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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: आध्यात्मिकता की ओर उन्मुख तिब्बत सिनेमा

सार

तिब्बत के फिल्म निर्माताओं को राजनैतिक तथा सामाजिक दृष्टि से खासतौर पर सावधान रहना पड़ता है, फिर भी तिब्बत के लोग, जिसमें प्रवासी तिब्बती शामिल हैं, फिल्म बना रहे हैं। चीन अधिकृत तिब्बत में रहते हुए पेमा सिडेन तथा सोंथर गियाल फिल्में बना रहे हैं।
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तिब्बत का सिनेमा - फोटो : Istock
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विस्तार
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हमारा पड़ोसी देश तिब्बत भी सिनेमा बनाता है, यह बात कई लोगों के लिए आश्चर्यचकित करने वाली है। यह सत्य है, तिब्बत में फिल्में बनती हैं और दूसरे देशों में रहने वाले तिब्बत के लोग भी फिल्म बनाते हैं। तिब्बती भाषा में भी फिल्में बनती हैं। ये फिल्में अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में प्रदर्शित होती हैं। हां, इनका विषय आम फिल्मों से तनिक हट कर होता है।

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चीन के जबरदस्ती अधिकृत करने के बाद तिब्बत के लोग, खासकर बौद्धिक लोग तिब्बत छोड़ने को बाध्य हुए। इनमें से कलाकार प्रवृति के कुछ लोगों की रुचि सिनेमा में थी। ये तिब्बत से बाहर रहते हुए, तिब्बत पर आंख रखते हुए फिल्म बनाने की दिशा में सक्रिय रहे। ये अपनी सभ्यता-संस्कृति से जुड़े लोग हैं। तिब्बत की राजनैतिक तथा भौगोलिक चुनौतियों का समाना करते हुए फिल्म बना रहे हैं और अपनी संस्कृति का अन्वेषण कर रहे हैं।

संगीतज्ञ, पेंटर, लेखक अपना काम स्वयं कर सकते हैं, उन्हें अपने कार्य के प्रसार-प्रचार के लिए दूसरों पर निर्भर करना पड़ता है। फिल्म बनाने हेतु प्रारंभ से दूसरों की जरूरत होती है। फिल्म बनाना एक टीम वर्क है। इसके बनाने में बहुत खर्च आता है, अत: फाइनेंसर चाहिए होता है, फोटोग्राफर, एडीटर, डिस्ट्रिब्यूटर आदि की आवश्यकता होती है। कहने का मतलब है फिल्म को एक जटिल नेटवर्क चाहिए होता है।

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फिल्मों पर सेंसरशिप की तलवार

फिल्म को लेकर चीन का प्रशासन बहुत सख्त है, चीन में बनी फिल्मों पर भी सेंसरशिप की तलवार लटकती रहती है। तिब्बत उसका बहुत संवेदनशील इलाका है इसलिए स्वायत्त तिब्बत इलाके में बनने वाली फिल्मों के लिए चीनी प्रशासन के नियम और अधिक कठोर हैं। उन्हें विशेष अनुमति की आवश्यकता होती है। तिब्बत के फिल्म निर्देशकों केलिए यह एक बड़ी चुनौती है।

तिब्बत के फिल्म निर्माताओं को राजनैतिक तथा सामाजिक दृष्टि से खासतौर पर सावधान रहना पड़ता है, फिर भी तिब्बत के लोग, जिसमें प्रवासी तिब्बती शामिल हैं, फिल्म बना रहे हैं। चीन अधिकृत तिब्बत में रहते हुए पेमा सिडेन तथा सोंथर गियाल फिल्में बना रहे हैं। सोंथर गियाल फिल्म निर्देशक तथा सिनेमाटोग्राफर हैं।

अपनी पहली फिल्म ‘द सन बीटेन पाथ’ का लेखन एवं संपादन भी उन्होंने स्वयं किया है। उनकी यह रोड मूवी तिब्बत के मिथक को न दिखाते हुए हिमालय के इस भू-भाग की सपाट, वनस्पति विहीन प्रकृति को कैमरे से बखूबी पकड़ती है। फिल्म में एक युवा नीमा (येशे हार्दुक) बहुत परेशान है और पश्चाताप मुक्ति केलिए वह यात्रा पर जाते हुए एक वृद्ध (लो ची) से मिलता है। मगर वृद्ध का दोस्ती केलिए बढ़ा हाथ वह ठुकरा देता है।

2011 की ड़ेढ़ घंटे की यह फिल्म ‘द सन बीटेन पाथ’ कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह का हिस्सा रही और इसने चार पुरस्कार जीते। यह फिल्म तिब्बत में रह रहे निर्देशकों के दृष्टिकोण का एक नमूना है, जो वहां रहते हुए भी वहां के कठिन जीवन को दिखा रहे हैं।

मगर इसके बहुत पहले 1957 तथा 1997 में एक ही शीर्षक से दो फिल्में बनीं। इनका नाम है, ‘सेवेन ईयर्स इन तिब्बत’। 1957 की फिल्म हैन्स निएटर ने बनाई थी। इस सवा घंटे की फिल्म में एक ऑस्ट्रियन पर्वातारोही हैनरिच हैरेर जाता तो हिमालय चढ़ने है मगर युद्ध बंदी बन जाता है। किसी तरह वह वहां से छूट निकलता है और तिब्बत के 14वें दलाई लामा से दोस्ती करता है। फिल्म में स्वयं हैनरिच हैरेर तथा दलाई लामा ने भूमिकाएं की हैं।

