अभी हाल में एक इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (मुंबई स्टूडेंट इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल) में ज्यूरी मेम्बर के रूप में एक फिल्म ‘समर 43’ देखी। ज्यूरी में होने का एक लाभ यह है कि आप कई ऐसी उत्तम फिल्म देखते हैं, जो शायद कभी नहीं देख पाते। इस ज्यूरी में मेरे साथ दो अन्य सदस्य- असम की कई फिल्म फेस्टिवल की डॉयरेक्टर मोनिटा बोरोगोहैन तथा रोमानिया की प्रोफेसर डैनिएका रोगोबेटे थीं। प्रतियोगिता में देश-विदेश से कुल 13 फिल्में शामिल थीं।
हिटलर-काल आधारित फिल्मों पर मेरा काम पहले से है और यह फिल्म भी उसी क्रूर काल को दिखाती है। मगर बिना किसी हिंसा-अत्याचार के। इतिहास के इस काले अध्याय पर ढेरों फिल्में बनीं हैं। कुछ फिल्में इस क्रूर काल में मानवता और जिजीविषा बची रहने को चित्रित करती हैं। दानवी हिटलर सेना के समक्ष कुछ लोग डट कर खड़े थे, वे जान की बाजी लगा कर चुपचाप अपना काम कर रहे थे। पोलैंड की फिल्म ‘समर 43’ यही दिखाती है। सत्य घटना पर आधारित फिल्म जीवन संरक्षण के मूल्य अन्वेषित करती है।
‘समर 43’ फिल्म
‘समर 43’ फिल्म का निर्देशन अनिता गोलेबिवस्का (बुसोल्ड) ने किया है, उन्होंने ने ही स्क्रिप्ट तैयार की है। वे स्वयं निर्देशक, स्क्रीनप्ले राइटर के अलावा अभिनेत्री भी हैं। उन्होंने 2020 में ‘100 ईयर्स’ का लेखन किया।
‘समर 43’ उनकी डिप्लोमा फिल्म है। इस फिल्म में समर 1943 में पोलैंड के एक गांव में गर्भवती जोसिया (सोनिया मिटिलिका) और उसकी मां (एना मोस्काल) जोसिया की सहेली एक यहूदी स्त्री रुटा (सिल्विया गोला) को छिपाती हैं, नाजी अत्याचार से सुरक्षित रखती हैं। सोचा जा सकता है कितना जोखिम वे उठाती हैं। हिटलर की विशाल सत्ता के समक्ष ये निहत्थी स्त्रियां डट कर खड़ी हैं और चुपचाप, सकारात्मक रूप से अपना प्रतिरोध दर्ज करती हैं।
जर्मन भी ईसाई थे, ये स्त्रियां भी ईसाई हैं। ये स्त्रियां मानवता की रक्षा कर रही हैं, दो यहूदी जीवन बचा रही हैं। सृजन, रक्षा, मैत्री के समक्ष विध्वंस कितना बौना हो जाता है।
हिटलर के संगठन में अनुशासन पर बहुत बल था। मगर यह अनुशासन दूसरों के लिए भय पैदा करने के काम आता था। इस फिल्म में भी यह दिखता है। फिल्म में हिटलर के सैनिक कुछ पलों के लिए आते हैं और उतने समय में बिना कुछ बोले भय, दहशत और क्रूरता साकार कर देते हैं।
स्थिति बहुत विकट हो जाती है, जब शिशु जन्मता है। वे दाई नहीं बुला सकती हैं और प्रसव जटिल है। कई जिंदगियां दांव पर लगी हुई हैं। कुल 27 मिनट की यह शॉर्ट फिल्म मित्रता के मूल्य, साहस पर टिकी है। मित्रता किसी नस्ल, रंग, जाति, धर्म को नहीं मानती है यह इसके परे जाती है। यह कहानी है, मनुष्य की शक्ति, उसके लचीलेपन की।
यह कहानी है, उसकी आशा, प्रेम, प्रतिदान की। यह कहानी है मनुष्य की मित्रता और एकता की। अक्सर कहा जाता है हिटलर का किसी ने प्रतिरोध नहीं किया। ‘समर 43’ की सत्य घटना मौन-सकारात्मक-सृजनात्मक प्रतिरोध का जीता-जागता उदाहरण है।
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