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धड़ल्ले से निकलती मां-बहन की गालियां और हमारे समाज की मानसिकता

सार

आश्चर्य कि बात है कि मां-बहन की इन गलियों के पीछे कोई गुस्सा या चिढ़ या कोई झगड़ा नहीं बल्कि मनोरंजन होता है। 
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फेमिनिज्म की माँ की बहन की! - फोटो : istock
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विस्तार
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गालियां दुनियाभर में गुस्सा, चिढ़, फ्रस्ट्रेशन और तमाम तरह के नकारात्मक भावों-भड़ास को निकालने का तरीका हैं। आजकल तो गालियां ट्रेंड भी हैं। अंग्रेजी के "एफ" वर्ड से लेकर "ओह शिट" तक हम भारतीयों के लिए आधुनिक होने की गारंटी बन चुका है। वहीं ठेठ शुद्ध हिंदी गालियां बरसों से हमारी जीवनशैली का हिस्सा रही हैं।

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दरअसल, अजीब बात यह है कि आमतौर पर झगड़ा चाहे किसी का हो, गालियां मां-बहन के नाम पर ही निकलती हैं। ये ट्रेंड आजकल सरहदों के पार तक ट्रेंड कर रहा है। मजे-मजे में हाल-पूछने के से भाव से मां-बहन के नाम पर चार गालियां आदमी सामने वाले को प्यार मोहब्बत से टिका देता है।
 

गौरतलब है कि 90 प्रतिशत से ज्यादा मामलों में गाली उन मां-बहनों के नाम की जाती है, जिनका पूरे प्रकरण से कुछ लेना-देना ही नहीं होता। 

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इस आर्टिकल का शीर्षक पढ़ते ही कुछ लोग भवें टेढ़ी करते हुए छोटे से बक्से में लगे मेरे फोटो का एक्सरे करेंगे, कुछ लोग मेरे चाल चलन पर शक जाहिर करेंगे। कुछ को लड़की होने के नाते मेरे दुस्साहस पर चर्चा करनी होगी और कुछ आधुनिक होने के नाते मेरे पक्ष में भी आ खड़े होंगे।

बहरहाल, मेरी उम्मीद यह है कि यदि इस आर्टिकल को पूरा पढ़ने के बाद, 2 प्रतिशत लोग भी अपनी इस आदत पर रोक लगा लेते हैं, तो मेरा लिखना सफल हो जाएगा। इसलिए इसे पढ़िए जरूर। 

 

विदेशी लोग, भारतीय महिला विशेष गालियों का उपयोग धड़ल्ले से करते हैं। - फोटो : istock

गालियों का मनोविज्ञान और हमारी मानसिकता 

बात कोई नई नहीं है लेकिन मेरे मन में ये हमेशा से खटकती रही है। हर दिन की तरह उस दिन भी मैंने कुछ मनोरंजन पाने के लिहाज से यूट्यूब का रुख किया। दो तीन ऐसे विदेशी चैनल्स हैं जो भारतीय या वैश्विक संस्कृति और कला को जानने- उसे समझने के लिए ज्यादातर रिएक्शन वीडियोज बनाते हैं।

अच्छा लगता है जब विविधता से भरपूर समृद्ध भारतीय संस्कृति को विदेशी लोगों द्वारा परखा, अपनाया जाता है। लेकिन पिछले कुछ सालों से यहां एक ट्रेंड जारी है। विदेशी लोग, भारतीय महिला विशेष गालियों का उपयोग धड़ल्ले से करते हैं। ठीक जैसे हम भारतीय आजकल 'एफ' वर्ड का उपयोग करने लगे हैं।
 
सबसे ज्यादा आश्चर्य इस बात का कि मां-बहन की इन गलियों के पीछे कोई गुस्सा या चिढ़ या कोई झगड़ा नहीं बल्कि मनोरंजन होता है। हां, यहां लिंग भेद नहीं है सो महिलाएं-पुरुष सभी इन गलियों को ऑनलाइन बोलकर भारत को जानने की अपनी कोशिशों का वर्णन करते है। 

इसी तरह आजकल स्टैंडअप कॉमेडी के नाम पर भी खुलेआम ऑडियंस के सामने इन गालियों का ट्रेंड चल पड़ा है और लोग इन्हें जोक समझ के खुलकर हंसते हैं। स्टेज पर खड़ा आर्टिस्ट (?) इनकी व्याख्या जितनी खुली हो सके, करता है और सामने बैठी नौजवान पीढ़ी ठहाके मारती है। ये आज का शुद्ध मनोरंजन है। 

