उद्धव ठाकरे: राग सेक्युलर आलापना उद्धव को इतना महंगा पड़ा कि उनकी शिवसेना ही उनके यानी ठाकरे परिवार के चंगुल से मुक्त होने की राह पर है।
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महाराष्ट्र की सियासत में अब तक शिवसेना
वस्तुतः महाराष्ट्र में 1987 में शिवसेना-भाजपा भगवा गठबंधन में शिवसेना हमेशा बड़े भाई की भूमिका में रही, लेकिन 2014 में भाजपा से चुनावी तालमेल न होने से उसके विधायकों की संख्या कम हो गई। भाजपा का छोटा भाई बनना उद्धव को मंजूर नहीं हुआ। फिर भी चुनाव के बाद बने भगवा गठबंधन में विधायकों की संभावित बगावत को रोकने के लिए उन्हें न चाहते हुए भी छोटे भाई की भूमिका में आना पड़ा। इससे उद्धव के अहं को जबरदस्त चोट लगी थी। इसे वह भूल ही नहीं सके।
2019 के विधानसभा चुनाव के नतीजे में जब भाजपा की सीट 122 से घटकर 106 होने के बाद उन्हें अपमान का बदला लेने का मौका मिल गया। भाजपा-शिवसेना गठबंधन ने देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में चुनाव लड़ा था, इसके बावजूद उन्होंने भाजपा के सामने ढाई-ढाई साल के मुख्यमंत्री के कार्यकाल की शर्त रख दी। देवेंद्र फडणवीस को दोबारा पांच साल के लिए मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा कर चुकी भाजपा ने उनकी नामंजूर कर दी और गठबंधन टूट गया।
इसके बाद भाजपा को सबक सिखाने के चक्कर में उद्धव ठाकरे मराठा क्षत्रप शरद पवार के चक्रव्यूह में फंस गए और कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ महाविकास अघाड़ी का गठन कर राज्य में सरकार बनाई और खुद मुख्यमंत्री बन गए।
कांग्रेस-एनसीपी ने मिलकर हिंदू हृदय सम्राट बाल ठाकरे की शिवसेना को पूरी तरह ट्रांसफॉर्म कर दिया। उसे एक सेक्यूलर राजनीतिक पार्टी बना दिया जो हिंदू विरोधी कार्य करती दिख रही थी। इससे जो जिंदगी भर शिवसैनिक राग हिंदू आलापता था, वह पशोपेश में पड़ गया। उसे उद्धव का फ़ैसला हज़म ही नहीं हो रहा था।
शिवसेना विधायकों की हालत तो कार्यकर्ताओं से भी बुरी थी। वे देख रहे थे कि उनकी सरकार हिंदुत्व के पैरोकारों की ही खबर ले रही है और शिवसेना की इमेज हिंदू-विरोधी पार्टी की बनती जा रही है। इसे तो वोट देने वाले मतदाता स्वीकार नहीं करेंगे।
विधायकों को लग गया कि उद्धव की हिंदू विरोधी नीति तो उनका राजनीतिक करियर ही खत्म कर देगी। लिहाजा, जन प्रतिनिधियों का शिवसेना में दम घुटने लगा। वे मौका तलाशने लगे और व्यापक जनाधार के बावजूद पार्टी में साइडलाइन किए गए एकनाथ शिंदे ने जब विरोध करने की पहल की तो सभी विधायक उनके साथ हो लिए।
कुल मिला कर यही कहा जा सकता है कि राग सेक्युलर आलापना उद्धव को इतना महंगा पड़ा कि उनकी शिवसेना ही उनके यानी ठाकरे परिवार के चंगुल से मुक्त होने की राह पर है। बागी नेता एकनाथ शिंदे के खेमे में 37 विधायक हो जाते हैं तो बाग़ियों के गुट को मान्यता मिल जाएगी। इसका तात्पर्य यह होगा कि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली बाग़ी शिवसेना ही असली शिवसेना कहलाएगी और उद्धव का गुट अपना परंपरागत चुनाव चिन्ह तीर-धनुष भी गंवा देगा।
एकनाथ शिंदे की बगावत कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी जैसे उन राजनीतिक दलों के लिए खतरे की घंटी हैं, जिन पर एक परिवार विशेष का वर्चस्व है। कांग्रेस पर गांधी परिवार का नियंत्रण है तो समाजवादी पार्टी पर मुलायम सिंह यादव के परिवार का वर्चस्व है। इसी तरह टीएमसी, आरजेडी और एनसीपी पर क्रमशः ममता बनर्जी, लालू परिवार और शरद पवार के परिवार का नियंत्रण है।
इस बगावत से शिवसेना फिलहाल ठाकरे परिवार के चंगुल से मुक्त होने की राह पर पहुंच गई है। अगर उद्धव ठाकरे मजबूरी में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में बने रहने का फैसला करेंगे, उनका शिवसेना पर कोई नियंत्रण ही नहीं रह जाएगा और अगर वह एकनाथ से अलग दूसरी पार्टी बनाएंगे, तब भी ठाकरे परिवार अपना परंपरागत चुनाव चिन्ह तीर-धनुष भी गंवा देगा। इस तरह शिवसेना देश की पहली पार्टी होगी जो शुरू से ही एक परिवार विशेष ने अधीन रहने के बाद अब उस दायरे से बाहर निकल रही है। यह देश की राजनीति में नए युग की शुरुआत होगी।
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