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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: समर 43- मानवता की रक्षा

सार

‘समर 43’ फिल्म का निर्देशन अनिता गोलेबिवस्का (बुसोल्ड) ने किया है, उन्होंने ने ही स्क्रिप्ट तैयार की है। वे स्वयं निर्देशक, स्क्रीनप्ले राइटर के अलावा अभिनेत्री भी हैं। उन्होंने 2020 में ‘100 ईयर्स’ का लेखन किया।
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विश्व सिनेमा का इतिहास - फोटो : Istock
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विस्तार
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होलोकास्ट मनुष्यता के चेहरे पर घिनौना दाग है, जिसे किसी भी तरह मिटाया नहीं जा सकता है। इस काल में घृणा के तहत क्रूरतम हिंसा की गई। हिटलर के क्रूर काल पर बहुत साहित्य रचा गया है। कुछ काल्पनिक हैं, कुछ भुक्त भोगियों द्वारा रचित। यूरोप के तकरीबन सब देशों में होलोकास्ट पर रचा साहित्य मिलता है। इसमें पोलैंड से आने वाला होलोकास्ट साहित्य भी समाहित है।

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होलोकास्ट साहित्य पढ़ना जितना त्रासद अनुभव है, कई बार उससे भयंकर अनुभव है, होलोकास्ट पर बनी फिल्मों को देखना है। कुछ फिल्में इस काल की सत्य घटनाओं पर बनी हैं। उनमें से एक फिल्म है, ‘समर 43’ जिसपर बात करने जा रही हूं।

इस अमानवीय काल पर नरेटिव और डॉक्यूमेंट्री दोनों तरह की फिल्में बनी हैं।

होलोकास्ट पर बनी फिल्मों की मेरी सूचि में जो फिल्में शीर्ष पर आती हैं, वे हैं- रोमन पोलांस्की कृत ‘द पियानिस्ट’, एलान जे. पाकुला की ‘सोफीज च्वाइस’, इस्टवान सजाबो निर्देशित ‘सनशाइन’, टिम ब्लेक नेल्सन की ‘द ग्रे जोन’, निकी कारो निर्देशित ‘जू कीपर्स वाइफ’ आदि।
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‘जू कीपर्स वाइफ’ डाइने एकमैन की किताब पर आधारित है और इसका स्क्रीनप्ले एन्जेला वर्कमैन ने तैयार किया है। जिस फिल्म ‘समर 43’ की बात करने जा रही हूं, उसमें और ‘जू कीपर्स वाइफ’ में कुछ समानताएं हैं। दोनों वास्तविक जीवन पर आधारित हैं। दोनों का घटना स्थल पौलैंड है।


‘जू कीपर्स वाइफ’ फिल्म

‘जू कीपर्स वाइफ’ फिल्म में पोलैंड में चिड़ियाघर चलाने वाला डॉक्टर जान जाबिन्स्की (जोहान हेल्डेनबर्ग) तथा उसकी पत्नी अंटोनिया जाबिन्स्की (जेसिका चैस्टैन) रह रहे हैं। दम्पति प्रतिकार दस्ते में काम करते हुए, अपनी जान की बाजी लगा कर सैंकड़ों यहूदियों को वार्सा घेटो से निकाल कर सुरक्षित रखते हैं, यातना शिविर से बचाते हैं। ये लोग इस अत्यंत कठिन समय में करीब 300 यहूदियों की जान बचा पाए।

जब किसी को दबाया जाता है तो वह प्रतिरोध करता है। जीव फन उठा कर खड़ा हो जाता है, सींग मारता है, दुलत्ती झाड़ता है, हुरपेटता है, मतलब भरसक प्रतिरोध करता है। प्रतिरोध सदैव मुखर हो, यह आवश्यक नहीं है, वह मौन हो सकता है, मौन-मुखर हो सकता है। प्रतिरोध सृजनात्मक और ध्वंसात्मक हो सकता है।

जब हम प्रतिरोध की बात करते हैं तो सब से पहले मन में हिंसा की छवि उभरती है। इसी तरह की आम धारणा आंदोलन को लेकर भी हैं। आंदोलन का अर्थ है- जुलूस निकालना, जोर-जोर से नारे लगाना, धरना देना, चीखना-चिल्लाना। झाडू-बेलन, ब्रा लहराते हुए सड़क पर निकलना। प्रतिरोध सकारात्मक-सृजनात्मक हो सकता है/ होता है यह बात पहले हमारे दिमाग में नहीं आती है। जबकि कई ऐसे प्रतिरोध, ऐसे आंदोलन हुए हैं। ऐसे कई सकारात्मक, अहिंसक प्रतिरोध हुए हैं।

भारतीय साहित्य तथा विश्व साहित्य में हमें ऐसे कई सक्षम उदाहरण मिलते हैं। लोगों ने अपने सम्मान, अपनी अस्मिता की लड़ाई बिना हिंसा के लड़ी है और सफल हुए हैं। कई बार सफल नहीं भी हुए हैं, लेकिन इससे उनका हस्तक्षेप अनदेखा नहीं किया जा सकता है। उन्होंने ऐसा प्रयास किया यह बात सफलता-असफलता से अधिक मायने रखती है।

