फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

शांति हीरानंद स्मृति शेष: "वो क्या गए कि बहारों में जी नहीं लगता "

विज्ञापन
डॉक्टर शांतिहीरा नंद जी थीं बेगम अख्तर की शिष्या थींं - फोटो : सोशल मीडिया
विज्ञापन

मल्लिका-ए-ग़ज़ल, पद्म भूषण बेगम अख़्तर साहिबा की रत्न शिष्या कह लें या बेगम साहिबा की रव़ायत को कायम रखने वाली सबसे मजबूत स्तम्भ पद्मश्री स्वर्गीया डॉक्टर शांति हीरानंद जी थीं। इन्होंने बेगम अख्तर की गाई ठुमरी ग़ज़लें और दादरे को इतनी खूबसूरती से गाया कि जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है।

विज्ञापन


डॉक्टर शांति हीरानंद जी का जन्म 1932 में एक बिजनेस फैमिली में लखनऊ  शहर में हुआ था। इनके परिवार के लोग काफी पढ़े-लिखे थे। शुक्रवार 10 अप्रैल 2020 की सुबह जब व्हाट्सप्प देख रही थी तो किसी ने मैसेज भेज रखा था कि शांति हीरानंद जी का देहावसान हो गया है। पढ़कर विश्वास नहीं हुआ। आंखों के सामने से एक सौम्य, शांत व्यक्तित्व की धनी शांतिजी का हारमोनियम के साथ गाता हुआ चेहरा गुजर गया। वो सादगी का प्रतीक थीं। लखनवीं अंदाज़ में बात करने का उनका लहजा उनके व्यक्तित्व में चार चांद लगा देता था। 

शांति जी से मुलाकात 
सन् 2015 में मुझे संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 'सिनियर फेलोशिप' मिला था और मैं हिन्दुस्तान में ठुमरी-दादरा के गायन से जुड़े गायक- गायिकाओं पर अपना शोध कर रही थी। मेरे शोध की विधि 'गहन साक्षात्कार' थी। मुझे शांतिजी का साक्षात्कार लेना था। मेरी गुरु विदुषी सविता जी ने फ़ोन करके साक्षात्कार के लिए समय ले लिया था।
विज्ञापन


मैंने एक छोटा सा तोहफा लिया और उनके घर पहुंच गई। देखते ही मैंने उन्हें प्रणाम किया और वह तोहफा उन्हें दिया तो कहने लगीं तुम ये क्यों ले आई हो। इतने बड़े व्यक्तित्व के समक्ष मैं क्या कहती। धीरे से कहा मैडम इसमें साड़ी है। सुनते ही उनके चेहरे पर बाल सुलभ मुस्कान तैर गई। कहने लगीं-चलो खोलकर दिखाओ। मैंने पैकेट खोला तो बहुत खुश हो गई और कहा बहुत सुन्दर साड़ी लाई हो। 

दरअसल, वो ढ़ाकाई कॉटन की क्रीम कलर की गोल्डन जरी की साड़ी थी। साड़ी मेरे हाथ से लेकर सोफे पर फैला दी और कहने लगीं मुझे ऐसी साड़ियां बहुत पसंद हैं। सविताजी ने तुम्हारे लिए फ़ोन किया था। कहो तुम क्या जानना चाहती हो? उनकी सहजता और सादगी ने दिल जीत लिया था। मैंने पूछा आप ये साड़ी पहनेंगी ना? तो कहने लगीं- बिल्कुल। मनोविज्ञान की छात्रा रही हूं तो लोगों को देखने का नजरिया भी अलग है। सच कहूं तो बड़े लोग कभी आपको अपने सामने छोटा महसूस होने नहीं देते हैं। जो लोग जिंदगी में जितने कामयाब होते हैं वे अंदर से या दिल के भी उतने ही बड़े होते हैं। 
 

विज्ञापन

डॉक्टर शांतिहीरा नंद जी का जन्म 1932 में एक बिजनेस फैमिली में लखनऊ  शहर में हुआ था। - फोटो : सोशल मीडिया
अब मैं साक्षात्कार के कुछ अंश प्रस्तुत कर रही हूं। 
जब उनसे पूछा गया कि क्या आप मानती हैं कि ठुमरी का  उद्गम लखनऊ में हुआ? तो उन्होंने कहा कि ऐसा कुछ नहीं है। पर ये ज़रूर है कि वाज़िद अली शाह ने ठुमरी को खूब बढ़ाया। बिन्दादीन ठाकुरजी ने इसे नृत्य के साथ गाया। एक बात मैं कहना चाहूंगी कि पहले 'हवेली संगीत' हुआ करता था जिसमें भगवान के भजन गाए जाते थे।

