राजनीति की उन्हें पहली दीक्षा आचार्य नरेन्द्र देव ने दी थी।
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उन्हें इस हाल में देख सब मुस्कुराए। एक नेता ने मजाक में टिप्पणी की कि-
‘किसी मुख्यमंत्री के ठीक ढंग से गुजारे के लिए कितना वेतन मिलना चाहिए?’ सब हंसने लगे। युवा तुर्क चन्द्रशेखर उठे। उन्होंने अपने लंबे कुर्ते को फैला कर सबसे चंदा मांगना शुरू कर दिया। वह सबके सामने जाकर कहते-कर्पूरी ठाकुर कुर्ता फंड के लिए चन्दा दीजिए। इस तरह चन्द्रशेखर के फैलाए कुर्ते में कुछ सौ रुपए जमा हो गए। ये रुपए कर्पूरी ठाकुर को दिए गए ताकि वह इससे अपने लिए दो जोड़ा अच्छा धोती कुर्ता खरीद लें। कर्पूरी ठाकुर ने रुपए जेब में रखते हुए बड़ी सादगी से कहा- "मैं ऐसा ही ठीक हूं। इसे मैं मुख्यमंत्री राहत फंड में जमा कर दूंगा।"
राजनीति की उन्हें पहली दीक्षा आचार्य नरेन्द्र देव ने दी थी। वे कर्पूरी ठाकुर के गांव के पास एक प्रांतीय किसान सम्मेलन में हिस्सा लेने आए थे। कर्पूरी आचार्य से बहुत प्रभावित हुए। ये 1938 की घटना है जब उनकी उम्र केवल 14 साल की थी। उन्होंने मेट्रिक फर्स्ट क्लास में पास की थी जो ब्रिटिश राज में एक बड़ी घटना थी। आगे की पढ़ाई के लिए पिता जब उन्हें गांव के जमींदार के पास ले गए तो जमींदार ने कहा-
"बहुत अच्छा, अब हमारे गोड़ दबा दो।" इससे कर्पूरी बहुत आहत हुए।
वह अच्छे वक्ता थे और देखते-देखते वह युवाओं में लोकप्रिय हो गए। भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लेने के कारण वह करीब तीन साल जेल में रहे। इस वजह से वह बीए की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए। लेकिन जेल जाने के बाद कर्पूरी अपने इलाके में एक सम्मानित नेता के रूप में स्थापित नेता हो गए। देश आजाद हुआ और 1952 से विधानसभा चुनाव का दौर शुरू हुआ।
जब वे जेल में थे तभी से वह कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी से जु़ड़ गए थे। 1952 में वह पहली बार विधायक बने। इसके बाद वह विधायकी का चुनाव अपने जीवन में कभी नहीं हारे। वह एक बार समस्तीपुर से लोकसभा चुनाव भी जीते।
बिहार की राजनीति शुरू से ही जातिगत चेतना से प्रेरित थी। सत्ता के लिए राजपूत, ब्राह्मण और कायस्थ नेताओं के बीच हमेशा खींचतान रही। इनमें जीतता वही जो दलित, पिछड़ा वर्ग और मुसलमान वोटरों को अपने साथ साध लेता। इस तरह आजादी से पहले से लेकर आजादी के बाद साठ के दशक तक बिहार की राजनीति पर उच्च जातियों के नेताओं का कब्जा रहा। कांग्रेस के नेता कृष्ण सिन्हा 1961 में अपनी मृत्यु तक मुख्यमंत्री रहे। फिर इस कुर्सी पर बिनोदानंद झा जैसे ब्राह्मण नेता का कब्जा हो गया।
भारतीय राजनीति में गैर कांग्रेसवाद के प्रणेता व समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया चाहते थे कि भारत में सारे सोशलिस्ट एकजुट होकर मजबूत मंच बनाए। ये लोहिया का असर था कि 1967 में कई राज्यों में कांग्रेस की करारी हार हुई। हालांकि केंद्र में कांग्रेस जैसे-तैसे सत्ता पर काबिज हो गई। लोहिया के प्रयासों से ही संयुक्त समाजवादी दल का गठन हुआ। सन् 1967 के आम चुनाव में कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व में संयुक्त समाजवादी दल बड़ी ताकत के रूप में उभरी।
1980 के दशक में वही लोग कर्पूरी ठाकुर के विरोधी हो गए जो उन्हें अपना राजनीतिक गुरु कहते नहीं थकते थे।
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राजनीति यात्रा के बीच कर्पूरी ठाकुर
1960 के दशक के अंतिम दौर में पिछड़े वर्गों की एक युवा पीढ़ी शिक्षा में प्रवेश कर चुकी थी। उन दिनों विश्वविद्यालय कालेज के छात्र संघों पर बरसों से सवर्णों का कब्जा था। युवा राजनीति भूमिहार और राजपूत जैसी उच्च जातियों के तीन या चार छात्र नेता ही नियंत्रित करते थे। बिहार के कालेज विश्वविद्यालयों में नए नेताओं की फौज तैयार हो रही थी। पिछड़ा वर्ग के छात्रों को एकजुट करके नीतीश कुमार पटना कॉलेज के अध्यक्ष बने थे। इसी तरह उच्च जातियों के एकाधिकार को तोड़ कर लालू यादव पटना छात्र संघ के अध्यक्ष बने थे।
