खैर, जो भी हो, आदमी की जीवनशैली बदल रही है। नशेड़ियों के आचार व्यवहार में लॉकडाउन के कारण आमूल चूल परिवर्तन आया है। यह ठीक है कि शराब से सरकारों को ठीक ठाक "कर" मिलता है, आजकल बिकती नहीं, इसलिए कारोबारियों के साथ सरकारें भी चिंतित हैं। पर इसमें कोई करें तो क्या करें ? अब यह गलत हो रहा है या सही यह तो हमें पता नहीं, लेकिन जीवनशैली जरूर बदल रही है जी। वो हमारे तोताराम जी का बेटा नए कपड़े, नए जूते, नए फैशन में डूबा रहता था, आजकल लॉकडाउन में उसके सूटेड बूटेड होने, डिओडोरेंट, पाउडर व परफ्यूम छिड़कने की चाहत खत्म हो गई है। वो क्या है कि कहीं जाना जो नहीं है उसे। बेचारा हमारी तरह घोर आध्यात्मिक हो गया है।
पूरे दिन का आधे से ज्यादा समय अध्यात्म में गुजार देता है। अब आप बताएं जी, जीवनशैली में बदलाव आ रहा है कि नहीं? आजकल हम भी घर के पास स्थित बगीचे से कोयल की पहली कूक सुनते हैं, हृदय में मधुरस घोलते हैं, वसुंधरा की गोद में खेलते हैं, नीले आसमां को निहारते हैं, पंछियों के कलरव के मजे लेते हैं, आमोद-प्रमोद करते हैं, प्रकृति का श्रंगार मन की आंखों से निहारते हैं, हमारे अधर मंद मंद समीर से बातें करते हैं, वसंती, पीले,नीले, लाल,बैंगनी रंग के फूल हमारे हृदय में हिंडौले लेते हैं, अध्यात्म का मधु संचित करते हैं, भ्रमरों का गुंजन महसूस करते हैं। घर में ही प्राकृतिक नाद, सुर-ताल सुनते हैं।
इधर, हमारा चंचल बचपन बच्चों संग खिलखिला उठा हैं। अजी ! यह संसार पल पल बदल रहा है। नए साज सुसज्जित हो रहे हैं। अब आप ही बताइएगा जीवनशैली, जीवन बदल रहा है कि नहीं बदल रहा? जीवनशैली बदलकर आजकल हो गई है मधुशाला हो गई है। आदमी समझे तो मधुशाला, नहीं समझे तो ज्वाला। हरिवंशराय बच्चन जी ने क्या खूब कहा है -
"
मदिरालय जाने को घर से,
चलता है पीने वाला,
"किस पथ से जाऊं ?"
असमंजस में है वह भोलाभाला;
अलग-अलग पथ बतलाते सब,
पर मैं यह बतलाता हूं-
'
राह पकड़ तू एक चला चल,
पा जाएगा मधुशाला।
'
अजी ! हमें तो बस इतना ही कहना है। अब आप भी तो हमें बताइएगा जरूर आपकी मधुशाला कहां है?
जय रामजी की।
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