मल्लिकार्जुन खरगे की कमान
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कर्नाटक में भाजपा ने प्रधानमंत्री मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत तमाम कद्दावर नेताओं और केन्द्र की पूरी ताकत झोंक दी थी। उसके मुकाबले वहां राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, सोनिया गांधी या मल्लिकार्जुन खरगे की बहुत ही कम सभाएं हुईं, लेकिन कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष डी के शिवकुमार, वरिष्ठ नेता व पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और तमाम स्थानीय नेताओं ने ज़मीनी स्तर पर जो काम किया, उसका असर साफ दिखा।
जिस तरह पिछली बार सरकार बनाकर भी भाजपा के ऑपरेशन लोटस की वजह से सत्ता गंवा देने वाली कांग्रेस भीतर ही भीतर आहत थी, उसकी नाराजगी जनता में भी साफ थी। जिस तरह बोम्मई सरकार लगातार भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी रही और जनता के मुद्दों को नजरअंदाज करती रही, जनता के उन जख्मों पर 'मोदी जी के बजरंगबली' भी मरहम नहीं लगा पाए।
खरगे के नेतृत्व क्षमता पर मुहर
नेतृत्व को लेकर बरसों से जिस तरह कांग्रेस पशोपेश और संकट में घिरी रही, आखिरकार मल्लिकार्जुन खरगे को 19 अक्टूबर 2022 को यह कमान सौंपी गई। इस बारे में सबसे पहले अमर उजाला ने 27 सितंबर को ही खबर दे दी थी कि खरगे कांग्रेस के अध्यक्ष बन सकते हैं। 80 साल के खरगे के अध्यक्ष बनने के बाद से पार्टी में नए उत्साह और ऊर्जा के साथ आगे की रणनीतियां बनने लगीं। हालांकि राहुल गांधी ने 7 सितंबर से ही अपनी भारत जोड़ो यात्रा कन्याकुमारी से शुरू कर दी थी।
केरल के बाद पहला बड़ा पड़ाव कर्नाटक था। जहां राहुल गांधी ने 21 दिनों तक करीब सवा पांच सौ किलोमीटर और आठ अहम जिलों में अपनी यात्रा के दौरान तमाम लोगों के बीच जाकर वहां की समस्याएं सुनीं और मोहब्बत का पैगाम दिया। जाहिर है इसके तुरंत बाद खरगे को पार्टी की कमान मिली और फिर इस यात्रा ने 30 जनवरी तक 12 राज्यों में अपना असर दिखाया।
नवंबर में हुए विधानसभा चुनाव में जिस तरह हिमाचल में कांग्रेस को बड़ी कामयाबी मिली, उससे साफ हो गया कि खरगे के अध्यक्ष बनने के बाद से पार्टी में नई ऊर्जा आई है। अपने गृह राज्य कर्नाटक में चुनाव जीतना खरगे के लिए एक बड़ी चुनौती थी और आखिरकार वहां भाजपा ने असल मुद्दों को दरकिनार कर धार्मिक ध्रुवीकरण की जो कोशिश की उससे खरगे और कांग्रेस को और फायदा पहुंचा। साथ ही कांग्रेस नेताओं पर इसी दौरान की गई कार्रवाइयों ने भी भाजपा के प्रति लोगों के आक्रोश को बढ़ाया और खरगे के नेतृत्व में कांग्रेस की जमीन मजबूत हुई।
जाहिर है अब खरगे के सामने राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे अहम राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों की बड़ी चुनौती है। और उसके बाद सबसे बड़ी चुनौती तो 2024 है ही।
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