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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: इंगमर बर्गमैन बन गया स्क्रीनप्ले राइटर

सार

चालीस साल के दौरान इंगमर ने  करीब 60 फिल्में लिखीं, 170 नाटक लिखे तथा 100 किताबें लिखीं। करीब 90 मिनट की उनकी फिल्मों की थीम बहुत अनोखी होती थी और वे जोखिम उठाते थे, इसी कारण वे आने वाले कुछ बड़े निर्देशकों की प्रेरणा रहे।
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सिनेमा का इतिहास - फोटो : istock
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विस्तार
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विश्व प्रसिद्ध निर्देशक इंगमर बर्गमैन संयोग से स्क्रीनप्ले राइटर बन गए। 14 जुलाई 1918 को स्वीडन में जन्मे बर्गमैन नाटक लिख रहे थे और इन नाटकों का सफल प्रदर्शन हो रहा था। एक नाटक ‘कैस्पर’स डेथ’ का निर्देशन करने का अवसर उन्हें मिला। नाटक के कई शो हुए और वह सफल रहा।

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स्टीना बर्गमैन उपन्यासकार-नाटककार यलमर (Hjalmar) बर्गमैन की विधवा थीं, वे स्वेन्स्क फिल्म इंडस्ट्री स्टूडियो के स्क्रिप्ट विभाग की प्रमुख थीं। साथ ही अमेरिकन फिल्म ड्रामा तकनीक की विशेषज्ञ थीं। उन्होंने इंगमर बर्गमैन के कुछ नाटक देखे थे और वे उनसे प्रभावित थीं। जब समय आया उन्होंने इंगमर को बुलाया और करारनामे के तहत कुछ समय के लिए उन्हें अपने विभाग में रख लिया।

शुरू में उनका काम बहुत बोरिंग था। उन्हें एक जाने-माने लेखक के भयंकर स्क्रीनप्ले को सुधारना था। जब वे नए संस्करण के साथ गए, तो उनके काम को अच्छा माना गया। पर उस स्क्रीनप्ले पर कभी फिल्म नहीं बनी। लेकिन इंगमैन को मासिक वेतन पर स्क्रिप्ट राइटर की नौकरी पर रख लिया गया। उन्हें विभाग में डेस्क, टेलीफ़ोन और अपना ऑफिस मिल गया।
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ये बातें इंगमर बर्गमैन ने अपनी किताब ‘इमेजेस: माई लाइफ इन फिल्म’ में लिखी हैं। उनका काम था सुबह नौ बजे से शाम पांच बजे तक अपने टेबल पर बैठ कर उपन्यासों, कहानियों अथवा आई हुई सिनॉप्सिस से स्क्रीनप्ले तैयार करने की कोशिश करना। विभाग प्रमुख दोस्ताना व्यवहार रखती, मगर कड़क स्वभाव की थीं। इंगमर जब यहां आए वे अपनी अधूरी कहानी ‘टोरमेंट’ (फ़्रेंजी) भी साथ लेते आए थे।

स्क्रीनप्ले की दिनचर्या

दिन के पहले भाग में उनके अनुसार वे गुलाम का काम करते अर्थात दूसरों का काम सुधारते या साहित्य को फिल्म में ढालते, अर्थात उससे स्क्रीनप्ले बनाते और दूसरे हिस्से में अपनी कहानी पर जम कर काम करते। एक बार उन्होंने एक की जगह दो स्क्रीनप्ले वहां आगे बढ़ा दिए। जाहिर-सी बात है, उनकी कहानी पर उनका लिखा स्क्रीनप्ले पसंद किया गया लेकिन स्टीना ने उनके डार्कनेस तथा भयंकर बातों के प्रति प्रेम केलिए उन्हें थोड़ा डांटते हुए कहा, ‘कभी-कभी तुम बिल्कुल यलमर की तरह हो!’

यह सुनते ही इंगमर सातवें आसमान पर पहुंच गए, उन्हें लगा यह अवश्य ही ‘उच्च शक्ति’ का संदेश है। भीतर वे थोड़ा गर्व से भरे हुए कांपते रहे। यलमार से तुलना उनके लिए बहुत बड़ी बात थी, वह भी यलमार की पत्नी द्वारा। कारण था, इंगमर बर्गमैन यलमर बर्गमैन को अपना आदर्श मानते थे।

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Cinema - फोटो : istock
एक और संयोग घटा। स्वेन्स्क फिल्म इंडस्ट्री का स्टूडियो उस समय 25 साल पूरे कर रहा था, उन लोगों ने एक खास वार्षिक समारोह करना तय किया। यह सालगिरह 1944-45 सेशन में पड़ रही थी और इस अवसर पर स्टूडियो गुणवत्ता पूर्ण छ: फिल्में बनाने जा रहा था। उन लोगों ने कई निर्देशक किराए पर रखे हुए थे, जिनमें एल्फ शोबर्ग भी थे। समस्या यह थी कि एल्फ शोबर्ग के लिए कोई स्क्रिप्ट नहीं थी और उसी समय स्टीना बर्गमैन को ‘टोरमेंट’’ की याद आई।  फिल्म ‘टोरमेंट (1944) बनी, इसके साथ अनूठे इंगमर बर्गमैन स्क्रीनप्ले राइटर की  राह पर चल पड़े।

