2014 में देश में 34 हजार रेप की घटनाएं हुईं थीं जो बढ़कर 2016 में लगभग 39 हजार तक पहुंच गईं। ये आंकड़े स्वयं एक वक्तव्य हैं।
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न्याय के इस नए रूप ने देश में इस भावना को मजबूत कर दिया है कि यही त्वरित न्याय उन्नाव में क्यों नहीं किया गया? यही न्याय उन राक्षसों के साथ क्यों नहीं किया गया जो आश्रम जैसे पवित्र स्थानों का उपयोग व्याभिचार के लिये करते पाए गए हैं। राजनैतिक संरक्षणवाद के आगे न्याय व्यवस्था की लाचारी ही देश में नगद न्याय के पक्ष में एक ज्वार की तरह सामने आई है। क्या न्याय प्रणाली यह सोच पायेगी कि निर्भया को न्याय देने में उन्होने जो देरी की है वही उसे निरर्थक बना रहा है।
2014 में देश में 34 हजार रेप की घटनाएं हुईं थीं जो बढ़कर 2016 में लगभग 39 हजार तक पहुंच गईं। ये आंकड़े स्वयं एक वक्तव्य हैं। इन 39 हजारों मामलों में जो सबसे चर्चित निर्भया प्रकरण है, उसमें ही अब तक फैसला नहीं हुआ है। अब भले ही तीन दिन में बलात्कारियों को फांसी देने का सरकारें दावा करतीं रहें। किंतु वस्तुस्थिति यही है कि पीढि़तायें ही भयाक्रांत हैं ।
जिस तरह से भद्र समाज और कथित गुरु इत्यादि इस व्याभिचार प्रवाह में बहते दिखाई दे रहे हैं, उससे समाज दहल गया है । उसे लगता है कि किस पर विश्वास करें किस पर न करें। क्या ऐसा ही समाज बनाकर विश्व गुरू बना जा सकता है। इस त्वरित न्याय ने अराजक रूप धारण कर लिया तो सब कुछ हम खो देंगे। ऐसी घटनाएं सामने आने लगीं हैं जहां आरोपियों को जनता ने पुलिस सुरक्षा में घेरकर पीटना शुरू कर दिया और पुलिस को सुरक्षा करने में दो-दो पड़ गई।
न्यायपालिका एवं विधायिका पर राजनैतिक हस्तक्षेप के कारण जनता में घोर अविश्वास ही इस वातावरण का जन्मदाता है। न्याय प्रणाली के पास अब भी समय है कि वह अपने अंदर झांके क्योंकि बढती घटनाएं और उनका नाद करने वाला प्रचार ही समाज को उस अंधेरे न्याय की तरफ धकेल रहा है जहां सिस्टम हार जाए, व्यवस्था विखर जाए और लाठी वाला जब भैंस लेकर निकले तो समाज तालियां बजाये। क्या राष्ट्र के रूप में यही हमारी अपेक्षा है ?
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