हमारा वायुमण्डल कई प्रकार की गैसों का मिश्रण है। जलवायु पर वायुमण्डल और जलमण्डल का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है।
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हमारी पृथ्वी की स्थिति
विश्व स्तरीय मानदण्डों के अनुसार पृथ्वी पर ऑक्सीजन-कार्बन-डाइऑक्साइड के संतुलन को बनाये रखने के लिए एक तिहाई (1/3 ) भूमि पर जंगल होने चाहिए। लेकिन आजकल घने जंगल दुनिया में 20-21 प्रतिशत और भारत में केवल 12-13 प्रतिशत भूमि पर ही रह गए हैं।
यद्यपि भारत का वनावरण 21.71 प्रतिशत तक है, लेकिन इसमें खुले वन अधिक हैं। राजस्थान में तो वनों की हालत और भी दयनीय है। वहां 8-9 प्रतिशत भूमि पर ही वन बचे हैं। जब वृक्ष नहीं, वन नहीं तो वन्यजीव भी नहीं बचेंगे।
वनों के घटने से अब पक्षी बहुत कम दिखने में आते हैं और रंग-बिरंगी तितलियां तक दुर्लभ होती जा रही हैं। ईंधन के लिए, फर्नीचर के लिए, भारत और कुछ अन्य देशों में शवदाह के जिए बड़े पैमाने पर वृक्षों की कटाई से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष पर्यावरण की जितनी हानि हो रही है, उसका पूरा अनुमान लगाना तो कठिन है, किन्तु यह स्पष्ट है कि उससे ग्लोबल वार्मिंग में वृद्धि हो रही है, भू-जल का संरक्षण नहीं हो पा रहा है, मिट्टी का अपरदन तथा जैव विविधता का विनाश तेजी से हो रहा है
विदित ही है कि हमारा वायुमण्डल कई प्रकार की गैसों का मिश्रण है। जलवायु पर वायुमण्डल और जलमण्डल का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है। वायुमण्डल के इन घटकों में नाइट्रोजनए आॅक्सीजन एवं कार्बनडाई ऑक्साइड का सभी जीवधारियों (वनस्पति-वर्ग एवं प्राणी-वर्ग) के जीवन चक्र से सीधा संबंध है।
यद्यपि कार्बन-डाई-ऑक्साइड की वायुमंडल में बहुत कम मात्रा पाई जाती है, किन्तु पृथ्वी पर जीवन क्रम को संचालित करने, वायुमण्डल की संरचना (बनावट) और उसके घटकों के बीच मात्रात्मक संतुलन बनाए रखने की दृष्टि से उसकी अहम भूमिका है क्योंकि प्राणियों के लिए हानिकारक समझी जाने वाली कार्बनडाई ऑक्साइड हरे पेड़-पौधों के लिए बहुत ही आवश्यक है।
कार्बन-डाई-ऑक्साइड, कार्बन-मोनो-ऑक्साइड, सल्फर-डाई- ऑक्साइड एवं नाइट्रस ऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसें उत्सर्जित हो रही हैं। वे पर्यावरण को प्रदूषित कर रही हैं, वनस्पतियों का विनाश कर रही हैं तथा प्राणिजगत के लिए घातक सिद्ध हो रही हैं। मनुष्य में कैंसर, श्वसन संबंधी अनेक रोग, नेत्र रोग, मोतियाबिन्द जैसी बीमारियां उत्पन्न कर रही हैं।
इन सब गतिविधियों का अन्ततोगत्वा जलवायु पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है। विनाश को टालने के लिए तत्काल आवश्यकता है कार्बन-डाई-ऑक्साइड के उत्सर्जन की मात्रा में बड़ी कमी लाई जाए तथा सीएफसीज के वैकल्पिक यौगिक काम में लिए जाए।
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