गणतंत्र दिवस पर आंदोलनकारी किसानों की ट्रैक्टर रैली में हुई हिंसा और उत्पात के बाद लग रहा था कि अब यह आंदोलन उतार की राह पर है, लेकिन दूसरे ही दिन किसान नेता राकेश सिंह टिकैत द्वारा सार्वजनिक रूप से किसानों का दर्द बयान करने और जार-जार आंसू बहाने के बाद लगता है आंदोलन ने फिर पलटी मार दी है। किसान आंदोलन के इस फेज-2 में हालात तेजी से बदले हैं, जो मोदी सरकार के साथ-साथ उत्तर प्रदेश और हरियाणा की भाजपा सरकारों के लिए भी खतरे की घंटी हैं।
नई परिस्थिति में किसान आंदोलन के कई कोण दिख रहे हैं। पहला तो यह कि किसान आंदोलन की मुख्य कमान सामूहिक नेतृत्व की बजाए राकेश टिकैत के हाथ आ गई है। दूसरे, टिकैत अब किसान नेता से ज्यादा राजनेता के तेवर और भाषा में बात कर रहे हैं। तीसरे, किसान आंदोलन अब जाट आंदोलन में तब्दील हो रहा है। चौथा, 26 जनवरी की हिंसा के बाद दिल्ली सरहदों, जहां आंदोलनकारी किसान डटे हैं, वहां कील कांटों के साथ किलेबंदी का पूरे देश में गलत संदेश जा रहा है।
संदेश यह है कि सरकार अपने ही किसानों से डरी हुई है। पांचवां, एक हफ्तेह पहले तक यह मुख्य रूप से यह उन किसान संगठनों का आंदोलन था, जो तीनो कृषि कानूनों की वापसी की मांग पर अड़े थे, साथ ही बातचीत (भले ही वह बेनतीजा रही हो) भी कर रहे थे। गैर भाजपाई राजनीतिक दल पर्दे के पीछे से किसान आंदोलन को हवा और दिशा दे रहे थे। लेकिन अब ये राजनीतिक दल भी खुलकर किसान आंदोलन के समर्थन में आ गए हैं और किसानों की लड़ाई को मोदी सरकार के खिलाफ लड़ाई में तब्दील किया जा रहा है।
खासकर के उन राज्यों में जहां, इसी साल या अगले साल विधानसभा चुनाव होने से किसान असंतोष को सियासी दृष्टि से भुनाने की कोशिशें शुरू हो गई हैं। दूसरी तरफ केन्द्र सरकार किसान आंदोलन मामले में असहाय सी नजर आ रही है। सत्तारूढ़ भाजपा के कुछ नेताओं के किसान आंदोलन के लेकर विवादित बयान और सोशल मीडिया पर चल रहे किसान विरोधी अभियान के अलावा ज्यादा कुछ उपाय नजर नहीं आ रहा है।
किसान आंदोलन को देशविरोधी, खालिस्तानी, फर्जी किसानो का आंदोलन साबित करने की तमाम कोशिशों का भी कोई खास नतीजा नहीं निकला है। उल्टे इस आंदोलन को विदेशी समर्थन भी बढ़ता जा रहा है। इसे हमारे आंतरिक मामले में दखलंदाजी मानें तो भी इससे यह संदेश तो जा ही रहा है कि सरकार विदेशों में भी इस मुद्दे को ठीक से ‘मैनेज’ नहीं कर पा रही है।
दिल्ली की तीन सरहदों पर बाड़ाबंदी की पुलिस की यह कार्रवाई प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उस जुमले कि किसानो से बातचीत के बीच बस एक फोन काॅल का फासला है, के ठीक विपरीत है। इससे तो सरकार और किसानों के बीच फासला एक फोन काॅल तो दूर मीलों लंबा हो जाएगा। दरअसल किसान आंदोलन के लेकर जारी गतिरोध टूटने की संभावना तब बनी थी, जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सर्वदलीय बैठक में कहा था कि उनकी सरकार (कृषि मंत्री) किसानों से बस एक ‘फोन कॉल' दूर है और इस मसले का हल बातचीत के जरिए ही निकाला जा सकता है। लेकिन बातचीत में भी दोनो पक्ष अपनी-अपनी बात पर अडिग हैं, इसलिए बातचीत भले चलती रहे, किसी ठोस समाधान की संभावनाएं क्षीण हैं।
किसान आंदोलन के दूसरे चरण में यह मामला और जटिल इसलिए हो गया है कि आंदोलन की मुख्यइ धुरी खुद टिकैत बन गए हैं। बाकी किसान नेता परदे की आड़ में चले गए हैं। 26 जनवरी को तिरंगे के अपमान और दिल्ली में हिंसा से क्षुब्ध कुछ किसान संगठनों ने अपना बोरिया-बिस्तर समेट लिया था। कई आंदोलनकारी किसान घरों को लौटने भी लगे थे। लेकिन उसके दूसरे दिन टिकैत ने जो सहानुभूति बटोरने का दांव चला ( या जिसने भी उनको ऐसा करने की सलाह दी होगी) उससे यकीनन बाजी पलट गई।
भावुक किसान अपने नेता की आन की रक्षा के लिए फिर आंदोलन में लौटने लगे। चूंकि टिकैत भी जाट हैं, इसलिए उनकी मीडिया से उस भावुक बातचीत का बड़ा संदेश उन जाट किसानों के बीच गया, जो इस आंदोलन के बहाने अपनी एकजुटता का प्रदर्शन करना चाहते हैं। इसमें हिंदू, सिख और कुछ मुस्लिम जाट भी शामिल हैं।