बाकी दुनिया को फिलहाल छोड़ भी दें तो गाली देना भारतीय समाज में भी लम्बे समय से अपने गुस्से, चिढ़, खीज, फ्रस्ट्रेशन आदि को निकालने का जरिया रही है। भारत के कुछ प्रदेशों में तो शादियों में समधि-समधन को ढेर गालियां देने का रिवाज है और इनमें से कुछ गालियां तो ऐसी होती हैं कि किसी भी सभ्य आदमी के कान से खून रिसने लगे। लेकिन मुख्यतः ये जो मां और बहन के नाम पर गालियां देने का चलन है वो सड़क पर पीक थूकने से भी ज्यादा आसान है। तुर्रा यह कि केवल कम पढ़े -लिखे या जिन्हें हम असभ्य मानते हैं, वे ही इनका उपयोग नहीं करते, अच्छे-खासे पढ़े लिखे लोग भी मजे मजे में गालियों की बारिश करने का सामर्थ्य रखते हैं। 

कुछ समय पहले बाजार से लौटते समय मैं एक ऑटो रिक्शा के पास पहुंची। अभी हम गंतव्य स्थल का किराया ठहराने की दिशा में आगे बढ़ ही रहे थे कि पीछे से उस रिक्शेवाले के दो मित्र आए और उसकी पीठ पर थप्पा मारते हुए बोले-'भेन...... कहां गायब हो गया था।' जवाब में उस रिक्शेवाले ने उसकी मां को तारते हुए कहा- 'तेरी माँ..... गांव गया था।' मैं हतप्रभ थी, हालचाल पूछने का यह तरीका मेरे लिए नया था। 

खैर, रिक्शे में बैठने के बाद हम थोड़ा ही आगे बढ़े थे कि एक गाय बीच मे आई और रिक्शेवाले ने बिना इंसान-जानवर का भेदभाव करते हुए उसकी बहन और मां को भी तार दिया। जब मैंने अपनी उपस्थिति से अवगत कराते हुए उसे टोका तो वह हंसते हुए बोला-'सॉरी मैडम, आदत में है तो निकल गई!' 
 
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क्या कभी अपने गौर किया कि ये मां और बहन भी फेमिनिज़्म के दायरे में ही आती हैं? - फोटो : Pixabay
दूसरा किस्सा एक पार्टी का। जहां सभी लोग अच्छे और सुसंस्कृत परिवार वाले थे। डिनर के बाद गप्पों का दौर चल रहा था और अचानक एक जनाब ने अपनी बात खत्म करते करते कहा-'और मैंने उसको कहा, तेरी मां.... बहुत देखे तेरे जैसे।' ज्यादातर पुरुषों ने इस जोक पर ठहाके बिखेरे और सारी महिलाएं असहज हो गईं। हद तब हुई जब पास खड़े एक 4-5 साल के बच्चे ने उस गाली को इस ठहाके का सोर्स समझते हुए दोहरा दिया।
 
बच्चे के मुंह से निकली इस गाली के बाद भी कुछ पुरुष हंस दिए और अब तक हंस रहे बच्चे के पिता ने बच्चे के गाल पर तड़ाक से एक तमाचा जड़ दिया। अब तक हंस खेल रहा बच्चा अब दहाड़ें मारकर रो रहा था और मन मे शायद यही सोच रहा था- मैंने वही जोक तो मारा था, जिसपर कुछ देर पहले सारे बड़े हंस रहे थे। तो फेमिनिज़्म के नाम पर बहस करने वालों से जरा तवज्जो चाहूंगी।
 
क्या कभी अपने गौर किया कि ये मां और बहन भी फेमिनिज़्म के दायरे में ही आती हैं?

सवाल यह है कि मान लीजिए किसी व्यक्ति ने आपका कुछ बिगाड़ा भी है तो क्या इसके पीछे उसकी मां या बहन का दोष है? नहीं, लेकिन आप उसकी बहन या मां को बीच में लाकर उसे शर्मिंदा करना चाहते हैं। इसलिए आप इन गलियों का प्रयोग करते है। या तो आप इस गाली का अर्थ समझे बिना ही इसका उपयोग मनोरंजन और गुस्से दोनों स्थिति में कर देते हैं। या फिर मतलब जानते हैं इसलिए गुस्से और मनोरंजन के लिए इन्हें उपयोग में लाते हैं। दोनों ही स्थितियों में यह अनुचित है।

इन गालियों का उपयोग करते समय बस इतना सोचिए कि जो आप कह रहे हैं, वही कोई आपकी मां, बहन या बेटी के लिए कहे तो? या फिर औरतें भी अपना गुस्सा और चिढ़ निकालने या मनोरंजन करने के लिए लोगों के बाप और भाई के लिए इन गालियों का उपयोग शुरू कर दें? चुनना आपको है आप समाज को किस तरह देखना चाहते है? तो अगली बार किसी की माँ-बहन को नवाजते हुए सोचिएगा जरूर।
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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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