सत्य-अहिंसा-न्याय के प्रतीक गांधी जी
विभिन्न फ़िल्मों में गाँधीजी की उपस्थिति हमें नजर आती है। अक्सर वे सरकारी कार्यालयों, खासकर थाना एवं अदालत में तस्वीर में लटके दिखते हैं। यहाँ तस्वीर सत्य-अहिंसा-न्याय-ईमानदारी की प्रतीक होती है। जबकि विडम्बना है इन्हीं जगहों पर सर्वाधिक भ्रष्टाचार होता है। नोट पर छपे गांधी का रिश्वत के लिए खूब आदान-प्रदान होता है। अगर आपके पास नोट नहीं है तो आप जिंदगी भर धक्के खाते हैं। आपको न्याय पाने के लिए इन्हीं नोटों की आवश्यकता होती है। वैसे फ़िल्मों में अक्सर न्याय, सत्य, अहिंसा, ईमानदारी की जीत दिखाई जाती है। गाँधीजी की मूर्ति हर चौराहे पर खड़ी दीखती है। कई फ़िल्मों में भी इस मूर्ति का उपयोग हुआ है।
बिमल राय की अंतिम फ़िल्मों में से एक है ‘सुजाता’, फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार से सम्मानित। सुजाता की भूमिका निभा रही ‘डस्की ब्यूटी’ नूतन की अदाकारी वाली इस फ़िल्म में गाँधीजी की मूर्ति और उनकी सूक्तियों का बहुत प्रेरणादयक प्रयोग हुआ है। नदी के घाट पर बनी उनकी मूर्ति और वहाँ लिखा सूक्त कहानी को न केवल आगे बढ़ाता है वरन उसे अर्थवत्ता भी प्रदान करता है।
फ़िल्म कई बार सूक्तियों का उपयोग करती है। कभी गांधी के विचार दिखाती है, कभी अधीर सुजाता के मन को ऊँचा उठाने के लिए कहता है, ‘आत्मनिन्दा आत्महत्या से भी बड़ा पाप है।’ सुजाता बार-बार गांधी की शरण में जाती है।
गांधी जी पर फिल्में
फ़िल्मों में महात्मा गांधी कभी वेशभूषा के प्रतीक में तो कभी उनके द्वारा इस्तेमाल की गई चीजों जैसे चश्मा, लाठी, चरखा के प्रतीकों में दीखते हैं। कभी उनके विचारों के रूप में फ़िल्में उन्हें प्रस्तुत करती हैं, जैसे सत्यजित राय ने ‘घरे-बाइरे’ फ़िल्म में नायक निखिल चौधुरी (विक्टर बैनर्जी) को टैगोर के प्रतीक रूप में प्रस्तुत किया है। प्रतिनायक उग्र स्वदेशी आंदोलन के समर्थक संदीप (सौमित्र चटर्जी) को महात्मा के विचारों का वाहक बनाया है।
ठीक बंगाल विभाजन की घटना के बाद के समय को दिखाती फ़िल्म रवींद्रनाथ टैगोर के इसी नाम (‘घरे-बाइरे’) के उपन्यास पर आधारित है। इस उपन्यास के प्रकाशन पर टैगोर की खूब आलोचना हुई थी और जब सत्यजित राय ने ‘घरे-बाइरे’ बनाई तो उन्हें भी आलोचना झेलनी पड़ी। फ़िल्मों में गांधी कभी प्रत्यक्ष नजर आते हैं, कभी परोक्ष रूप से पात्रों को प्रभावित करते हैं।
‘गाँधी’, ‘गर्म हवा’, ‘भगत सिंह’, ‘अर्थ’, ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’, ‘तमस’, ‘गदर: एक प्रेम कथा’, ‘किस्सा’, ‘पिंजर’, ‘हे राम’, ‘पार्टीशन’ और जितनी भी फ़िल्में विभाजन पर बनी हैं, उनमें प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से गांधी आते हैं।
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