‘द सेवेन मून ऑफ माली एल्मेडा’
शेहान करुणातिलक का दूसरा उपन्यास ‘द सेवेन मून ऑफ माली एल्मेडा’ श्रीलंका के युद्ध काल में मारे गए एक फोटोग्राफर माली अल्मेडा की कहानी है जो अपनी मौत का कारण पता करने के अभियान पर है। उसके पास पता करने केलिए मात्र सात दिन (सेवन मून्स) का समय है। माली अल्मेडा जुआरी और समलैंगिक है। 1990 में मौत के बाद जब वह जगता है, खुद को स्वर्ग के वीजा ऑफिस जैसे स्थान में पाता है।
पहले तो उसे विश्वास ही नहीं होता है कि वह मर गया है, उसने तमाम तरह के ड्रग्स लिए हुए थे, अत: उसे लगता है यह उसी का परिणम है। उनका असर खत्म होते ही सब ठीक हो जाएगा। इसके अलावा वह अपना मरना याद नहीं कर सकता है। अगर वह इन सबको इस भयानक स्वप्न में स्मरण नहीं कर सकता है तो उसकी मौत सत्य नहीं हो सकती है। उसके पास गृहयुद्ध के समय हुए अत्याचारों से जुड़े फोटोग्राफ हैं, जिनके उजागर होने पर हंगामा हो जाएगा। उसके पास अपने सबसे प्यारे लोगों से मिलने और हत्यारों का पता लगाने केलिए मात्र सात चांद का समय है। अभी वह लाइन में खड़ा है और उसे फॉर्म भरना है।
‘श्रीलंका के लोग फांसी के समय भी मजाक करने में माहिर होते हैं।’ कहने वाले उपन्यासकार ने अपना यह उपन्यास भयंकर त्रासद हास्य शैली में लिखा है, जो शैलियों, जीवन-मृत्यु, शरीर-आत्मा, पूर्व-पश्चिम की सीमाओं के पार जाता है। 34 साल का स्मार्ट, खूबसूरत, अभिमानी माली अल्मेडा अपनी अचानक हुई मौत से दु:खी है।
‘द सेवेन मून्स ऑफ माली अल्मेडा’ भविष्य के प्रति आगाह करता है। मरे हुए लोगों की लाइन आगे बढ़ने का नाम नहीं ले रही है। जिन्दा रहते माली अल्मेडा एक फोटोग्राफर था, जो अक्सर ‘गलत स्थानों पर कैमरा पकड़े रहता था।’ वह जो भी देखता, जानता था उसे दुनिया को दिखाने और रिपोर्ट करने को उत्सुक था।
माली अल्मेडा जानना चाहता है कि उसकी हत्या क्यों हुई और किसने की। उसकी मुख्य चिंता अपने बिस्तर के नीचे रखे एक बक्से की है।
शेहान करुणतिलक बताते हैं कि उन्होंने मिथकों का भरपूर उपयोग किया है साथ ही मृतात्मा के सात दिन भटकने के विचार का भी। यह विचार विभिन्न रूपों में पूर्वी धर्मों तथा बौद्ध धर्म में बार-बार आता है। मगर असली बात है, मरने के बाद सरकारी नौकारशाही से टकराना और चारों ओर आत्माओं का भटकना और यह न जानना है कि वे कहां जाएं। अंत में प्रश्न है, क्या यह सब करना मूल्यवान था?
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