुहम्मद साहब ने हजरत खदीजा के व्यावसायिक प्रतिनिधि के रूप में अपनी सेवाएं दी थीं। 

सच्चर समिति की रिपोर्ट के अनुसार देशभर में मुस्लिम महिला साक्षरता दर 53.7 प्रतिशत है। इनमें से भी अधिकांश महिलाएं केवल अक्षर ज्ञान तक ही सीमित है। 7 से 16 आयु वर्ग की स्कूल जाने वाली लड़कियों की दर केवल 3.11 है। शहरी इलाकों में 4.3 और ग्रामीण इलाकों में 2.26  लड़कियां ही स्कूल जाती हैं। प्राइमरी से जूनियर विद्यालयों तक पहुंचते ही इनकी उपस्थिति लगातार घटनें लगती है। सरकार भी मुस्लिम शिक्षण संस्थानों की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाती।
    
शिक्षा के क्षेत्र में मुस्लिम महिलाओं का पिछड़ापन उन्हें समाज के प्रत्येक स्तर पर पिछड़ा ही बनाए हुए है। परिणामस्वरूप वे अपने अधिकारों की मांग करना तो दूर, अधिकारों के प्रति पूर्ण रूप से जागरूक भी नहीं हैं। अधिकांश मुस्लिम बालिकाओं को केवल मदरसों की शिक्षा तक ही सीमित रखा जाता है। यद्यपि बदलते समय के साथ मुस्लिम महिलाओं की शैक्षणिक स्थिति में सुधार हो रहा है। परंतु अन्य वर्ग की महिलाओं की तुलना में उनकी स्थिति अभी भी बहुत खराब हैं।

भारत का संविधान महिलाओं समेत समाज के सभी कमजोर वर्गों को सुरक्षा और सार्मथ्य प्रदान करता है। किसी भी देश की कानूनी व्यवस्था दर्शाती है कि राजसत्ता अपने नागरिको के हकों के प्रति कितनी संवेदनशील व जिम्मेदार हैं। हमारे देश का कानून पितृसत्तात्मक है, इसका सबसे सरल उदाहरण है कि कानून पुरुषों को परिवार का मुखिया मानता है, उन्हें बच्चो का स्वाभाविक संरक्षक व संपत्ति का मुख्य उत्तराधिकारी मानता है। न्यायपालिका, विधान पालिका और कार्यपालिका राज्यसत्ता की इन तीनों महत्वपूर्ण इकाईयों में पुरुषों का वर्चस्व है। संसद हो, कोर्ट हो, पंचायत हो या फिर पुलिस थाने कानून बनाने से लेकर उसके कार्यान्वयन तक पितृसत्तात्मक मानसिकता का वर्चस्व है। 

इन सब स्थितियों परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक-2019 विभिन्न संवैधानिक बंधों-उपबंधों के तहत संरक्षण प्रदान करता है। उनके सशक्तीकरण के अनेक प्रावधान करता है। क्योंकि भारतीय मुस्लिम महिलाओं से जुड़ा तीन तलाक का मुद्दा स्वतंत्र भारत के ज्वलंत मुददों में से एक है। यह आधुनिक लोकतांत्रिक सामाजिक व्यवस्था के माथे पर कलंक है। भारतीय समाज में मुस्लिम महिलाओं को आंदोलित करने वाले भावनात्मक मुद्दों से कहीं ज्यादा सामाजिक, राजनीतिक और व्यवस्थागत मुद्दे है। उनकी पारिवारिक स्थिति से जुड़े मुद्दे, आर्थिक मुद्दे, गृह क्लेश, तलाक और पारिवारिक झगड़े जैसे विभिन्न सामाजिक मुद्दे भी कम नहीं है। 

निरंतर घरेलू हिंसा से होने वाले उत्पीड़न जैसे गंभी मसले हैं। मुस्लिम महिलाओं के विकास और उनकी बदलती स्थिति, मुस्लिम महिलाओं में अपने हक अधिकारों को समझने की नई दृष्टि तथा नए समाज सृजन के लिए महिला मुद्दे व समस्याओं को समझने के लिए यह पहला कदम निश्चित रुप से बडा फैसला साबित होगा और मील के पत्थर की तरह एक दिशा प्रदान करेगा। इसी आशा, अपेक्षा और प्रतिबद्धता के साथ यह कानून मुस्लिम महिलाओं के लिए संजीवनी साबित होगा। जिससे आने वाले दिनों में कई सलीना अपनी हक की लड़ाई जीत सकेंगी।

लेखिका युवा एडवोकेट हैं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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