एकनाथ शिंदे और उनके समर्थक विधायक शिवसेना की एनसीपी और कांग्रेस के साथ गठबंधन से असंतुष्ट थे।
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महाराष्ट्र में 2022 से अब तक कई महत्वपूर्ण दल बदल और राजनीतिक घटनाक्रम हुए हैं, जो राज्य की राजनीति को प्रभावित कर चुके हैं। खासतौर पर शिव सेना में बड़ा विभाजन और बीजेपी के साथ नया गठबंधन प्रमुख घटनाएं रही हैं। 2022 में शिवसेना के भीतर सबसे बड़ा राजनीतिक संकट तब शुरू हुआ जब एकनाथ शिंदे, जो उस समय उद्धव ठाकरे की महा विकास आघाडी (एमवीए) सरकार में मंत्री थे, ने पार्टी के विधायकों के एक बड़े समूह के साथ बगावत कर दी।
एकनाथ शिंदे और उनके समर्थक विधायक शिवसेना की एनसीपी और कांग्रेस के साथ गठबंधन से असंतुष्ट थे। उनका मानना था कि यह गठबंधन शिवसेना की हिंदुत्ववादी विचारधारा से समझौता कर रहा है। परिणाम यह हुआ कि शिंदे और उनके समर्थक विधायकों ने बगावत कर दी और शिवसेना के लगभग 40 विधायकों को अपने पक्ष में कर लिया। इसके बाद शिंदे ने भाजपा के साथ हाथ मिलाकर सरकार बनाई। 2022 के जून महीने में शिंदे ने मुख्यमंत्री पद संभाला और भाजपा के देवेंद्र फडणवीस उपमुख्यमंत्री बने।शिव सेना का औपचारिक विभाजन हुआ और शिव सेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) और शिव सेना (एकनाथ शिंदे गुट) के रूप में दो धड़े सामने आए।
सियासत में बदलाव और पुरानी परिपाटी
2023 में महाराष्ट्र की राजनीति में एक और बड़ा घटनाक्रम तब हुआ जब एनसीपी में शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने बगावत कर दी। अजित पवार ने पार्टी के एक बड़े धड़े के साथ एनसीपी से अलग होकर भाजपा और एकनाथ शिंदे की सरकार में शामिल होने का फैसला किया। वह महाराष्ट्र सरकार में उपमुख्यमंत्री बने और उनके साथ कई एनसीपी नेता भी सरकार में शामिल हुए। एनसीपी का भी औपचारिक विभाजन हो गया। शरद पवार ने अजित पवार के कदम की आलोचना की और कहा कि एनसीपी में बगावत से पार्टी को नुकसान हुआ है। हालांकि, एनसीपी का अजित पवार धड़ा अब राज्य सरकार का हिस्सा है।
महाविकास आघाड़ी गठबंधन का हिस्सा कांग्रेस भी थी। कांग्रेस ने भी महाराष्ट्र में दल बदल देखे। भाजपा और शिंदे गुट के साथ कई नेताओं ने कांग्रेस छोड़ दी। नारायण राणे महाराष्ट्र के एक प्रमुख नेता रहे हैं, जिन्होंने शिव सेना से राजनीति की शुरुआत की थी। शिव सेना छोड़ने के बाद वे कांग्रेस में शामिल हो गए और राज्य के मुख्यमंत्री भी बने। लेकिन 2017 में नारायण राणे ने कांग्रेस से इस्तीफा दिया और अपनी पार्टी 'महाराष्ट्र स्वाभिमान पक्ष' बनाई। बाद में वे भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हो गए।
राणे अभी लोकसभा के सदस्य हैं। राधाकृष्ण विखे पाटिल महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता थे। वे राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता भी रहे। 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों से पहले उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दिया और भाजपा में शामिल हो गए। इसके पीछे मुख्य कारण उनके बेटे सुजय विखे पाटिल का कांग्रेस में स्थान न मिलना था। हरिभाऊ बागड़े
कांग्रेस से शिव सेना में (1980 के दशक में) और फिर बीजेपी में चले गए। हरिभाऊ बागड़े, जो बाद में महाराष्ट्र विधानसभा के अध्यक्ष बने, कांग्रेस के सक्रिय नेता थे, लेकिन उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा देकर पहले शिवसेना और फिर भारतीय जनता पार्टी का रुख किया। कृष्णा खोपड़े कांग्रेस से बीजेपी में (2014): नागपुर से ताल्लुक रखने वाले कृष्णा खोपड़े भी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे। 2014 में उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा देकर भाजपा का दामन थाम लिया। वह नागपुर क्षेत्र में सक्रिय हैं और महाराष्ट्र विधानसभा के सदस्य भी रहे हैं। अशोक चव्हाण, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री ने बीजेपी की सदस्यता ली और राज्यसभा सदस्य हैं।
महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपनी पहचान 1980 के दशक में बनानी शुरू की, लेकिन 1995 में जब भाजपा-शिवसेना गठबंधन सत्ता में आया, तब इसे एक प्रमुख पार्टी के रूप में मान्यता मिली। भाजपा धीरे-धीरे महाराष्ट्र के ग्रामीण क्षेत्रों और शहरी मध्यम वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत करती रही।
2022 में महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा उथल-पुथल तब हुआ जब शिवसेना का विभाजन हो गया। 2023 में शरद पवार की एनसीपी भी विभाजन का शिकार हो गई, जब उनके भतीजे अजित पवार ने बागी होकर भाजपा के साथ गठजोड़ किया। शरद पवार और अजित पवार के बीच विभाजन ने राज्य की राजनीति में अनिश्चितता बढ़ा दी।
महाराष्ट्र की राजनीति जटिल मोड़ पर है। शिवसेना का विभाजन और एनसीपी में गुटबाजी इसे जटिल बनाते हैं। उद्धव ठाकरे की शिव सेना (यूबीटी), एनसीपी (शरद पवार धड़ा) और कांग्रेस का गठबंधन भविष्य में फिर से सक्रिय हो सकता है, खासकर अगर वे भाजपा के खिलाफ एकजुट होकर लड़ने का निर्णय लेते हैं। शरद पवार की रणनीति और नेतृत्व इस गठबंधन के भविष्य को तय करेंगे। अजित पवार बीजेपी के साथ कितने समय तक बने रहते हैं, यह भी सवाल है। क्या एनसीपी का उनका धड़ा राज्य की राजनीति में लंबी अवधि तक प्रभावी रह पाता है या वे खुद शरद पवार के साथ चले जाएंगे, यह अनिश्चित है।
महाराष्ट्र के आगामी चुनावों में महाराष्ट्र की राजनीति में और भी बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं, खासकर 2024 के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर। ऐसे में यह कहना मुश्किल है कि कौन किसके साथ जाएगा, लेकिन यह स्पष्ट है कि महाराष्ट्र की राजनीति में बदलाव का दौर चलता रहेगा, और यहाँ की राजनीति देश की राजनीति पर भी गहरा प्रभाव डालती रहेगी।
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