पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की प्रबल जीत के आसार प्रबल होते ही उनके पार्टी नेताओं, समर्थकों के "खेला' हो गया का प्रलाप करना, उन्हें फाइटर, तृणमल की जीत की राइटर आदि प्रमाणपत्र जारी करना तो जायज था, लेेेेेकिन समस्त गणित को भी एक साथ रखकर कोई यह नहीं बता पा रहा कि भाजपा पश्चिम बंगाल में हारी कैसे है?
अर्थशास्त्र का सिद्धांत है कि हारता वो है जिसके पास पहले से कुछ ज्यादा होता है। यानी तीन रुपए थे, एक रुपया चला गया, या ऐसा ही कुछ और। अब यहां तो रुपया क्या आने-दो आने भी नहीं गए, बल्कि 74 रुपए और आ गए हैं। यही नहीं, सामने जमा राजा भी धूल धूसरित हो गया। और यह सब हुआ केवल पिछले पांच वर्षों में। कुछ और जोड़ें तो आपकी मर्जी, लेकिन यह भी ना भूलें कि भाजपा के पास भाषा की मुश्किल थी, कार्यकर्ताओं की कमतरता थी तो लगातार हिंसा का प्रकोप भी झेलना पड़ा था।
क्या आपको मालूम है कि ममता बनर्जी को वाम सरकार उखाड़ने में कितने वर्ष लगे थे, 13 वर्ष! जबकि वे तो स्थानीय थीं और 1976 से राजनीति में उतरने से पहले छात्र संगठनों में सक्रिय भी रही थीं, कांग्रेस संग गठबंधन भी था?
जी हां, 1998 में कांग्रेस से नाता तोड़ कर उन्होंने तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की और 2011 में सत्ता हासिल की। बावजूद इसके कि उनके साथ कांग्रेस के अनेक दिग्गज नेता व मजबूत काडर भी चला आया था, जो राज्य में वाम शासन से उकता चुका था, या यूं कहें कि कांग्रेस के राज्य में वाम की बी टीम बनते-बनते तंग आ चुका था।
यह भी याद कर लें कि 2001 में तृणमूल ने कांग्रेस से ही हाथ मिलाया और विधानसभा चुनाव में 60 सीटों पर जीतीं। वहीं, यह गठबंधन 2006 के विधानसभा चुनाव में सिर्फ 30 सीटों पर हाथ साफ कर सका। यह भी कि वर्ष 2004 के लोकसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस को राज्य की 42 में महज एक ही सीट मिली थी, वह भी सीट ममता की ही थी।
इस मुकाबले भाजपा हारी है की जीती, तय आपको करना है। यह भी तय कीजिए कि क्या ममता की जीत संभव थी, यदि वे जय श्री राम के नारों पर मुकदमे दर्ज करवाती रहतीं, मां दुर्गा के पंडाल ना लगवाकर छवि ना सुधारतीं और रैलियों में चंडी पाठ ना करतीं? यह भी कि भाजपा को किसी भी कीमत पर रोकने के लिए कांग्रेस, वाम, ओवैसी और पीरजादा छद्म रूप से हथियार ना डालते तो?
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