मणिपुर की कम से कम 398 किलोमीटर की सीमा म्यांमार से लगती है।
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बाड़ लगाने में भौगोलिक स्थिति के कारण व्यावहारिक दिक्कत तो है, लेकिन इससे बड़ी दिक्कत मिजोरम तथा मणिपुर के पहाड़ी जिलों में बसे कुकी और नगा समूहों को होगी। मिजो जनजाति से जुड़ी उप जातियां सीमा के उस पार भी हैं।
वही हाल कुकी और नगाओं का है। उनकी आवाजाही प्रभावित होगी। मिजोरम से म्यांमार की 404 किलोमीटर लंबी सीमा है। मिजोरम के कई संगठनों ने भारत सरकार के इस फैसले के खिलाफ आंदोलन की धमकी दी है। मणिपुर के मैतेई समूह ने सरकार के फैसले का स्वागत किया है। मैतेई समूह को लगता है कि हाल की हिंसा के लिए खुली सीमा जिम्मेदार है। बड़ी संख्या में म्यांमार से घुसपैठ होती रही है। मणिपुर को कुकी समूह को हिंसा करने की ताकत सीमा के उस पार से मिलती है। बाड़ लग जाने से मिजो के साथ कुकी और नगा समूहों की मुक्त आवाजाही पर रोक लग जाएगी।
इसलिए मिजो और कुकी के साथ नगा समूह भी इसका विरोध कर रहे हैं। मणिपुर की कम से कम 398 किलोमीटर की सीमा म्यांमार से लगती है जिसमें 10 किलोमीटर की सीमा पर पहले ही बाड़ लगाई जा चुकी है। मणिपुर के नगा बहुल उखरुल और कमजोंग जिले के लोग सरकार के फैसले का विरोध कर रहे हैं। अरुणाचल प्रदेश ने इस फैसले का स्वागत किया है, क्योंकि पूर्वी अरुणाचल प्रदेश में म्यांमार से आने वाले नगा उग्रवादी समूह हिंसा फैलाकर भाग जाते हैं। उसी रास्ते से अल्फा उग्रवादी भी असम में प्रवेश करते हैं।
इसलिए भारत सरकार को भौगोलिक दिक्कतों के साथ सीमावर्ती इलाके के लोगों की व्यावहारिक परेशानियों पर भी विचार करना चाहिए। उग्रवादी समूहों पर लगाम लगाना भी जरूरी है। इस पर भी विचार होना चाहिए कि अवैध घुसपैठ रोकने तथा ड्रग्स तस्करी रोकने के लिए कुछ और विकल्प हो सकता है। राष्ट्र की सुरक्षा तथा सीमावर्ती नागरिकों की असुविधाओं को ध्यान में रखकर आगे बढ़ना चाहिए। कोई फैसला करने के पहले भारत सरकार को सीमावर्ती राज्यों तथा लोगों के साथ व्यापक चर्चा करनी चाहिए। जबरन फैसले लादने से सीमावर्ती इलाके के लोगों की नाराजगी ठीक नहीं है।
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