लॉकडाउन के दौरान इन दिनों दिल्ली का मौसम
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लोधी रोड, पंजाबी बाग स्थित शमशान घाटों पर भी अंतिम संस्कार के लिए आने वाले शवों में भी 25 से 50 प्रतिशत तक की कमी आई है। अगर इसका सही से विश्लेषण करें तो पाएंगे कि सड़क दुर्घटनाओं के कारण होने वाली मृत्यु समाप्त प्रायः हो गईं। प्रदूषण के चलते सांस के मरीजों को दिल्ली में नया जीवन मिला है और तनाव कम होने से हृदयाघात भी घटे हैं। यही नही अपराधों में भी बेतहाशा कमी आई है।
लोग एकाकी से संयुक्त परिवार की तरफ लौटेंगे। परिवार के साथ क्वालिटी समय बिताना एक अनूठा अनुभव साबित हुआ है। स्लम बन चुके महानगरों से प्रवासी लोगों का अपने गांवों की तरफ लौटना भी एक दृष्टि से सही ही है। इस बहाने लोग प्रकृति की तरफ लौटेंगे। बुजुर्गों ने ठीक कहा है कि हिंदुस्तान की आत्मा यहां के गांवों में बसती है। लेकिन अंधाधुंध पैसा कमाने और आधुनिकता की दौड़ ने पिछले कुछ दशकों में गांवों और शहरों के बीच एक असंतुलन बना दिया है।
प्रकृति के लिए यह बहुत अच्छा संकेत है। लॉक-डॉउन के चलते देश के महानगरों में वायु, जल और ध्वनि प्रदूषण में भारी गिरावट आई है। बेशक यह क्षण कुछ ही दिनों के लिए है। लेकिन पर्यावरणविद इसे प्रकृति के संरक्षण के लिए एक अच्छी पहल मान रहे हैं।
दरअसल, कोरोना जैसे वायरस का आक्रमण भी प्रकृति का संतुलन बिगड़ने से हुआ है। आधुनिकता की अंधी दौड़ में आज पूरी दुनिया ने प्रकृति का बेशुमार दोहन किया है। पर्यावरण के जानकार कह रहे हैं कि चीन में जंगली जानवरों को इंसान ने अपना ग्रास बनाना शुरू कर दिया है। जिसका परिणाम सारा विश्व भोग रहा है। भौतिकतावादियों का तर्क है कि किसी बीमारी या महामारी की वजह से सारी दुनिया को घरों में कैद नहीं किया जा सकता। हालांकि अभी तक कोरोना के इलाज का जवाब यह भौतिकतावादी नहीं खोज पाए।
दूसरी तरफ दुनियाभर के पर्यावरणविद और प्रकृति प्रेमियों का कहना है कि जिस तरह से लॉक-डॉउन के बाद सारी दुनिया में सकारात्मक प्रभाव देखे गए। उससे यह अनुभव सामने आया कि ठोस नीति बनाकर स्वेच्छा से अलग-अलग शहरों में साल में एक बार लॉक-डॉउन करके प्रकृति के संतुलन को साधा जा सकता है।
इसे इस तरीके से समझा जा सकता है कि भारतीय संस्कृति में व्रत रखने का महत्व है। वैज्ञानिक दृष्टि से व्रत के दौरान हमारा शरीर स्वयं का शोधन करता है। जिससे शरीर की कई बीमारियां स्वतः ठीक हो जाती हैं। इसी प्रकार साल में 15 दिनों के लिए लॉक डाउन करके प्रकृति को अपनी पुरानी रंगत में लौटने का अवसर मिल जाएगा।
आज हाथ मिलाने की जगह हाथ जोड़कर प्रणाम करने, शाकाहार अपनाने, मृत व्यक्तियों का दाह संस्कार करने जैसी भारतीय सनातन पंरपरा की तारीफ अमेरिका, स्पेन, इटली, जापान, कोरिया और जर्मनी के लोग भी कर रहे हैं और इसे अपनाने की वकालत भी रहे है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राज्यपाल असम के मीडिया सलाहकार हैं)
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