बापू का देश अहिंसा, निस्वार्थ, आत्मबल, स्थानीयता, स्वावलंबन का देश है। वह विचारों से आधुनिक मगर देशज संस्कृति का वाहक है। सिद्धांत से अधिक व्यवहार में जीता है। बापू के यहां आचरण की पद्धति मनुष्य को कर्तव्य मार्ग की ओर ले जाती है। बापू ने अपना संपूर्ण जीवन इसी कर्तव्य मार्ग को समर्पित किया और जन-जन में आचरण की शुद्धता का सिद्धांत दिया। बापू के यहां आचरण की शुद्धता सत्यता, सादगी, स्वावलंबन और नैतिकता है। यह मूल मंत्र आजीवन बापू के साथ रहा और इसी मंत्र को उन्होंने जीवन और राष्ट्र का मंत्र बनाया।
बापू कहते हैं कि “हमारी सभ्यता का सार तत्व यही है कि हम अपने सार्वजनिक या निजी, सभी कामों में नैतिकता को सर्वोपरि स्थान दें”। वहीं आज हम इसका अभाव पाते हैं क्योंकि आज लोभ, लाभ और भौतिक सुख ही व्यक्ति के लिए सर्वोच्च है। पूंजीवाद व्यक्ति की इन्हीं इच्छाओं व लालसाओं का परिणाम हैं। बापू ने आधुनिक सभ्यता को अनैतिक व शैतानी सभ्यता कहा और लिखा- “पाश्विक भूख को बढ़ाने की और उसकी स्ंतुष्टि के लिए आकाश–पाताल के कुलावे मिलाने की इस पागल दौड़ की हृदय से निंदा करता हूं। अगर आधुनिक सभ्यता यहीं हैं...तो मैं इसे शैतानी ही कहूंगा” प्रकृति पर स्वामितत्व व अधिकार की लालसा का परिणाम गांधी जानते थे इसी कारण उन्होंने आधुनिक भौतिक सुखवाद की नीतियों का विरोध किया है।
बापू का देश अहिंसा, निस्वार्थ, आत्मबल, स्थानीयता, स्वावलंबन का देश है। वह विचारों से आधुनिक मगर देशज संस्कृति का वाहक है। सिद्धांत से अधिक व्यवहार में जीता है। बापू के यहां आचरण की पद्धति मनुष्य को कर्तव्य मार्ग की ओर ले जाती है। बापू ने अपना संपूर्ण जीवन इसी कर्तव्य मार्ग को समर्पित किया और जन-जन में आचरण की शुद्धता का सिद्धांत दिया। बापू के यहां आचरण की शुद्धता सत्यता, सादगी, स्वावलंबन और नैतिकता है। यह मूल मंत्र आजीवन बापू के साथ रहा और इसी मंत्र को उन्होंने जीवन और राष्ट्र का मंत्र बनाया।
बापू कहते हैं कि “हमारी सभ्यता का सार तत्व यही है कि हम अपने सार्वजनिक या निजी, सभी कामों में नैतिकता को सर्वोपरि स्थान दें”। वहीं आज हम इसका अभाव पाते हैं क्योंकि आज लोभ, लाभ और भौतिक सुख ही व्यक्ति के लिए सर्वोच्च है। पूंजीवाद व्यक्ति की इन्हीं इच्छाओं व लालसाओं का परिणाम हैं। बापू ने आधुनिक सभ्यता को अनैतिक व शैतानी सभ्यता कहा और लिखा- “पाश्विक भूख को बढ़ाने की और उसकी स्ंतुष्टि के लिए आकाश–पाताल के कुलावे मिलाने की इस पागल दौड़ की हृदय से निंदा करता हूं। अगर आधुनिक सभ्यता यहीं हैं...तो मैं इसे शैतानी ही कहूंगा” प्रकृति पर स्वामितत्व व अधिकार की लालसा का परिणाम गांधी जानते थे इसी कारण उन्होंने आधुनिक भौतिक सुखवाद की नीतियों का विरोध किया है।
शहरों का निर्माण नहीं था गांधी का विकास, मास प्रोडक्शन के खिलाफ थे महात्मा गांधी
विकास का आधुनिक मॉडल मनुष्य और प्रकृति दोनों के शोषण पर आश्रित है। विकास, आज विनाश की अवधारणा में तब्दील हो चुका है। गांधी अपने समय में भी विकास की इन आधुनिक नीतियों से वाकिफ थे इसीलिए उन्होंने ‘मास प्रोडक्शन’ के स्थान पर ‘मासेज प्रोड्क्शन’ द्वारा विकास की बात कही। उनके विचारों से विकास केवल उद्योगों को स्थापित करने व बड़े-बड़े औद्योगिक प्लांट लगाने, अधिक से अधिक परियोजनाओं को लागू करने से संभव नहीं था, उनकी विकास योजनाओं में शहरों का निर्माण व विकास भर नहीं था न ही भौतिक समृद्धि मात्र थी, उनके विकास की योजनाओं में गांव भी सम्मिलित थे और पर्यावरण का सहयोग अनिवार्य था। आज इसे ‘सस्टेनेबल डेवलेपमेंट’ के अंतर्गत पढ़ा और पढ़ाया जाता है।
बापू विकास और पर्यावरण पर अपने समय में साथ लेकर चलने की बात कर रहे थे। बापू कहते हैं कि “मेरा विरोध यंत्रों के लिए नहीं है, बल्कि यंत्रों के पीछे जो पागलपन चल रहा हैं, उसके लिए हैं...। उनसे मेहनत जरूर बचती है, लेकिन लाखों लोग बेकार होकर भूखों मरते हुए सड़क पर भटकते हैं। समय और श्रम की बचत तो मैं भी चाहता हूँ, परंतु वह किसी खास वर्ग की नहीं..”।