सांप को देखते ही शरीर में सिंहरन दौड़ पड़ती है। मनुष्य की इस स्वाभाविक प्रतिक्रिया से समझा जा सकता है कि आखिर झाड़ियों, घास में और बिल में दुबका हुआ सांप कितना खतरनाक होता है। बरसात के इन दिनों में धान आदि की खेती का मौसम है और यही समय सर्पदंश के लिए सर्वाधिक जोखिमपूर्ण है।
दरअसल, सांप के काटने की घटनाएं ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्रों में घटती हैं। इससे आम किसान या कृषि श्रमिक और बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। बच्चों को अक्सर वयस्कों की तुलना में अधिक गंभीर प्रभाव झेलना पड़ता है, क्योंकि उनका शरीर का वजन छोटा होता है। जहरीले सांपों के काटने से कुछ ही समय में मौत से लेकर लकवा, सांस लेने में दिक्कत, रक्तस्राव संबंधी विकार से घातक रक्तस्राव, अपरिवर्तनीय किडनी फेल्यौर, ऊतक क्षति से स्थायी विकलांगता और अंग विच्छेदन हो सकता है।
यह समस्या मुख्य रूप से विकासशील देशों की और खास कर कृषि प्रधान ग्रामीण और वनवासी जनजातियों की है। यह समस्या न केवल स्वास्थ्य संकट पैदा करती है बल्कि सामाजिक और आर्थिक प्रभाव भी डालती है। लेकिन इस समस्या को किसी भी स्तर पर मानव वन्यजीव संघर्ष की अन्य घटनाओं की तरह गंभीरता से नहीं लिया जाता है। संभवतः इसीलिये विश्व स्वास्थ्य
विश्व की आधा सर्पदंश मौतें होती हैं भारत में
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुमान के अनुसार दुनियाभर में हर साल 50.40 लाख लोग सांपों द्वारा काटे जाते हैं और 81,410 से लेकर 1,37,880 तक लोग सर्पदंश से मर जाते हैं तथा लाखों लोग विकलांगता और अन्य गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हो जाते हैं। भारत का यह आंकड़ा और भी चौंकाने वाला है।
हालांकि सर्पदंश पर केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय, विश्व स्वास्थ्य संगठन और नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरों के आंकड़ों में भारी अंतर है। फिर भी सरकार द्वारा गत् 12 मार्च 2024 को भारत में सर्पदंश से होने वाली मौतों की रोकथाम और नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना की शुरुआत के समय जारी विवरण के अनुसार भारत में हर साल लगभग 3-4 मिलियन सर्पदंशों में से लगभग 50,000 मौतें होती हैं, जो वैश्विक स्तर पर होने वाली सभी सर्पदंश मौतों का आधा हिस्सा है।
इधर, विभिन्न देशों में सर्पदंश के शिकार लोगों का केवल एक छोटा सा हिस्सा ही क्लीनिकों और अस्पतालों में रिपोर्ट करता है और सर्पदंश के वास्तविक बोझ की रिपोर्ट बहुत कम की जाती है।
केंद्रीय स्वास्थ्य जांच ब्यूरो की रिपोर्ट (2016-2020) के अनुसार, भारत में सर्पदंश के मामलों की औसत वार्षिक आवृत्ति (फ्रीक्वेंसी) लगभग 3 लाख है और लगभग 2000 मौतें सर्पदंश के कारण होती हैं। जबकि सच्चाई यह है कि भारत में सर्पदंश से होने वाली मौतों की वास्तविक संख्या किसी के पास नहीं है, क्योंकि ले घटनाएं अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों और वन बस्तियों में होती हैं और लोग सांप के काटने पर झाड़ फूंक और घरेलू इलाज पर समय बरबाद कर देते हैं। समय पर सही उपचार न मिलने पर सर्प दंशित व्यक्ति जान गंवा बैठता है। पुलिस और अस्पताल तक मामले न जाने के कारण उनकी रिपोर्टिंग नहीं हो पाती।
मॉनसून का सीजन सर्वाधिक जोखिमपूर्ण
भारत में मॉनसून का मौसम, जो आमतौर पर जून से सितंबर तक चलता है, सांप के काटने के लिए सबसे ज्यादा संवेदनशील अवधि होती है। मॉनसून में भारी बारिश होती हैैं। भारी बारिश से सांपों के आवास नष्ट होते हैं और उनके बिलों में पानी भरता है। इससे सांप भोजन और आश्रय की तलाश में मनुष्यों के रहने वाले क्षेत्रों में चले जाते हैं। मॉनसून का मौसम कृषि गतिविधियों के लिए भी सबसे अच्छा समय होता है। खेतों में काम करने वाले किसान और मजदूर अनजाने में उन सांपों के संपर्क में आ सकते हैं जो ऊंची घास या मलबे के नीचे शरण लिए हुए होते हैं। माना जाता है कि मॉनसून के दौरान नमी का उच्च स्तर सांपों को अधिक सक्रिय बना सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि गर्म, गीली परिस्थितियों में शिकार की उपलब्धता बढ़ सकती है, जिससे सांपों की अधिक गतिविधि हो जाती है।