1997 की ‘सेवेन ईयर्स इन तिब्बत’ को जीन जेकब एनौड ने निर्देशित किया है और इस बायोपिक का लेखन स्वयं हैनरिच हैरेर ने बेकी जॉनसन के साथ मिल कर किया है। तीन पुरस्कार जीतने वाली इस फिल्म में हैनरिच हैरेर की भूमिका प्रसिद्ध अभिनेता बैड पिट ने की है। अपनी गर्भवती पत्नी को छोड़कर जब यह पर्वातारोही तिब्बत में है तभी चीन तिब्बत को हथियाता है। आया तो यह जुनूनी पर्वत चढ़ने है मगर फंस जाता है तिब्बत की हलचल भरी राजनीति में। वह युद्ध बंदी हो जाता है और वहां से किसी तरह निकलता है।
इस फिल्म में पहली फिल्म से कई घटनाएं भिन्न हैं, शायद इसीलिए इसकी लंबाई (सवा दो घंटे) भी अधिक है। चीन के दमन को यहां दिखाया गया है।
सवा दो घंटे की फिल्म- ‘कुंदन’
1997 में ही एक और फिल्म तिब्बत पर आई, नाम है ‘कुंदन’ (निर्देशक: मार्टिन स्कोरसेसी)। यह सवा दो घंटे की फिल्म 14वें दलाई लामा के बचपन से उनकी युवावस्था तक के जीवन, चीन के दमन और तिब्बत की अन्य समस्याओं को दिखाती है मगर इसे बनाने वाले पिछली उल्लेखित दो ‘सेवेन ईयर्स इन तिब्बत’ की भांति तिब्बत के लोग नहीं हैं। मगर जब भी तिब्बत के सिनेमा इतिहास की बात होगी इन फिल्मों का जिक्र आएगा ही।
जिस फिल्म निर्देशक ने इक्कीसवीं सदी में तिब्बत के सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय फलक पर प्रसिद्धि दिलाई है उसके योगदान की चर्चा किए बिना तिब्बत का सिने-इतिहास पूरा नहीं हो सकता है। इस प्रसिद्ध निर्देशक का दुर्भाग्यवश हाल में निधन हो गया है। पेमा सिडेन (3 दिसम्बर 1969 - 8 मई 2023) की 2011 की फिल्म ‘ओल्ड डॉग’ ने अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में खूब नाम कमाया। यह उनकी तीसरी फिल्म थी इसके पूर्व उन्होंने ‘द साइलेण्ट होली स्टोन्स’ तथा ‘द सर्च’ तिब्बत आधारित फिल्में बनाई थीं।
तिब्बत पर गैर-तिब्बती, तिब्बती तथा तिब्बती प्रवासियों ने फिल्म बनाई हैं। विदेशी तथा तिब्बत में अब भी रह रहे फिल्मकारों की बात ऊपर लिखी है। प्रवासी तिब्बतियों ने कई फिल्में बनाई हैं। उनके मन में तिब्बत को लेकर लगाव एवं कसक है। ऐसे ही एक फिल्म निर्देशक हैं, तेन्जिन सोनम। उन्होंने अपनी साथी ऋतु सरीन के साथ मिल कर ‘व्हाइट क्रेन फिल्म्स’ की स्थापना की।
कभी तेन्जिन सोनम ने अकेले और कभी ऋतु सरीन के साथ मिलकर फीचर फिल्में, डॉक्युमेंट्री फिल्में बनाई हैं। वे भारत के धर्मशाला नामक स्थान में रहते हैं। तिब्बत में आध्यत्मिकता के अलावा स्वतंत्रता फिल्मों की थीम है।
दोनों ने मिलकर बीस से अधिक डॉक्युमेंट्री तथा दो ड्रमेटिक फिल्में बनाई हैं। उन्होंने अपना विषय तय कर रखा है, वे हर फिल्म में तिब्बत के मुद्दों को उठाते हैं। उनकी फिल्में देश-विदेश के फिल्म समारोहों में दिखाई जाती हैं, उन पर कई प्रमुख पत्रिकाओं में लेख मिलते हैं। उनकी कुछ फिल्मों के नाम उनके मन्तव्य को स्पष्ट कर देते हैं।
‘द सन बिहाइंड द क्लाउड: तिब्बत’स स्ट्रगल फॉर फ्रीडम’, ‘द थ्रेड ऑफ कर्मा’, ‘ड्रीमिंग ल्हासा’, ‘द सीआईए इन तिब्बत’, ‘ए स्ट्रेन्जर इन माई नेटिव लैंड’, ‘तिब्बत’, ‘द ट्रायल ऑफ टेलो रिन्पोचे’, ‘द रिइनकार्नेशन ऑफ खेन्सुर रिन्पोचे’ आदि उनकी फिल्म के नाम हैं। उन्होंने ‘फिल्म्स ऑन हिस होलीनेस द दलाई लामा’ नाम से 1988 में एक वीडियो फिल्म भी बनाई है।
‘व्हील ऑफ टाइम’ (2003), ‘मिलरेपा’ (2006), ‘माउंटेन पेट्रोल’ (2004), ‘पाथ्स ऑफ द सोल’ (2015), ‘बिकमिंग हू आई वाज’ (2017) आदि इस सदी में तिब्बत पर बनने वाली फिल्में हैं। अभी तो शुरुआत हुई है, आगे तिब्बत के सिने-निर्देशकों से काफी उम्मीदें हैं।
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