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ईद 2022: प्यार, भाईचारे और दिलों में मोहब्बत भरने का पर्व

सार

एक लंबे अर्शे के बाद रमज़ान में पहले जैसी रौनक नज़र आयी। ईद की तैयारियों में वो पहले जैसे रौनक देख दिल में एक सुकूँ लौटा है यकीनं सभी की दुआओं में खुदा से यही फ़रियाद है कि अब न वो दर्द का मंजर लौटे अब न वो अपनों से बिछुड़ने का मौसम हो, अब न घरों से सिसकियों की सदा आए खुदा अपने कहर से दुनिया को बचाये रखे। हमें वो ताकीद दे की हम हर जीव से मोहब्बत बरतें।
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बीते दो सालों से कोरोना के चलते दुनिया गमगीन है, सहमी हुई है, कोरोना के साए में ईद मनाने को मजबूर हुई थी लेकिन इस साल ऐसा नहीं है। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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एक लंबे अर्शे के बाद रमज़ान में पहले जैसी रौनक नज़र आयी। ईद की तैयारियों में वो पहले जैसे रौनक देख दिल में एक सुकूँ लौटा है यकीनं सभी की दुआओं में खुदा से यही फ़रियाद है कि अब न वो दर्द का मंजर लौटे अब न वो अपनों से बिछुड़ने का मौसम हो, अब न घरों से सिसकियों की सदा आए खुदा अपने कहर से दुनिया को बचाये रखे। हमें वो ताकीद दे की हम हर जीव से मोहब्बत बरतें। 

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इस ईद की शिवई में अमन और भाई चारे की मिठास घोलें। कोरोना महामारी के साथ साथ दिलों की नफरतें हमेशा के लिए मिट जाए। भारत की तरक्की के लिए हर भारतीय  अपना योगदान दे। अमन और शांति की नींव जो हमारे पूर्वजों ने मिलकर रखी थी उसकी इमारत मिलकर बुलंद करें। आँधियाँ तो हर दौर में चलती हैं और चलती रहेंगी लेकिन हम भारतीयों की रगो में अपनी विरासत को सहेजने की हिदायत हमेशा से थी और हमेशा बनी रहे। जो हमें भारतीय होने की पहचान देती है। 
  
 ईद की खुशी पर पहला हक़ बचपन का होता है। हमने बचपन में ईद के इंतजार में एक साल का लंबा इंतज़ार देखा है। बड़ी मुश्किल से एक साल गुजरता था। अब तो भागती दौड़ती जिंदगी पलक झपकते ही साल पूरा कर देती है। ईद की खुशियों में वो बचपन सी मासूमियत अब भी शहरों की चकाचौन्द से दूर गाँव में देखी जा सकती है। जहाँ इबादत और इंसानियत का महापर्व मिलकर मनाया जाता है।

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ईद मिलने-मिलाने का त्यौहार है, गिले-शिकवे मिटाकर गले मिलने का त्यौहार है। - फोटो : अमर उजाला
महानगरों में अक्सर खुशियाँ सीमित दायरे में सिमट कर रह जाती हैं लेकिन भारत अब भी गाँव, कस्बों और छोटे छोटे शहरों में बस्ता है। जहाँ ईद हो या दीवाली कोई अकेले नहीं मनाता। आपसी भाईचारे को बनाये रखने की हिदायत हमारे पूर्वजों ने विरासत में सौपीं थी हमें जो निहायत ही कीमती हैं।

मुझे याद है हमारे बुंदेलखंड में जब दशहरा और ईद एक साथ पड़ी थी तब रमजान और नवरात्रि के व्रतों पर वहाँ के लोगों ने बेहतरीन सामंजस्य स्थापित किया था। कभी कभी महानगरों के पढ़े लिखे लोगों को बड़ी सीख दे जाते हैं छोटे कस्बे, गाँव के भोले भाले कम पढ़े लिखे लोग। जिस शिददत और भाईचारे की गर्मजोशी से गली-चौराहों में गले लगते है। एक-दूसरे से अपनी खुशियों का इजहार करते है। 

हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई सबके सब एक साथ खाते-पीते और खिलखिलाते दिखते है। एक-दूजे के लिए दुआओं का द्वार खोलते चलते है। वास्तव में ईद दुआओं और त्याग का ही तो दूसरा नाम है। ईद मिलने-मिलाने का त्यौहार है, गिले-शिकवे मिटाने का त्यौहार है। जरूरतमंदो की मदद करने का मौका है।
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ईद की जिम्मेदारी बाजार की समझदार खरीद पर निर्भर है। जिम्मेदारी ज्यादा है, तो नेकियां भी ज्यादा होगी चलो इसबार कुछ और बेहतर करते हैं, - फोटो : istock

ईद मुबारक.....सबको ईद की बधाई देने का यह मौका रमजान के 30 रोजे रखने के बाद आता है। ईद अल्लाह का रोजेदारों के लिए एक नायाब तौफा है। पाबंदी से रोजे रखना, नमाज पढ़़ना, तिलावत करना ही अल्लाह की बारगाह में बंदो की इबादत मानी जाती है।

महीने भर के रोजों के बाद माहे शव्वाल का चांद ईद की खुशियां लेकर आता है, जो बडे़-बुर्जगों से ज्यादा बच्चों के चेहरों पर ईदी पाकर इतराती मुस्कान में दिखती है। गली, मौहल्लों, मेलो और चौबारों में खुशियों से बच्चे चहक उठते हैं।  

ईंद उत्सव से बढ़कर उत्तरदायित्व है इंसानों के लिए, अपने परिवार से पहले पड़ोसी की चिंता करना हमें ईंद सिखाती है, यही मानवता है। ईंद इबादत और इंसानियत का महापर्व है जो हम हिन्दुस्तानियों के लिए एक नेकी का जरिया भी है। समाज और हमारे रिश्तों पर हावी होते बाजार के इस दौर में सबकी ईद मने यह भी हम सबकी जिम्मेदारी है।

खुशियों की खरीददारी में हो सबकी हिस्सेदारी ये हम सबकी है जिम्मेदारी। हमसब एक-दूसरे का खयाल रखें। जो सक्षम है वे अपने जरुरतमंद भाईयों का ध्यान रखे। इसी जिम्मेदारी के साथ पूरी होगी ईंद की तैयारी। 

तभी नेकियां भी ज्यादा हो सकेगी और एक बेहतर दुनियां की तरफ भी हमसब एक साथ मिलकर बढ़ रहे होगें। तभी सबकी ईंद होगी। ईद की खुशियां तो बांटने से बढ़ती हैं। घरों से नमाज और इबादत करके अल्लाह से सबकी खुशियां मांगना, अमन-चैन चाहना और सबकी खैरियत के ख्याल को खुशी-खुशी फैलाना और पूरी कायनात की खुशी, खैरियत और सलामती की दुआएं मांगना ईद है।   

           
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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