जब सिनेमा का आविर्भाव हुआ, उसमें भी स्वत: यह तरह का प्रतिरोध चला आया। सिनेमा में भी ऐसे चरित्र नजर आते हैं, जिन्होंने प्रतिरोध का रास्ता अपनाया है। सिनेमा में हमें नकारात्मक अर्थात मारकाट वाला प्रतिरोध अक्सर दीखता है। बदला लेने के लिए हत्या, मारपीट, षडयंत्र जैसे हिंसात्मक और नकारात्मक तरीके मुझे नहीं भाते हैं, इसीलिए एनएच 10 फिल्म मेरी दृष्टि में कई विशेषताओं के बावजूद एक अच्छी फिल्म नहीं है।

कई ऐसी फिल्में हैं, जिनमें किरदार ने समाज और समय में सकारात्मक-सृजनात्मक हस्तक्षेप किया है। वह अपना प्रतिरोध दर्ज करता है, मगर इसके लिए हिंसक नहीं बल्कि अहिंसक मार्ग अपनाता है।

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सिनेमा - फोटो : Instagram
अभी हाल में एक इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (मुंबई स्टूडेंट इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल) में ज्यूरी मेम्बर के रूप में एक फिल्म ‘समर 43’ देखी। ज्यूरी में होने का एक लाभ यह है कि आप कई ऐसी उत्तम फिल्म देखते हैं, जो शायद कभी नहीं देख पाते। इस ज्यूरी में मेरे साथ दो अन्य सदस्य- असम की कई फिल्म फेस्टिवल की डॉयरेक्टर मोनिटा बोरोगोहैन तथा रोमानिया की प्रोफेसर डैनिएका रोगोबेटे थीं। प्रतियोगिता में देश-विदेश से कुल 13 फिल्में शामिल थीं।

हिटलर-काल आधारित फिल्मों पर मेरा काम पहले से है और यह फिल्म भी उसी क्रूर काल को दिखाती है। मगर बिना किसी हिंसा-अत्याचार के। इतिहास के इस काले अध्याय पर ढेरों फिल्में बनीं हैं। कुछ फिल्में इस क्रूर काल में मानवता और जिजीविषा बची रहने को चित्रित करती हैं। दानवी हिटलर सेना के समक्ष कुछ लोग डट कर खड़े थे, वे जान की बाजी लगा कर चुपचाप अपना काम कर रहे थे। पोलैंड की फिल्म ‘समर 43’ यही दिखाती है। सत्य घटना पर आधारित फिल्म जीवन संरक्षण के मूल्य अन्वेषित करती है।

‘समर 43’ फिल्म

‘समर 43’ फिल्म का निर्देशन अनिता गोलेबिवस्का (बुसोल्ड) ने किया है, उन्होंने ने ही स्क्रिप्ट तैयार की है। वे स्वयं निर्देशक, स्क्रीनप्ले राइटर के अलावा अभिनेत्री भी हैं। उन्होंने 2020 में ‘100 ईयर्स’ का लेखन किया।

‘समर 43’ उनकी डिप्लोमा फिल्म है। इस फिल्म में समर 1943 में पोलैंड के एक गांव में गर्भवती जोसिया (सोनिया मिटिलिका) और उसकी मां (एना मोस्काल) जोसिया की सहेली एक यहूदी स्त्री रुटा (सिल्विया गोला) को छिपाती हैं, नाजी अत्याचार से सुरक्षित रखती हैं। सोचा जा सकता है कितना जोखिम वे उठाती हैं। हिटलर की विशाल सत्ता के समक्ष ये निहत्थी स्त्रियां डट कर खड़ी हैं और चुपचाप, सकारात्मक रूप से अपना प्रतिरोध दर्ज करती हैं।

जर्मन भी ईसाई थे, ये स्त्रियां भी ईसाई हैं। ये स्त्रियां मानवता की रक्षा कर रही हैं, दो यहूदी जीवन बचा रही हैं। सृजन, रक्षा, मैत्री के समक्ष विध्वंस कितना बौना हो जाता है।

हिटलर के संगठन में अनुशासन पर बहुत बल था। मगर यह अनुशासन दूसरों के लिए भय पैदा करने के काम आता था। इस फिल्म में भी यह दिखता है। फिल्म में हिटलर के सैनिक कुछ पलों के लिए आते हैं और उतने समय में बिना कुछ बोले भय, दहशत और क्रूरता साकार कर देते हैं।

स्थिति बहुत विकट हो जाती है, जब शिशु जन्मता है। वे दाई नहीं बुला सकती हैं और प्रसव जटिल है। कई जिंदगियां दांव पर लगी हुई हैं। कुल 27 मिनट की यह शॉर्ट फिल्म मित्रता के मूल्य, साहस पर टिकी है। मित्रता किसी नस्ल, रंग, जाति, धर्म को नहीं मानती है यह इसके परे जाती है। यह कहानी है, मनुष्य की शक्ति, उसके लचीलेपन की।

यह कहानी है, उसकी आशा, प्रेम, प्रतिदान की। यह कहानी है मनुष्य की मित्रता और एकता की। अक्सर कहा जाता है हिटलर का किसी ने प्रतिरोध नहीं किया। ‘समर 43’ की सत्य घटना मौन-सकारात्मक-सृजनात्मक प्रतिरोध का जीता-जागता उदाहरण है।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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