हिंदी बेशक विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है परंतु अपने ही देश में हिंदी उपेक्षित होती है।
- फोटो : अमर उजाला
भविष्य की सभी संभावना का रास्ता आम नागरिक अंग्रेजी में देखता है
लेकिन सवाल यह है कि भले ही हिंदी संपर्क भाषा हो लेकिन क्या यह सही मायने में राजभाषा के रूप में भी स्थान बना पाई है? नहीं, बल्कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी अंग्रेजी ही हमारी राजभाषा है। हिंदी को राजकाज की भाषा के रूप में बचाए रखने के लिए हमने अंग्रेजी से हिंदी अनुवादकों की नियुक्ति कर दी। ताकि हिंदी भाषा का महत्व बचा रहे।
क्या हिंदी का संघर्ष उसका अनुवाद किया जाना व उस अनुवाद के माध्यम से उसके अस्तित्व को बचाना है? क्या राजभाषा के रूप में हिंदी का अपना अस्तित्व नहीं है? क्यों आज भी अपने ही देश में प्रथम भाषा के रूप में अंग्रेजी और द्वितीय भाषा के रूप में हिंदी को स्वीकार्यता है। वैश्विक स्तर पर हिंदी की स्वीकार्यता हिंदी पर गर्व तो कराती है लेकिन अपने ही देश में हिंदी की जो स्थिति है, उसे देखकर दुख भी होता है। दरअसल, भविष्य की सभी संभावनाओं का रास्ता एक आम नागरिक अंग्रेजी में देखता है। क्योंकि बचपन से अंग्रेजी का दबाव उसकी सफल व्यक्ति की गणना का मानक है।
सुधार की पहली प्रक्रिया घर से आरंभ होती है परंतु घर के भीतर तो हिंदी से ज्यादा अंग्रेजी का वर्चस्व है।
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युवा हिंदी से अधिक अंग्रेजी से प्रेम करते हैं, क्यों?
वह इसे कहीं बाहर से नहीं बल्कि अपने ही परिवेश से सीख रहा है। उसका सामाजिक परिवेश उसे परीक्षाओं से लेकर बड़े पद तक पहुंचने में अंग्रेजी की उपयोगिता का अहसास करा देता है। वैश्विक मंचों पर आयोजित पहचान की भाषा भी अंग्रेजी ही बनकर उभरती है। हिंदी आज भी द्वितीय भाषा ही है। युवा हिंदी से अधिक अंग्रेजी से प्रेम करता है क्योंकि भविष्य की भाषा अंग्रेजी है। रोजगार, सूचनाओं में हिंदी से अधिक अंग्रेजी का दबदबा है।
आज हिंदी बेशक विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है परंतु अपने ही देश में हिंदी उपेक्षित होती है। हिंदी का एक क्षेत्र खुद को हिंदी भाषी कहकर हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने की मांग करता है तो दूसरा क्षेत्र खुद को गैर हिंदी से अधिक अंग्रेजी का मानता है। हिंदी और अंग्रेजी का झगड़ा अपने ही घर में आज भी चल रहा है और अंग्रेजी आज भी राजभाषा के रूप में वर्चस्व बनाए हुए है।
हिंदी जब अपने घर में उपेक्षित होती है तो घर से बाहर भी उसका सम्मान नहीं होता है। वैश्विक परिदृश में हिंदी का बढ़ता हुआ स्वरूप दरसल बाजार का प्रभाव है। विकसित देशों के लिए हमारा देश आज सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार है और उसमें निवेश करना फायदे का सौदा। यही कारण है कि पूंजी और बाजार ने हिंदी को विश्व मंच दिया है। यह तो हुई घर से बाहर अर्थात वैश्विक परिदृश्य में हिंदी की बात। हमारे अपने घर में हिंदी की क्या स्थिति है एक नजर इस पर डालना अनिवार्य है। सुधार की पहली प्रक्रिया घर से आरंभ होती है परंतु घर के भीतर तो हिंदी से ज्यादा अंग्रेजी का वर्चस्व है। केवल सहित्यिक गोष्ठियों में ही हिंदी भाषी होने का अहसास होता है अन्यथा तो अंग्रेजी ने ही अपना दबदबा बरकरार रखा है।
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