उन भजनों को सुबह-शाम के रागों में डालकर गाया जाता था। कहते हैं कि ठुमरी की शुरुआत राधा-कृष्ण के रास से हुई थी तो मैं तो 'हवेली संगीत' को ही ठुमरी के उद्गम का आधार मानती हूं। फिर मैंने पूछा कि जैसा कि हम जानते हैं कि ठुमरी चार अंगों- बनारस, पटियाला, लखनऊ और गया से गाई जाती है। तो लखनऊ बाकी अंगों से कैसे अलग है? तो वो कहने लगीं देखो ठुमरी बनारस, लखनऊ, पंजाब, गया और अन्य प्रांतों में भी गायी जाती हैं। 

पंजाब के काले ख़ां साहब लखनऊ आकर ठुमरी सीखे और इसे पंजाब में प्रचलित किया। माशूक अली ख़ां साहब ने ठुमरी को टप्पा अंग से गाया। एक तरह से फिरत की तानों को डालकर टप्पे अंग से एक विशेष अंदाज में ठुमरी गाई है। और यही 'पंजाब अंग' की ठुमरी की विशेष पहचान बन गई। बनारस में 'हुक' या ' 'पुकार ' के साथ ठुमरी गाते हैं।

पूर्वी उत्तर- प्रदेश में मौसम की वजह से वहां के गायन में भी ठहराव होता है। बनारस की ठुमरी सिद्धेश्वरी देवी से सीखने लायक थी, कैसे बोल बांट और कैसे बोल बनात होता है।  तुम्हारी गुरु को उन्होंने सिखाया है। लखनऊ अंग में 'खटके- मुर्की' का प्रयोग होता है। लखनऊ में उर्दू के प्रभाव से जो नज़ाकत थी उसकी वजह से जो बोल बनते थे वो बड़े नज़ाकत भरे होते थे।

मैं कहूंगी कि बेगम अख़्तर जो फैज़ाबाद की रहने वाली थीं तो उनपर पूरब अंग का प्रभाव तो था ही पर उनके उस्ताद अता मुहम्मद ख़ां साहब पटियाला घराने से थे तो उन पर पटियाले घराने का भी असर था। तो पूरब अंग और पटियाले के मिश्रण से बेगम साहिबा का एक अलग अंदाज था। गया अंग में तीन-चार हारमोनियम के साथ दो- तीन सुरों को लेकर बोल बनाने का रिवाज़ है। 

बातों का सिलसिला आगे चलता रहा फिर मैंने पूछा कि आपने बेगम अख़्तर साहिबा से किस उम्र में सीखना शुरू किया था? तो थोड़ा सोचती हुई बोलीं कि बड़ी छोटी उम्र से मैंने सीखना शुरू कर दिया था। 12 वर्ष की उम्र से मैं रेडियो पर गाती थी। बाद में मैं उस्ताद ऐज़ाज अली ख़ां साहब से सीखना शुरू की। वे बहुत अच्छे गवैया थे पर वो उतने मशहूर नहीं थे। उनसे मैंने तीन चार सीखा था। उससे पहले हम लाहौर में रहते थे वहांं एक संगीत की शिक्षिका ने सुर वगैरह, बंदिशें और पलटे वगैरह मजबूत करा दिए थे और उन्होंने ही रेडियो में मेरा परिचय कराया था।

विभाजन के बाद हम लखनऊ आ गए और एज़ाज़ ख़ांं साहब के बाद  बेगम अख़्तर साहिबा जिन्हे मैं "अम्मी" कहती थी उनकी गंडा बंध शागिर्द बनी। फिर मैंने कभी किसी और गुरु से नहीं सीखा। वो राग भी सिखातीं और ठुमरी ग़ज़लें सब बताती थीं। रिकॉर्ड कुछ नहीं करना था। बस कहतीं कि गाओ मेरे साथ। लेकिन उन्होंने काफी सिखाया। उस वक़्त बहुत सी चीजें समझ में नहीं आती थी, बस याद करती जाती थी मैं पर जैसे-जैसे अनुभव बढ़ता गया चीजें समझ में आती गईं। बहुत सी बंदिशों में त्रुटियां थीं उसे भी मैंने ठीक किया।

वो खुद आगे कहने लगीं कि मेरी फैमिली में मुझसे पहले गानेवाला कोई नहीं था पर मेरी आवाज़ अच्छी थी तो मैं गाने लगी। मेरे माता-पिता का बहुत सहयोग मिला है मुझे। उस ज़माने में संगीत को अच्छी नज़र से नहीं देखते थे पर मेरे परिवार वाले बहुत सहयोग करते थे। मैं बेगम साहिबा के पास कई-कई रातें रुक जाती थी जहां चलें साथ जाती थी पर मेरे माता-पिता ने ना खुद कभी आपत्ति जताई और ना ही और किसी को ही कुछ कहने दिया। 

