देशभक्ति और स्वाभिमान की अनूठी मिसाल वीर शिरोमणि की उपमा से सुशोभित महाराणा प्रताप 27 वर्ष की उम्र में शासन संभालने के बाद संकल्प के साथ मेवाड़ को मुगलों से मुक्त रखने के लिए 30 वर्षो तक जंगलों, गुफाओं में रहकर और मुश्किलों में घास की रोटी खाकर संघर्षरत रहे।
हल्दीघाटी युद्ध को भारत की थर्मोपॉली कहा जाता है। भारत का आधा राज्य देने तक का भी प्रलोभन भी उन्हें तनिक झुका न सका। प्रताप की यशोगाथा बनाने में भीलों का महत्वपूर्ण योगदान रहा और हल्दीघाटी के जग विख्यात युद्ध में जी जान से लड़े।
मेवाड़ के राज्य चिन्ह में भीलों को यथोचित सम्मान दिया गया। इस बार महाराणा प्रताप जयंती पर उनकी गाथा और ऐतिहासिक घटनाओं को जानते हैं उदयपुर और आस-पास स्थित प्रताप से संबंधित दर्शनीय स्थलों के माध्यम से जिन्हें देखने दुनिया भर के पर्यटक पहुंचते हैं।
उदयपुर से 40 किलोमीटर दूर पीली मिट्टी का दर्रा हल्दीघाटी कहा जाता है। खमनोर एवं बलीचा गांव के मध्य इसी घाटी के दर्रे में 18 जून 1576 ई. को विश्व प्रसिद्ध हल्दीघाटी का युद्ध मेवाड़ के शासक महाराणा प्रताप एवं मानसिंह के नेतृत्व में मुगल सेना के मध्य लड़ा गया।
कुछ घंटों तक चले युद्ध में निर्णायक विजय किसी को भी हासिल नहीं हो सकी। इसी युद्ध में महाराणा प्रताप के सहयोगी झाला मान, हाकिम खान, ग्वालियर नरेश राम शाह तंवर सहित देश भक्त कई सैनिक देशहित में बलिदान हुए। उनके प्रसिद्ध घोडे चेतक ने खुद घायल होकर भी अपनी स्वामिभक्ति का परिचय दिया और महाराणा प्रताप के जीवन की रक्षा कर अपने प्राणों की आहुति दे दी। जहां सैनिकों का रक्त बहा वह स्थल रक्त तलाई कहलाता है।
हल्दीघाटी युद्ध स्थली को देखने के लिए पहले जब सैलानी यहां आते थे तो उन्हें महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक के स्मारक के रूप में बनी एक साधारण सी छतरी देखने को मिलती थी। यहां की पीली माटी जिसके लिए कहा जाता है कि युद्ध जो माटी को चंदन बना गया के प्रति प्रगाढ़ श्रद्धा रहती थी।
कई लोग इस पवित्र माटी को अपने मस्तक पर लगा कर धन्य महसूस करते थे और स्मरण स्वरूप कुछ माटी अपने साथ ले जाते थे। यहां का पहाडि़यों से घिरा प्राकृतिक परिवेश और हल्दीघाटी का संकरा मार्ग भी दर्शनीय होता था। विकास के साथ हल्दीघाटी के दर्रा का स्वरूप बदल गया और अब यहां एक पक्की सड़क बन गई है।
एक पहाड़ी पर महाराणा प्रताप स्मारक भी दर्शनीय है। यहां मुख्य रूप से रक्त तलाई, शाहीबाग, प्रताप गुफा, घोड़े चेतक की समाधि एवं ऊंची पहाड़ी पर महाराणा प्रताप स्मारक दर्शनीय हैं।
हल्दीघाटी से 3 किमी दूर बलीचा गांव में महाराणा प्रताप के जीवन से जुड़े प्रसंगों एवं युद्ध की घटनाओं की स्मृतियों को संजो कर एक पहाड़ी पर खूबसूरत संग्रहालय बनाया गया है। मेवाड़ का राज्यचिन्ह, पन्नाधाय का बलिदान, गुफा में महाराणा प्रताप की अपने मंत्रियों से गुप्त मंत्राणा, शेर से युद्ध करते हुए प्रताप, भारतीय संसद में स्थापित महाराणा प्रताप की झांकी की प्रतिमूर्ति, मानसिंह से युद्ध करते महाराणा प्रताप, महाराणा प्रताप एवं घायल चेतक घोड़े का मिलन, महाराणा प्रताप का वनवासी जीवन के साथ-साथ उनसे जुड़े अन्य प्रसंगों को यहां माडल, चित्रों एवं झांकी के आकर्षक रूप में प्रदर्शित किया गया है।
कृष्ण भक्ति को समर्पित मीराबाई, महाराणा अमर सिंह, महाराणा उदय सिंह, महाराणा संग्राम सिंह (राणा सांगा), महाराणा कुम्भा एवं महाराण बप्पा रावल के पोरट्रेट भी यहां प्रदर्शित किए गए हैं।
इस ऐतिहासिक विरासत का सजीव प्रस्तुतिकरण तथा चित्रण, कलाकृतियों, मूर्तिकला के रूप में तो प्रदर्शित किया ही गया है साथ ही लाइट एवं साऊंड आधारित झांकीयां भी मनोरंजक रूप से बनाई गई हैं। परिसर में एक छोटा सा फिल्म थियेटर भी बना है, जहां आगंतुकों को महाराणा प्रताप के जीवन से संबंधित लघु फिल्म के माध्यम से जानकारी दी जाती है।
संग्रहालय में महाराणा प्रताप के जीवन से जुड़े पक्षों के साथ-साथ अंचल की लुप्त हो रही संस्कृति के संरक्षण की दृष्टि से प्राचीन काल में कुएं से पानी बाहर निकालने के लिए रहट, कोल्हू, चड़स, तेल की घाणी, रथ, बैलगाड़ी, कृषि यंत्र, वाद्य यंत्र, वेशभूषा, बर्तन, ताले, आदि का वृहत संकलन कर उन्हें आकर्षक झांकी के रूप में प्रदर्शित किया गया है।
आने वालों के मनोरंजन के लिए एक कृत्रिम झील बनाई गई है जिसमें बोटिंग की सुविधा भी है। यह संग्रहालय एक अध्यापक मोहनलाल श्रीमाली के जीवन के संघर्षो के बीच उनकी कल्पना और उनके जुनून का जीवंत उदाहरण है। सैलानियों को ही नहीं वरन आने वाली पीढि़यों को यह धरोहर देश भक्ति का संदेश और प्रेरणा देती है।