अजीब ढंग से बने सिने-निर्देशक

इसी तरह अजीब ढंग से इंगमर बर्गमैन सिने-निर्देशक बन गए। पर वह बात फिर कभी और। अभी उनके स्क्रिप्ट राइटर व्यक्तित्व पर ही बात करती हूं। वे कुशल लेखक थे, उनकी आत्मकथा ‘द मैजिक लैंटर्न’ से भला कौन सिने-प्रेमी परिचित नहीं है। बहुत ईमानदारी से लिखी गई है, यह किताब।

स्क्रिप्ट राइटिंग में भी उनके काम को बिल्कुल अलग तरह से पहचाना जा सकता है, उस पर उनके व्यक्तित्व की गहरी छाप होती है। पादरी एरिक बर्गमैन के पुत्र इंगमर बर्गमैन अपने काम में नैतिकता के मुद्दे उठाते हैं, मानवीय संबंधों की खोज करते है, ये संबंध आदमी-आदमी के बीच होते हैं, साथ ही वे आदमी और ईश्वर के संबंध की पड़ताल करते हैं। उन्होंने टीवी तथा फीचर फिल्म दोनों के लिए स्क्रिप्ट लेखन किया।

अपनी फिल्म-स्क्रिप्ट में छाया का गत्यात्मक प्रयोग, चेहरे का क्लोजअप्स और घड़ी के डायल का क्लोजअप्स उनकी एक विशेषता है। इसी तरह उनकी फिल्मों में दो पात्र खूब गहन-सघन बातचीत करते हैं, संवाद करते हैं, अक्सर गर्मागरम बहस करते हैं, मगर वे एक-दूसरे की ओर देखते नहीं हैं। आंख-में-आंख डाल कर बात नहीं करते हैं।

चालीस साल के दौरान उन्होंने करीब 60 फिल्में लिखीं, 170 नाटक लिखे तथा 100 किताबें लिखीं। करीब 90 मिनट की उनकी फिल्मों की थीम बहुत अनोखी होती है और वे जोखिम उठाते हैं। इसी कारण वे आने वाले कुछ बड़े निर्देशकों की प्रेरणा रहे। वूडी एलेन, डेविड लिंच, मार्टिन स्कोर्सिसे, फ़्रांसिस फ़ोर्ड कोपोला, डेविड फ़िंसर, एन्ग ली, स्टीवन शोडर्बर्ग आदि उनमें से कुछ निर्देशक हैं।

यदि इंगमर बर्गमैन ने विपुल लेखन किया तो उन पर भी खूब लेखन हुआ है। विपुल लेखन करने वाले बर्गमैन के दृश्य यथार्थ और फंतासी को लांघ कर काल्पनिक कहानी कहने के मर्म तक जाते हैं। ये दृश्य यह भी दिखाते हैं कि बर्गमैन काल्पनिक दुनिया में सृजन के पलों में चरित्र के साथ कैसा खिलवाड़ करते हैं। अगर इसको ठीक से समझना है तो उनकी ‘नोटबुक’ पढ़नी होगी। अपनी नोटबुक में कभी वे खुद से बातचीत करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे बच्चे खेल रचते समय अथवा दिवास्वप्न में खुद से बात करते हैं।

बर्गमैन की नोटबुक की सहायता से उनके स्क्रीनप्ले लेखन, उनकी फिल्मों का पठन-पाठन होता है। खासकर उनकी फ़िल्म ‘स्माइल्स ऑफ़ ए समर नाइट’ (1955), ‘परसोना’ (1966), ‘द साइलेंस’ (1963) का अध्ययन केलिए खूब उपयोग होता है। द साइलेंस’ को अंतरराष्ट्रीय सफलता मिली, लेकिन इसके सेक्स दृश्यों के कारण इसे कई देशों में प्रतिबंधित भी किया गया था।

उन्होंने अपनी अधिकांश फिल्मों के स्क्रीनप्ले खुद लिखे। इनमें ‘द सेवंथ सील’ (1957), ‘वाइल्ड स्ट्राबेरीज’ (1957), ‘द मैजिसियन’ (1958), ‘शेम’ (1968),  ‘सीन्स फ़्रॉम ए मैरिज’ (1974), ‘द मैजिक फ़्लूट’ (1975), ‘फ़ेस टू फ़ेस’ (1976), ‘द सरपेंट’स एग’ (1977), ‘ऑटम सोनाटा’ (1978), ‘द मेकिंग ऑफ़ ऑटम सोनाटा’ (1978), ‘फ़ेनी एंड एलेक्जेंडर’ (1982), ‘फ़ेथलेस’ (1999), ‘परसोना’, आदि प्रसिद्ध हैं। ‘शेम’ की प्रशंसा उनके आलोचक भी करते हैं।

पिता पादरी थे तो जाहिर है, बहुत कठोर स्वभाव के थे। वैसे भी उन दिनों पिता का मतलब था तानाशाह। अत: बचपन में उन्हें सिनेमा देखने की इजाजत नहीं थी। मगर उनकी दादी उन्हें छिपा कर फिल्म दिखाने ले जाती थीं। तब कौन जानता था यह व्यक्ति आगे चल कर सोते-जागते फिल्म की दुनिया में सांस लेगा। सात बच्चों के पिता और चार बार शादी करने वाले इंगमैन की चारों शादी का अंत तलाक में हुआ। सिनेमा को अपनी ‘मिस्ट्रेस’ (who considered cinema to be merely his ‘mistress’) मानने वाले इंगमर बर्गमैन जिस महीने में पैदा हुए उसी महीने में उनकी मृत्यु हुई। वे 30 जुलाई 2007 को पकी उम्र में गुजरे। मगर उनका काम उन्हें सदा अमर रखेगा।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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