फिर मैंने पूछा कि शादी के बाद आपके कैरियर पर कोई असर पड़ा? तो कहने लगीं मेरे पति शादी के वक़्त अमेरिका में रहते थे। सरकारी नौकरी पर पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें हिन्दुस्तान बुलाया था।  जब वे यहां आए तो उन्होंने मेरे बारे में सुना। उन्होंने मुझसे विवाह का प्रस्ताव रखा तो मैंने कहा कि मैं शादी उसी शर्त पर करुंगी कि इसका मेरे संगीत पर कोई असर नहीं पड़ेगा। मैं 'अम्मी' (बेगम अख़्तर साहिबा) से मिलती रहूंगी और संगीत जारी रखूंगी।

अम्मी दिल्ली आती थीं। पांच-पांच, छः-छः दिन होटल में ठहरतीं और उस दौरान मैं उन्हीं के साथ रहती पर मेरे पति ने कभी आपत्ति नहीं जताई। देखो सच्चाई यही है कि बिना परिवार के सहयोग के हिन्दुस्तानी महिलाओं के लिए गाना बजाना बहुत ही मुश्किल है। मुझे सहयोग मिला, गुरु मिले, अवसर मिला और मैंने काफी मेहनत की तो मैं गायिका बन गई। 

मैंने कहा कि मतलब आप को संगीत का शौक था? तुरंत बोल पड़ी शौक क्या कहें। ये पता ही नहीं था कि गाना-बजाना क्या होता है? मगर 'अम्मी ' का व्यक्तित्व ऐसा था कि मैं कहीं और जा ना सकी। मैंने भी मोहब्बत से सीखना शुरू किया और वो भी सिखाती रहीं। अम्मी से लगाव बहुत था। ज्यादातर लोग अम्मी से फायदा उठाते थे। मैंने अम्मी पर एक किताब भी लिखी ' द स्टोरी ऑफ माई अम्मी'। मैंने इस किताब में 1952 से लेकर अम्मी के अंत समय तक सारा लिखा। इस किताब में मुझे जो व्यक्तिगत तौर से अनुभव हुआ वो मैंने लिख दिया। 

ये तक़रीबन छः घंटे अर्थात् 2-3 दिनों तक चलने वाला साक्षात्कार था। इसे अब यहीं विराम देना ठीक है। ऊपर के साक्षात्कार से यह तो स्पष्ट है कि गुरु- शिष्य परम्परा का निर्वाह बखूबी किया उन्होंने। वे एक शिक्षित, सरल और आशावादी महिला थीं। उन्हें अपनी शैली का गहन ज्ञान था।

ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे। उन्होंने अपने पीछे अपनी शिष्याओं के अलावा एक पुत्र जो अपने परिवार साथ गुड़गांव में रहते हैं को छोड़ा है। वे कई वर्षों तक त्रिवेणी कला संगम में क्लास लेती थीं। उनकी कई शिष्याएं आज काफी अच्छा गा रही हैं। मृत्यु से एक- दो महीने पहले तक वो अपने घर पर संगीत की शिक्षा देती रहीं। पाठकों हमें इनकी जिंदगी से सीख लेनी चाहिए। कोई भी इंसान ऐसा नहीं है जिसकी जिंदगी में उतार- चढ़ाव नहीं आता है पर इन्होंने इसे अपने जीवन पर हावी नहीं होने दिया था।

कोविड- 19 जैसे वैश्विक संकट की इस घड़ी में समाज में व्याप्त निराशा को दूर करने का एक ही उपाय है कि हम सरकार द्वारा बनाए गए निर्देशों का पालन करें और अपने ध्यान को सकारात्मक और रचनात्मक दिशा में केन्द्रित करें। ऐसा करके हम अपने अंदर एक नई ऊर्जा महसूस करेंगे जो हमें अवसाद और निराशा से लड़ने की ताकत देगी। हमें जरूरतमंद लोगों की मदद करनी चाहिए। ये सभी बातें स्वांतसुखाय में मदद करती हैं।

स्वयं में और अपने बच्चों में अच्छा संगीत सुनने की आदत डालें, अच्छी पुस्तकें, पत्रिकाएं और अख़बार पढ़ने की आदत डालें। ये सब आदतें इस महामारी के संकट से उबरने में मददगार सिद्ध होंगे। एक बार फिर पद्मश्री स्वर्गीय डॉक्टर शांतिहीरा नंद जी को श्रद्धांजलि सुमन अर्पित करते हैं। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे। शकील बदायूंनी की लिखी और शांतिजी की गाई इस ग़ज़ल के साथ मैं अपनी लेखनी को विराम देती हूं। 

"वो क्या गए कि बहारों में जी नहीं लगता 
नज़र, नवाज़ो, नज़ारों में जी नहीं लगता"

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें