ग्लेशियरों के पीछे खिसकने से बढ़ रहा है खतरा
उत्तराखण्ड अंतरिक्ष उपयोग केन्द्र (यूसैक) के निदेशक और जानेमाने भूविज्ञानी डाॅ. महेन्द्र प्रताप सिंह बिष्ट के अनुसार हिमालय के निरन्तर उठते जाने से भू-आकृति भी बदल रही है। इसके साथ ही ग्लेशियर के पिघलने की गति बढ़ने के कारण ऐसी झीलों की संख्या काफी बढ़ रही है।
डॉ. बिष्ट का कहना है कि ऐसी झीलों या तालाबों के निकट या उनके ऊपर हिमखण्ड स्खलन, भूस्खलन, जलसंग्रहण क्षेत्र में बादल फटने, बड़े भूकम्प और भूगर्वीय हलचल से इस तरह की ग्लेशियल लेक या फट जाती हैं जिससे एक साथ विशाल जलराशि मोरेन के मिट्टी, पत्थर, रेत-बजरी आदि मलबे के साथ ढलान वाली निचली घाटी क्षेत्र में भारी तबाही मचा देती है।
उत्तराखण्ड पर मंडरा रहा 13 झीलों का खतरा
इस तरह की झीलों के फटने का ज्यादा खतरा भूटान, तिब्बत, नेपाल, भारत और पाकिस्तान को शामिल किया गया है। भारतीय हिमालय का पूर्वी हिस्से का ज्यादा संवेदनशील चिह्नित किया गया था लेकिन केदारनाथ की बाढ़ के बाद वैज्ञानिकों का ध्यान उत्तराखण्ड हिमालय पर केन्द्रित हुआ तो स्थिति और भी चौंकाने वाली सामने आई।
भारतीय भू-गर्भ विज्ञान सर्वेक्षण विभाग के पूर्व महानिदेशक डॉ. रनजीत रथ ने हाल ही विभागीय सर्वे के आधार पर खुलासा किया था कि उत्तराखण्ड हिमालय की 468 हिमनद झीलों में से 13 झीलें बाढ़ की दृष्टि से काफी संवेदनशील हैं।
डॉ. रथ के अनुसार-
जून 2013 की केदारनाथ के ऊपर चोराबाड़ी हिमनद झील के फटने से आयी बाढ़ के बाद भू-गर्भ विज्ञान सर्वेक्षण विभाग ने 2014 से लेकर 2016 तक हिमालयी हिमनद झीलों का अध्ययन किया था। इस सर्वे में अकेले ऋषिगंगा और धौलीगंगा के उद्गम क्षेत्र में 71 झीलें पाई गईं।
यूनिवर्सिटी ऑफ पोट्सडम, जर्मनी के इंस्टीट्यूट ऑफ जियो साइंस तथा इंस्टीट्यूट आफ इनवायर्नमेंमेंटल साइंस एण्ड जियॉलाजी के एक साझा अध्ययन में हिमालय पर मोरैन द्वारा रोकी गयी हिमनद झीलों की संख्या 5 हजार से अधिक बताई गई हैं और इनमें से कई सुप्रा टाइप की झीलों के फटने से 21वीं सदी में ही सिन्धु, गंगा और ब्रह्मपुत्र बेसिनों में विनाशकारी बाढ़ की आशंका जताई गई है। इस अध्ययन के अनुसार हिमनद झीलों के कारण विश्व में सबसे अधिक खतरा हिमालय में ही उत्पन्न होता है।
उपग्रह चित्रों से पहचानी गई खतरनाक होती झीलें
द इंडियन सोसाइटी ऑफ रिमोट सेंसिंग के जर्नल में 2016 में प्रकाशित के. बाबू गोविन्धाराज और के. विनोद कुमार के शोधपत्र ‘‘इनवेंटरी ऑफ ग्लेशियर लेक्स एण्ड इट्स इवोल्यूशन इन उत्तराखण्ड हिमालया यूजिंग टाइम सीरीज सेटेलाइट डाटा’’ के अनुसार-
उत्तराखण्ड हिमालय में चिह्नित कुल 5 तरह की 362 हिमनद झीलों में से 8 संवेदनशील हैं जो कि विभिन्न कारणों से फट कर निचली घाटियों में विनाशकारी बाढ़ ला सकती हैं। इन दानों में एक वैज्ञानिक इसरो और दूसरा नेशनल रिमोट सेसिंग सेंटर से संबंधित है। ये अध्ययन अमेरिकी उपग्रह कोरोना और हैक्साजन द्वारा द्वारा लिए गए उपग्रह चित्रों के आधार पर किया गया है। ये उपग्रह चित्र सीआइए द्वारा 1995 में सार्वजनिक किए किए ।
उत्तराखण्ड में झीलें फटने से विनाशकारी बाढ़ का इतिहास
उत्तराखण्ड में इस तरह हिमालयी झीलों के बनने और फटने की घटनाओं का पुराना इतिहास रहा है। सन् 1868 में बिरही नदी के अवरुद्ध होने के बाद बनी झील के टूटने से 73 लोग मारे गये थे उसके बाद इसी तरह गौणाताल का निर्माण हुआ और जब वह टूटा तो फिर अलकनन्दा में बाढ़ आ गई। उत्तरकाशी में समुद्र सतह से 10 हजार फुट की ऊंचाई पर असी गंगा के उद्गम वाली डोडीताल झील की गहराई का अब तक वैज्ञानिक पता नहीं लगा पाए।
डोडीताल की ही तरह 16 हजार फुट से अधिक ऊंचाई पर एक और विशाल झील है। इन दोनों झीलों में ही लाखों घन मीटर पानी है। आसपास ही कई छोटी झीलें भी हैं। यदि कभी इनके आसपास बादल फटा तो पानी के साथ आने वाले मलबे से कई गांव एवं उत्तरकाशी तबाह हो सकता है।
चण्डी प्रसाद भट्ट ने सुझाया 5 देशों का मोर्चा
यूसैक के निदेशक डॉ. महेन्द्र प्रताप सिंह बिष्ट के अनुसार केवल पुराने उपग्रह चित्रों के आधार पर किसी हिमनद झील को खतरनाक या संवेदनशील घोषित करना व्यवहारिक नहीं है, क्योंकि ग्लेशियरों के सिकुड़ने से इन झीलों का आकार बदलने के साथ ही इनकी संख्या में भी बदलाव आ जाता है। कुछ स्थानों पर एक ग्लेशियर की जगह तीन-तीन ग्लेशियर बन चुके हैं, इसलिए इनकी निगरानी का डाटा भी जरूरी है।
डॉ. बिष्ट के अनुसार फिलहाल सुप्रा टाइप की बसुधारा झील काफी संवेदनशील नजर आ रही है, जिसकी मॉनिटरिंग की जरूरत है।
प्रख्यात पर्यावरणविद् पद्मभूषण चण्डी प्रसाद भट्ट का कहना है-
हिमालय एक अत्यन्त गंभीर विषय है जिसके लिए केन्द्र सरकार में एक अलग से विभाग होना चाहिए और भारत सरकार को हिमालय से संबंधित 5 देशों का एक साझा मंच बनाने की दिशा में पहल करनी चाहिए।
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