क्या लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन अब बंगाल की राजनीति में अप्रासंगिक हो चुका है?
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बीते कई दशकों की वजह से गनी खान के कारण मालदा, अधीर चौधरी की वजह से मुर्शिदाबाद और प्रियरंजन दासमुंशी की वजह से उत्तर दिनाजपुर कांग्रेस का सबसे मजबूत गढ़ रहा है। पार्टी को और कहीं से सीटें भले नहीं मिलें, उसे इन तीनों जिलों से खासी सीटें मिल जाती थी। इसी तरह पूर्व बर्दवान और बीरभूम जिला को लेफ्ट का गढ़ माना जाता रहा है।
दरअसल, संयुक्त मोर्चा नेताओं को उम्मीद थी कि आईएसएफ तृणमूल कांग्रेस के मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाएगी और उसका फायदा मोर्चा को मिलेगा। लेकिन यह रणनीति बेअसर रही। भाजपा के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए अल्पसंख्यकों ने एकजुट होकर तृणमूल कांग्रेस का समर्थन किया। प्रदेश कांग्रेस अधीर चौधरी ने मालदा और मुर्शिदाबाद में पार्टी के सफाए के लिए धार्मिक आधार पर हुए ध्रुवीकरण को जिम्मेदार ठहराया है। वह कहते हैं कि इन दोनों जिलों में ऐसा माहौल बनाया गया था कि हिंदू हो तो भाजपा को वोट दो और मुस्लिम हो तो तृणमूल कांग्रेस को।
दूसरी ओर, वाममोर्चा अध्यक्ष विमान बसु ने कहा है कि चुनावी नतीजो पर वे संयुक्त मोर्चा के सहयोगी दलों के साथ विचार-विमर्श करेंगे। यह हमारे लिए एक सबक है। सीपीएम की पोलित ब्यूरो की ओर से जारी बयान में भी लेफ्ट की दुर्गति के लिए ध्रुवीकरण को जिम्मेदार ठहराया गया है। लेकिन सीपीएम नेता और दमदम उत्तर सीट के उम्मीदवार तन्मय भट्टाचार्य ने इसके लिए प्रदेश सीपीएम नेतृत्व को कठघरे में खड़ा किया है। उनका कहना है कि मोर्चा में पीरजादा की पार्टी आईएसएफ को शामिल करने से वोटरों में गलत संदेश गया है। हमें किसी सांप्रदायिक पार्टी का हाथ नहीं थामना चाहिए था।
भाजपा नेता जय प्रकाश मजूमदार कहते हैं कि लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन अब बंगाल की राजनीति में अप्रासंगिक हो चुका है। इसलिए वोटरों ने उनको खारिज कर भाजपा को अकेली विपक्षी पार्टी का दर्जा दिया है। लेकिन कई सीटों पर लेफ्ट व कांग्रेस के वोटरों ने तृणमूल की सहायता की है।
इसबीच, चुनाव में कांग्रेस और सीपीएम का सूपड़ा साफ होने का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा है कि वे नहीं चाहती कि कोई पार्टी इस तरह साफ हो जाए। हमारे राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं लेकिन बीजेपी के कुछ वोट इन दोनों को मिलते तो बेहतर होता।
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