हाल ही में जापान में आए विनाशकारी भूकम्प ने भारतीय हिमालय में बसे लोगों को भी डरा दिया है। डरना भी स्वाभाविक ही है, क्योंकि विश्व की सबसे युवा पर्वत श्रृंखला हिमालय भी भूगर्वीय हलचलों के कारण भूकम्प की दृष्टि से कोई कम संवेदनशील नहीं है। भूवैज्ञानिकों का यहां तक मानना है कि हिमालय के गर्भ में इतनी भूगर्वीय ऊर्जा जमा है कि अगर वह अचानक एक साथ बाहर निकल गई तो उसका विनाशकारी प्रभाव कई परमाणु बमों के विस्फोटों से भी अधिक हो सकता है।
डराने वाली बात तो यह है कि भूगर्वीय ऊर्जा या साइस्मिक एनर्जी न तो छोटे मोटे भूकम्पों से खाली या कम हो सकती है और ना ही सीमा से अधिक समय तक भूगर्व में जमा रह सकती है। भूगर्वीय चट्ठानों के टकराव और घर्षण से यह ऊर्जा निरन्तर बढ़ती जाती है। चूंकि जापान के लोग भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाओं के साथ जीना सीख चुके हैं, इसलिए वहां बड़े भूकम्प में भी जन और धन की बहुत कम हानि होती है। जबकि भारत में मध्यम परिमाण का भूकम्प भी भारी तबाही मचा देता है। कारण प्रकृति के साथ सामंजस्य और जन जागरूकता की कमी है।
15 दिनों में आए 74 भूकम्प
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के भूकम्प के चार्ट पर नजर डालें तो 15 दिसम्बर 2023 से लेकर 1 जनवरी 2024 की 15 दिन की अवधि में भारत में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक रिक्टर पैमाने पर 1.8 से लेकर 6 परिमाण तक के कुल 74 भूकम्प दर्ज हैं, और इनमें से सर्वाधिक 64 भूकम्प नेपाल और हिमालयी राज्यों में आए हैं। क्योंकि नेपाल उत्तराखण्ड जैसे हिमालयी राज्यों से जुड़ा है और इसकी साइस्मिक स्थिति इन्हीं राज्यों के समान है, इसलिए हम नेपाल की गिनती हिमालयी राज्यों से कर रहे हैं। हिमालयी राज्यों में भी सर्वाधिक 24 भूकम्प जम्मू-कश्मीर और लेह लद्दाख में दर्ज हुए हैं। इनमें भी सर्वाधिक 11 भूकम्पों का केन्द्र किस्तवाड़ रहा है। इनके अलावा उत्तराखण्ड में 6 और
हिमाचल में 5 भूकम्प दर्ज हुए हैं। इसी तरह पूर्वोत्तर में ईस्ट और वेस्ट गारोहिल्स, मणिपुर, अरुणाचल, मीजोरम और नागालैंड में भूकम्पों की आवृत्ति दर्ज हुई है। नेपाल में 4 नवम्बर से लेकर 8 नवम्बर 2023 तक 2.8 से लेकर 5.6 परिमाण के 17 भूकम्प दर्ज किए गए। वहां एक ही दिन 4 नवम्बर को 2.8 से लेकर 3.7 परिमाण के 8 भूकम्प दर्ज किए गए।
भयंकर भूकम्प की जद में हैं हिमालयी लोग
भारत की संपूर्ण हिमालयी बेल्ट 8.0 से अधिक तीव्रता वाले बड़े भूकंपों के लिए अतिसंवेदनशील मानी जाती है। इसका मुख्य कारण भारतीय प्लेट का यूरेशियन प्लेट की ओर लगभग 50 मिमी प्रति वर्ष की दर से खिसकना है। हिमालय क्षेत्र और सिंधु-गंगा के मैदानों के अलावा, यहां तक कि प्रायद्वीपीय भारत में भी विनाशकारी भूकंपों का खतरा है। देश के वर्तमान भूकंपीय जोनेशन मैप के अनुसार भारतीय भूभाग का 59 प्रतिशत हिस्सा सामान्य से बहुत बड़े भूकम्पों के खतरे की जद में हैं।
भारत में भी संपूर्ण हिमालय क्षेत्र को रिक्टर पैमाने पर 8.0 अंक की तीव्रता वाले बड़े भूकंपों के प्रति प्रवृति माना गया है। इस क्षेत्र में सन् 1897 शिलांग (तीव्रता 8.7), 1905 में कांगड़ा (तीव्रता 8.0), 1934 बिहार-नेपाल (तीव्रता 8.3) और 1950 असम-तिब्बत (तीव्रता 8.6) के बड़े भूकम्प आ चुके हैं। नेपाल में 25 अप्रैल 2015 का 8.1 परिमाण का अब तक का सबसे भयंकर भूकम्प था जिसके कारण 8,649 लोग मारे गए थे और 2,952 घायल हुए थे।