भारत में प्रत्येक क्षेत्र की प्रगति में महिलाओं की अग्रणी भूमिका है।
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भारतीय परंपरा में कन्या पूजन की परम्परा आरंभ से ही रही है। चैत्र नवरात्रि के नौ दिन वर्षभर के कार्यों के लिए शक्ति अर्जन के होते हैं। समस्त शक्तियों का वास नौ दुर्गाओं में है। इसलिए नौ दिन तक मां के नौ रूपों की आराधना और उपासना होती है। इन नौ रूपों से ही यह संसार चलायमान हैं। इसीलिए मैं बार बार यह बात दोहराता हूं कि नारी शक्ति के बगैर मानवता के विकास की कल्पना नहीं की जा सकती है। जरूरत इस बात की भी है कि नारी के कमजोर होने, अबला होने के जो नकारात्मक विशेष हैं,उनसे समाज को हम मुक्त करें।
अपनी यह मानसिकता बदलें कि नारी को सहारे की जरूरत है। वह सक्षम है। स्वयंसिद्धा है। अतीत में नहीं जाएं, वर्तमान की ही बात करें तो पता चलेगा राजसमन्द जिले की राखी पालीवाल ने सुबह चार बजे उठकर खुले में शौच के खिलाफ महिलाओं को संगठित करने की पहल की। थोड़े समय में ही परिणाम सकारात्मक रूप में सामने आए और समाज में एक बड़ी मुहिम की संवाहक राखी रूप में नारी शक्ति बनी।
फाइटर पायलट अवनी चतुर्वेदी, भावना और मोहना सिंह सुपर साॅनिक फाईटर जेट उड़ाने के लिए चयनित हुई। कल्पना चावला अंतरिक्ष में पहुंचने वाली पहली महिला बनी। ऐसे ही हर क्षेत्र में महिलाओं को अवसर मिले हैं तो उन्होंने अपना श्रेष्ठतम करने का प्रयास कर देश और समाज में मिसाल कायम की है।
हमारे यहां तो विजय और सफलता की प्रतीक ही देवी रूप में शक्ति की आराधना रही है। मर्यादा पुरूषोत्तम राम ने रावण पर विजय प्राप्त करने से पहले भगवती भवानी की आराधना कर विजय शक्ति प्राप्त की। शिवजी ने भ्रमरम्बा भवानी की आराधना से शक्ति अर्जित की। महाराणा प्रताप ने चामुंडा की पूजा से बल प्राप्त कर मातृभूमि की स्वतंत्रता का शंखनाद किया।
हर युग में, समय में राष्ट्र के साथ समग्र कल्याण के हेतु देवी रूप में नारी शक्ति ही रही है, इसीलिए तो वह ईश्वर की अनुपम कृति है। वह गंगा के समान पवित्र है, पृथ्वी के समान उसमें धैर्य है और हिमालय के समान वह दृढ़ है। आधुनिक संदर्भों में सफल नारियों के बारे में पढ़ेंगे तो यही सभी गुण आंखों के समक्ष कौंधते नजर आएंगे।
इसलिए मैं यह मानता हूं कि यह वह समय है, जब समाज में नारी समानता की नहीं बल्कि उसकी महानता को स्वीकारते सभी क्षेत्रों में उसकी श्रेष्ठता को अवसर देने की जरूरत है। पुरूष तभी सफल है जब उसके साथ नारी है। वह तमाम सफलताएं इसलिए प्राप्त कर पाता है कि परिवार संभालते नारी अप्रत्यक्ष उसकी सभी क्षेत्रो में सफलता की सेतु बनती है। मनुस्मृति में ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः, यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः’ की बात इसीलिए स्वयंसिद्ध है कि जहां नारी की पूजा होती है वहीं देवता वास करते हैं। जहां उसका सम्मान नहीं होता, वहां किए गए समस्त कार्य निष्फल हो जाते हैं। देवता का वास होने का यहां अर्थ है, सारी सिद्धियां और सफलताएं नारी में ही समाहित हैं।
इसलिए मुझे यह भी लगता है नारी को परम्परा में और मर्यादा में रहने की बात कहने वाला समाज का वह वर्ग है जो उसकी शक्ति से भयभीत है। नारी स्वंयसिद्धा हैं। उसकी शक्ति में ही तो सृष्टि के होने का सनातन सच समाया हुआ है।
लेखक राजस्थान के राज्यपाल हैं।
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