लालू यादव अपने दिलचस्प और आक्रमक भाषणों के लिए पिछड़ों के बीच मशहूर हो रहे थे। इन्हीं युवा समाजवादियों में एक नाम रामविलास पासवान का भी था। सबने कर्पूरी ठाकुर को अपना राजनीतिक गुुुुरु मान लिया था। बिहार में सभी पिछड़ी जातियां एक मंच पर आने लगीं। नतीजतन 1970 में कर्पूरी बिहार के मुख्यमंत्री बने। उनके 163 दिन के छोटे से कार्यकाल में बड़े क्रान्तिकारी कदम उठाए गए।
मैट्रिक परीक्षा में अनिवार्य विषय के रूप में अंग्रेजी को हटा दी गई। उन्होंने बेरोजगार इंजीनियरों को सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता दी। उनकी सरकार ने मंडल कमीश्न के दस साल पहले ही अति पिछड़ी जातियों के लिए नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 12 फीसद आरक्षण की शुरुआत की। इसे कर्पूरी फार्मूला कहा गया। लेकिन समाजवादियों के आपसी मतभेदों के कारण कर्पूरी की सत्ता ज्यादा दिन नहीं रही।
सत्तर के दशक में हुए जेपी आंदोलन एक टर्निंग प्वाइंट बन गया जब सारे समाजवादी और पिछड़े वर्ग के नेता एक झंडे के नीचे खड़े हो गए। 1973-77 के बीच लोकनायक जयप्रकाश के छात्र-आंदोलन से कर्पूरी भी जुड़ गए। 1977 में समस्तीपुर संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से वह पहली बार सांसद बने। लेकिन बहुत जल्द लोकसभा से इस्तीफा देकर 24 जून, 1977 को कर्पूरी एक बार फिर मुख्यमंत्री बना दिए गए। यह कार्यकाल भी दो साल पूरे नहीं कर पाया। 1980 में मध्यावधि चुनाव हुआ तो कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व में लोक दल बिहार विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरा और कर्पूरी ठाकुर इसके नेता बने।
1980 के दशक में वही लोग कर्पूरी ठाकुर के विरोधी हो गए जो उन्हें अपना राजनीतिक गुरू कहते नहीं थकते थे। वरिष्ठ कांग्रेस विधायक व विधानसभा अध्यक्ष शिवचंद्र झा ने कर्पूरी का तिरस्कार किया।” कर्पूरी लोकदल के नेता विरोधी दल थे। लोकदल के आधे यादव विधायकों ने मिलकर नेतृत्व को चुनौती दे दी। नेता विपक्ष की जगह अनूप यादव ने ले ली और इसके पार्टी की कमान लालू यादव ने संभाल ली।
एक बार तो लालू ने कर्पूरी ठाकुर को 'कपटी ठाकुर' कहकर अपमानित किया था।
तब कर्पूरी ठाकुर ने अफसोस जताते हुए कहा था-
'' अगर मैं भी यादव पैदा हुआ तो मुझे इस तरह के अपमान का सामना नहीं करना पड़ता। बेहद संवेदनशील कर्पूरी यह अपमान सह नहीं पाए। नेता विपक्ष के पद से हटने के तीन साल बाद ही 17 फरवरी 1988 को दिल का दौरा पड़ने से कर्पूरी ठाकुर का निधन हो गया। तब वे केवल 64 साल के थे। लेकिन उनके जाने से पहले बिहार की राजनीति बदल चुकी थी। कर्पूरी ठाकुर के प्रयोगों को विस्तार देते हुए लालू एक कद्दावर नेतर बन कर उभरे थे।
बिहार की राजनीति पर कर्पूरी ठाकुर का जबरदस्त प्रभाव पड़ा। उन्होंने "आजादी और रोटी" का नारा गढ़ा। उनका एजेंडा सामाजिक न्याय और जीवन की गुणवत्ता में सुधार था। इसे उन्होंने अति पिछड़ों के आत्मसम्मान के साथ भी जोड़ दिया। उनका समावेशी नारा विकास और आत्मसम्मान दोनों की बात करता था। कर्पूरी की विरासत लालू ने संभाली। लालू यादव का नारा था- "हमें विकास नहीं सम्मान चाहिए।"
कर्पूरी ठाकुर के देहान्त के तीन साल बाद 1990 में उनकी विरासत लालू ने संभाल ली। लोहिया का सपना पूरा हुआ और बिहार में कांग्रेस मुक्त सरकारों का सिलसिला शुरू हुआ। इसके बाद बिहार की राजनीति की दशा और दिशा हमेशा के लिए बदल गई।
दांव पेंच की जिस राजनीति से आगे बढ़ते हुए लालू-नीतिश कुमार की जोड़ी पिछले तीस साल में इस मुकाम पर पहुंची कि उनके सामने नरेन्द्र मोदी खड़े हैं। मोदी के नेतृत्व ने पिछले दस सालों में बिहार की जातिगत राजनीति के ढांचे को काफी हद तक ध्वस्त किया है। पिछले कुछ चुनावों में विधान सभा और लोकसभा के नतीजों ने बिहार की राजनीति में बदलाव के संकेत दिए हैं।
भाजपा बिहार में तीसरे नम्बर की पार्टी बन गई है। कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देकर मोदी सरकार ने एक बड़ा राजनीतिक दांव खेला है। भाजपा का निशाना अति पिछड़ी जातियों के गैर यादव वोट हैं। बिहार के सवर्ण वोट पहले ही भाजपा के खेमे से जुड़े चुके हैं। भाजपा को लगता है कि अति पिछड़ा वोट बैंक लोकसभा चुनाव में उनकी नैया पार लगा सकता है।
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