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सिनेमा का इतिहास - फोटो : Istock
1997 की ‘सेवेन ईयर्स इन तिब्बत’ को जीन जेकब एनौड ने निर्देशित किया है और इस बायोपिक का लेखन स्वयं हैनरिच हैरेर ने बेकी जॉनसन के साथ मिल कर किया है। तीन पुरस्कार जीतने वाली इस फिल्म में हैनरिच हैरेर की भूमिका प्रसिद्ध अभिनेता बैड पिट ने की है। अपनी गर्भवती पत्नी को छोड़कर जब यह पर्वातारोही तिब्बत में है तभी चीन तिब्बत को हथियाता है। आया तो यह जुनूनी पर्वत चढ़ने है मगर फंस जाता है तिब्बत की हलचल भरी राजनीति में। वह युद्ध बंदी हो जाता है और वहां से किसी तरह निकलता है।

इस फिल्म में पहली फिल्म से कई घटनाएं भिन्न हैं, शायद इसीलिए इसकी लंबाई (सवा दो घंटे) भी अधिक है। चीन के दमन को यहां दिखाया गया है।

सवा दो घंटे की फिल्म- ‘कुंदन’

1997 में ही एक और फिल्म तिब्बत पर आई, नाम है ‘कुंदन’ (निर्देशक: मार्टिन स्कोरसेसी)। यह सवा दो घंटे की फिल्म 14वें दलाई लामा के बचपन से उनकी युवावस्था तक के जीवन, चीन के दमन और तिब्बत की अन्य समस्याओं को दिखाती है मगर इसे बनाने वाले पिछली उल्लेखित दो ‘सेवेन ईयर्स इन तिब्बत’ की भांति तिब्बत के लोग नहीं हैं। मगर जब भी तिब्बत के सिनेमा इतिहास की बात होगी इन फिल्मों का जिक्र आएगा ही।

जिस फिल्म निर्देशक ने इक्कीसवीं सदी में तिब्बत के सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय फलक पर प्रसिद्धि दिलाई है उसके योगदान की चर्चा किए बिना तिब्बत का सिने-इतिहास पूरा नहीं हो सकता है। इस प्रसिद्ध निर्देशक का दुर्भाग्यवश हाल में निधन हो गया है। पेमा सिडेन (3 दिसम्बर 1969 - 8 मई 2023) की 2011 की फिल्म ‘ओल्ड डॉग’ ने अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में खूब नाम कमाया। यह उनकी तीसरी फिल्म थी इसके पूर्व उन्होंने ‘द साइलेण्ट होली स्टोन्स’ तथा ‘द सर्च’ तिब्बत आधारित फिल्में बनाई थीं।

तिब्बत पर गैर-तिब्बती, तिब्बती तथा तिब्बती प्रवासियों ने फिल्म बनाई हैं। विदेशी तथा तिब्बत में अब भी रह रहे फिल्मकारों की बात ऊपर लिखी है। प्रवासी तिब्बतियों ने कई फिल्में बनाई हैं। उनके मन में तिब्बत को लेकर लगाव एवं कसक है। ऐसे ही एक फिल्म निर्देशक हैं, तेन्जिन सोनम। उन्होंने अपनी साथी ऋतु सरीन के साथ मिल कर ‘व्हाइट क्रेन फिल्म्स’ की स्थापना की।

कभी तेन्जिन सोनम ने अकेले और कभी ऋतु सरीन के साथ मिलकर फीचर फिल्में, डॉक्युमेंट्री फिल्में बनाई हैं। वे भारत के धर्मशाला नामक स्थान में रहते हैं। तिब्बत में आध्यत्मिकता के अलावा स्वतंत्रता फिल्मों की थीम है।

दोनों ने मिलकर बीस से अधिक डॉक्युमेंट्री तथा दो ड्रमेटिक फिल्में बनाई हैं। उन्होंने अपना विषय तय कर रखा है, वे हर फिल्म में तिब्बत के मुद्दों को उठाते हैं। उनकी फिल्में देश-विदेश के फिल्म समारोहों में दिखाई जाती हैं, उन पर कई प्रमुख पत्रिकाओं में लेख मिलते हैं। उनकी कुछ फिल्मों के नाम उनके मन्तव्य को स्पष्ट कर देते हैं।

‘द सन बिहाइंड द क्लाउड: तिब्बत’स स्ट्रगल फॉर फ्रीडम’, ‘द थ्रेड ऑफ कर्मा’, ‘ड्रीमिंग ल्हासा’, ‘द सीआईए इन तिब्बत’, ‘ए स्ट्रेन्जर इन माई नेटिव लैंड’, ‘तिब्बत’, ‘द ट्रायल ऑफ टेलो रिन्पोचे’, ‘द रिइनकार्नेशन ऑफ खेन्सुर रिन्पोचे’ आदि उनकी फिल्म के नाम हैं। उन्होंने ‘फिल्म्स ऑन हिस होलीनेस द दलाई लामा’ नाम से 1988 में एक वीडियो फिल्म भी बनाई है।

‘व्हील ऑफ टाइम’ (2003), ‘मिलरेपा’ (2006), ‘माउंटेन पेट्रोल’ (2004), ‘पाथ्स ऑफ द सोल’ (2015), ‘बिकमिंग हू आई वाज’ (2017) आदि इस सदी में तिब्बत पर बनने वाली फिल्में हैं। अभी तो शुरुआत हुई है, आगे तिब्बत के सिने-निर्देशकों से काफी उम्मीदें हैं।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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