उत्तराखंड: ब्रेक लगाइए, अगले मोड़ पर प्रलय इंतज़ार कर रही है..!
- फोटो : हिमांशु जोशी
हिमालयी और मैदानी क्षेत्र होने के कारण उत्तराखंडवासी इस बार एक ही रात में एक साथ अलग-अलग परिस्थितियों से जूझे। सोचें पहाड़ों में आप एक रात चैन से सोए हुए हैं और खूब सारा कीचड़ लिए तेज बहाव के साथ पानी आपके घर में घुस आपका दम घोंट आपकी जान ले शांत हो जाए या आप इस डर से रात भर अपने बच्चों को गले लगाए बैठे रहें कि कहीं कोई सैलाब आपके घर न घुस जाए।
वहीं मैदानी क्षेत्र में आप रात भर अपने घर के कीमती सामानों को बाढ़ में बहने से रोकने का प्रबंध करते रहें। अक्तूबर बेमौसम आई बरसात ने उत्तराखंड वालों का बिल्कुल यही हश्र किया है। इसके शिकार वह पर्यटक भी हुए हैं जो सुकून की तलाश में उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में घूमने आए थे।
सोशल मीडिया पर बहुत सी पोस्ट छाई हुई हैं जहां पुलिस और सेना के जवान बाढ़ प्रभावित लोगों को बचाने में जुटे हुए हैं। इनमें कुछ तस्वीरों में पुलिस के जवान पहाड़ों में भारी बारिश से किसी के घर में घुसे मलबे के बीच उस घर में रहने वालों की दबी लाशों को खोज रहे हैं तो कुछ तस्वीरों में पुलिस-सेना के जवान खतरे में फंसे लोगों को तेज बहाव से निकाल रहे हैं। नदी किनारे बने घर उसमें समा जा रहे हैं तो मैदानी जगह बाढ़ में बाइक, कारों की तैरती तस्वीर भी वायरल हो रही हैं।
बाढ़ पर राजनीति
लोग मुसीबत में फंसे हैं तो बाढ़ पर राजनीति भी कम नही हो रही। सोशल मीडिया पर प्रदेश के मुख्यमंत्री का बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में हेलीकॉप्टर से किया दौरा विवाद का विषय बना है तो कहीं सड़क मार्ग से आपदा ग्रस्त इलाकों में पहुंचने पर उनकी वाहवाही हो रही है।
बाढ़ और प्रकृति का तांडव फिलहाल थमा हुआ है पर अब जिस अंतराल पर यह आपदाएं आने लगी है उन्हें देख भविष्य में इस तरह की आपदाओं से कम से कम नुकसान हो इसके लिए हमें अभी से कार्य शुरू करने होंगे।
वर्ल्ड मीटरोलॉजिकल आर्गेनाइजेशन और ग्लोबल वाटर पार्टनरशिप ने मिलकर बाढ़ प्रबंधन प्रोग्राम पर कार्य किया। अमरीकी कम्पनी ने सुनामी जैसी आपदा के वक्त सुरक्षित बचने के किए सुनामी बॉल बनाई तो चीन में स्पंज सिटी की अवधारणा बनी।
वर्ल्ड मीटरोलॉजिकल आर्गेनाइजेशन और ग्लोबल वाटर पार्टनरशिप की रिपार्ट के अनुसार पहाड़ों में बाढ़ से होने वाले नुकसान के मुख्य कारणों में पहाड़ों की ढलान पर वनों की अत्यधिक कटाई पहले नम्बर पर आता है। आज आप पूरे हिमालयी क्षेत्र घूम आइए, सड़क की सनक ने रास्ते के सभी पेड़ों को खत्म कर दिया है। सड़क पर आधे लटके वह पेड़ अपना बदला लेने के लिए हमेशा सड़क पर लटक किसी के ऊपर गिरने का मौका देखते हैं।
स्थानांतरित कृषि जिसमें वृक्षों और वनस्पतियों को जला दिया जाता है फिर उसमें नए बीज बोए जाते हैं इस वजह से भी पहाड़ कमज़ोर हुए हैं और तेज बहाव में टूट जाते हैं। अद्रभूमि की कमी और इसके साथ पहाड़ों में जानवरों की अत्यधिक चराई की वजह से भी पहाड़ कमज़ोर होते जाते हैं।
बाढ़ के बारे में थोड़ा अध्ययन किया जाए तो पता चलता है कि बाढ़ मुख्यतः चार तरीकों से आती हैं-
- फ्लुवियल में अत्यधिक बारिश से या बर्फ गलने से नदी का जलस्तर बढ़ जाता है। उत्तराखंड में इसी तरह की बाढ़ कोहराम मचाती है। अभी आई बाढ़ में नैनीताल की झील का स्तर इतना बढ़ गया था सड़क और झील में अंतर करना मुश्किल हो रहा था।
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- प्लूवियल बाढ़ में बारिश का पानी निकासी सुविधा अच्छी न होने की वजह से शहर की गलियों में भर जाता है। मुंबई, दिल्ली हो या उत्तराखंड का रुद्रपुर सबमें इसी तरह की बाढ़ आती है।
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- फ्लैश बाढ़ में बांधों से तेजी से पानी आता है और इस तरह की बाढ़ खतरनाक होती है। कोस्टल बाढ़ का उदाहरण सुनामी है।
रिपोर्ट के अनुसार बाढ़ प्रबंधन के लिए प्रशासन, नेताओं, गैर सरकारी संगठनों और भवनों का निर्माण करने वालों को मिलकर साथ काम करना होगा। बाढ़ हमेशा एक सी नही होती और उसकी तैयारी भी पहली जैसी नही होनी चाहिए। नगरीकरण से यह समस्या बढ़ती ही जाएगी क्योंकि नदी, नालों को अपना रास्ता नही मिलेगा और वह बार-बार लौटकर अपने रास्ते पर आएंगे ही।
रिपोर्ट में कहा गया है कि बाढ़ के समय सही रास्ता बताने के लिए सड़क पर निशान लगाने चाहिए क्योंकि ऐसी स्थिति में लोग गड्ढों पर भी गिर सकते हैं। साथ ही हमें घर भी ऐसे बनाने होंगे जिन पर बाढ़ का असर कम से कम हो।
बाढ़ के असर को कम करने के लिए तीन तरह के घर बनाने का सुझाव दिया गया जिसमें ऐसा घर शामिल है जो उठा हुआ बनाया जाए। दरवाजों-खिड़कियों को बंद कर पानी रोकने वाला घर भी बनाया जा सकता है जिसे ड्राई फ्लड प्रूफिंग कहा गया है।
वेट फ्लड प्रूफिंग नाम के घरों को ऐसा बनाया जाता है जिसमें घर के अंदर पानी आने के बाद भी उसका असर कम से कम हो। अगर ऐसे ही घर पहाड़ी क्षेत्रों में बनाए जाएं तो कई जानें बचाई जा सकती हैं।
उत्तराखंड: ब्रेक लगाइए, अगले मोड़ पर प्रलय इंतज़ार कर रही है..!
- फोटो : हिमांशु जोशी