लॉक डाउन का दिखा असर, निर्मल हुई यमुना
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वैश्विक अर्थव्यवस्था के नियमों से बंधे विश्व में जब अर्थशास्त्रियों और व्यापार प्रबंधकों का वर्चस्व बढ़ने लगा तो भारत जैसी प्राचीन सभ्यताओं के प्रकृति और इसके विभिन्न अवयवों को मां के समान सम्मान देने वाली अवधारणाओं को परे धकेल अधिक से अधिक उत्पादन और खपत को ही राष्ट्रीय एवं वैश्विक समृद्धि का सूचकांक माना जाने लगा। करीब तीन दशक में ही जलवायु परिवर्तन से जुड़ी आपदाओं, वैश्विक गर्मी की समस्याओं एवं प्रदूषण से होने वाली बीमारियों ने पर्यावरण संरक्षण और पारिस्थिकीय संतुलन की अवश्यताओं की चर्चा को अनेक वैश्विक एवं राष्ट्रीय मंचों पर बहस के केंद्र में ला दिया है। पर्यावरण संरक्षण के महत्व को स्वीकारते हुए विश्व के अनेक देशों ने सतरह धारणीय विकास लक्ष्यों को अपनी विकास योजनाओं में शामिल करना शुरू कर दिया है।
लॉकडाउन के पहले सप्ताह के आंकड़े वायु गुणवत्ता में महत्वपूर्ण सुधार बताते हैं। वायु की गुणवत्ता को समवेत रूप से शामिल मुख्य वायु प्रदूषकों की मात्रा के आधार पर वायु गुणवत्ता इंडेक्स के रूप में आँका जाता है। एक्यूआई का स्तर शून्य से पचास होने पर हवा की गुणवत्ता अच्छी मानी जाती है। इक्यावन से सौ एक्यूआई वाली हवा संतोषजनक, एक सौ एक से दो सौ वाली मध्यम स्तर की खराब, दो सौ एक से तीन सौ वाली खराब, तीन सौ एक से चार सौ अत्यंत खराब एवं चार सौ एक से से पांच सौ ए क्यू आई वाली हवा को खतरनाक माना जाता है।
गंगा पर दिखा लॉक डाउन का असर, जो सालों में नहीं हुआ दिखा वैसा असर
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केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष 21 मार्च के 54 शहरों में अच्छी और संतोषजनक एवं 9 शहरों में खराब वायु गुणवत्ता इंडेक्स की तुलना में 29 मार्च को भारत के कुल 91 शहरों में वायु गुणवत्ता अच्छी (30 में) एवं संतोषजनक (61) पाई गई। इस दिन किसी भी शहर की हवा खराब नहीं मिली परन्तु कानपुर, लखनऊ, मुजफरनगर, कल्याण, सिंगरौली, गुवाहाटी जैसे कई शहरों में 25-28 मार्च के आंकड़ों अनुसार स्थानीय कारणों से पी. एम. 2.5 का स्तर अवश्य खराब रहा। दिल्ली में इस वर्ष 25 मार्च से 1 अप्रैल के बीच लॉकडाउन के पहले सप्ताह में पी.एम. 2.5 मात्र 16-42 माइक्रोग्राम पर क्यूबिक मीटर मापा गया जो 2019 में 72-187, 2018 में 72 से 171 तथा 2016 में 49 से 116 माइक्रोग्राम पर क्यूबिक की तुलना में काफी कम है।
फोटोग्राफ और मौके से की जा रही मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर कहा जा सकता है कि इस लॉकडाउन के कारण दिल्ली में यमुना एवं कानपुर तथा वाराणसी में गंगा के प्रदूषण स्तर में भी महत्वपूर्ण सुधार आया है। वैसै नमामि गंगे परियोजना पर अमल में कई लगातार प्रदूषित नालों को पिछले साल बंद किया जा चुका है। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि इस दौरान वाराणसी में गंगा में घुलनशील ऑक्सीजन की मात्रा 8.3 -8.9 ग्राम प्रति लीटर पाई गई जो स्वच्छ जल के न्यूनतम स्तर 7 ग्राम प्रति लीटर से पर्याप्त अधिक है। दिल्ली जल बोर्ड और नागरिकों का मानना है कि इस लॉकडाउन में यमुना का प्रदूषण स्तर भी पर्याप्त मात्रा में सुधरा है।
वर्तमान लाक डाउन के अब तक की पूरी अवधि के आकड़े सामने आएंगे तो वे निश्चित ही पर्यावरण के लिहाज से क्रांतिकारी होंगे। हो सकता है लाकडाउन अवधि और बढ़े। लेेेेकिन विश्व के लिए पर्यावरण और विकास के संतुलन पर अत्यंत गंभीर वक्त है,क्या भारत इसका नेतृत्व करेगा?
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