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ऑक्सीजन पर हाहाकार: क्या यह ‘राष्ट्रीय आपात काल’ नहीं है?

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देश में ऑक्सीजन सिलिंडरों की किल्लत - फोटो : pixabay
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अजय बोकिल
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सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को जब देश में प्राणवायु को लेकर मचे हाहाकार को ‘राष्ट्रीय आपातकाल जैसी स्थिति’ निरूपित किया, उसी से समझ जाना चाहिए कि मेडिकल ऑक्सीजन के संकट की हालत क्या है? देश के 6 हाईकोर्टों में ऑक्सीजन की किल्लत के मामले दायर हुए हैं। हालात से क्षुब्ध दिल्ली हाईकोर्ट ने तो यहां तक कहा कि सरकार कुछ भी करे पर ऑक्सीजन लेकर आए, क्योंकि लोगों के प्राण जा रहे हैं। कल इसी स्तम्भ में हमने ‘ऑक्सीजन को लेकर युद्ध जैसी स्थिति’ पर चर्चा की थी, लेकिन  हालात उससे भी बदतर होते दिख रहे हैं। देश की राजधानी दिल्ली में एक बड़े अस्पताल के सीईओ तो यह बताते हुए रो पड़े कि हमारे अस्पताल में ऑक्सीजन खत्म होने को है, हम क्या करें? कैसे कोविड मरीजों को बचाएं?

भोपाल, लखनऊ, जयपुर की हालत इससे अलग नहीं है। उधर दिल्ली के एक ऑक्सीजन टैंकर को हरियाणा पुलिस ने तब छोड़ा, जब मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने केन्द्र और हरियाणा सरकार से गुहार की। राज्यों के बीच ऑक्सीजन को लेकर मची इस शर्मनाक छीना-झपटी के बाद जागी केन्द्र सरकार ने ताबड़तोड़ एक आदेश जारी कर ऑक्सीजन सप्लाई पर आपदा प्रबंधन कानून लागू कर दिया है। इसके तहत अब मेडिकल ऑक्सीजन सप्लाई में किसी भी रुकावट के लिए जिले के कलेक्टर और एसपी जिम्मेदार होंगे। एक अच्छी बात यह हुई कि रेलवे ने ग्रीन काॅरिडोर बनाकर ऑक्सीजन टैंकर वैगन पर रखकर सप्लाई शुरू कर दी है। लेकिन सबसे राहत की बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपना जुनूनी ‘बंगाल विजय अभियान’ बीच में स्थगित कर कोरोना नियंत्रण और ऑक्सीजन सप्लाई पर ध्यान केन्द्रित किया है। उसका असर दिखने भी लगा है। कोविड मरीजों को प्राणवायु तुरंत मुहैया कराने की कोशिशें युद्ध स्तर पर शुरू कर दी गई हैं। काश, यह सब पहले शुरू होता। बहरहाल देश भर के अस्पताल ऑक्सीजन की भारी किल्लत से जूझ रहे हैं। कई अस्पतालों ने नोटिस लगा दिए हैं कि चूंकि ऑक्सीजन सप्लाई नहीं है, इसलिए नए मरीज भर्ती करना नामुमकिन है। अस्पताल और डाॅक्टर भी इस बिंदु पर असहाय हैं क्योंकि ऑक्सीजन का विकल्प केवल ऑक्सीजन ही है या फिर मौत है।
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ऐसे में आज हर भारतीय के मन में सवाल धधक रहा है कि आखिर देश में ऑक्सीजन का इतना टोटा पड़ क्यों गया है? जो चीज हवा में हरदम घुली रहती है, वह इतनी दुर्लभ क्यों हो गई है?

कैसे इतनी 'महंगी' हो गई प्राणवायु ? - फोटो : Pixabay
ऑक्सीजन का संकट इतना विकट है कि कोर्ट को भी कहना पड़ रहा है, कैसे भी करें पर मरीजों तक सांसें पहुंचाएं। इस मामले में स्वत: संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधिपति जस्टिस एसए बोबडे ने इसे ‘राष्ट्रीय आपातकाल जैसी’ स्थिति की संज्ञा दी है। कोर्ट ने सख्त लहजे में सरकार से पूछा कि आखिर ऑक्सीजन की कमी, वैक्सीनेशन की स्थिति और कोविड से लड़ने की उसकी ठोस राष्ट्रीय कार्य योजना क्या है? देश के 6 हाईकोर्टो में ऐसे मामलों की सुनवाई हो रही है। इससे भ्रम पैदा हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट के सवाल में यह शंका साफ झलकती है कि कोरोना से लड़ने की सरकार के पास कोई सुविचारित राष्ट्रीय योजना है भी या नहीं या सब तदर्थवादी ढंग से चल रहा है।  

इस बीच मीडिया में चौंकाने वाली एक खबर यह आई कि भारत ने जनवरी 2021 तक विदेशों को बड़ी मात्रा में ऑक्सीजन निर्यात की। इस खबर में भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के हवाले से बताया गया कि इस साल के शुरू में भारत से ऑक्सीजन का निर्यात पिछले साल की तुलना में हाल में समाप्त वित्तीय वर्ष में दोगुना हो गया। आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल 2020 से लेकर जनवरी 2021 के बीच भारत से 9 हजार मी.टन से ज्यादा ऑक्सीजन का निर्यात हुआ। इस साल जनवरी में यह निर्यात 734 प्रतिशत तक बढ़ गया। हालांकि भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय ( पीआईबी) ने इस खबर को गलत बताते हुए कहा है कि जो ऑक्सीजन निर्यात हुई, वह औद्योगिक ऑक्सीजन थी न कि मेडिकल ऑक्सीजन। जो मेडिकल ऑक्सीजन निर्यात हुई, उसकी मात्रा कुल का मात्र 0.4 फीसदी से कम है, जोकि नगण्य है।

सही क्या है, सरकार ही जाने। इस बीच प्रधानमंत्री ने गुरूवार को एक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक  कर देश में  ऑक्सीजन की उपलब्धता बढ़ाने के रास्तों और विकल्पों पर चर्चा की।  बैठक के बाद जारी अधिकृत बयान के मुताबिक देश में 20 राज्यों की ओर से प्रतिदिन 6785 मीट्रिक टन तरल चिकित्सीय ऑक्सीजन की वर्तमान मांग की जा रही है, जिसके मुकाबले 21 अप्रैल से उन्हें प्रतिदिन  6822 मीट्रिक टन मेडिकल ऑक्सीजन आवंटित की जा रही है। साथ ही सरकार के  व्यापक प्रयासों के बाद देश में तरल मेडिकल ऑक्सीजन की उपलब्धता 3300 मीट्रिक टन प्रतिदिन बढ़ी है। प्रधानमंत्री ने ऑक्सीजन की जमाखोरी करने के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।

हालांकि यह चर्चा भी जोरों पर है कि देश के तमाम रसूखदार लोगों ने अपने घरों में ऑक्सीजन का जरूरी स्टाॅक पहले ही कर लिया है। न जाने कब जरूरत पड़ जाए। मरण केवल आम लोगों का है। उनकी समझाइश के लिए कहा जा रहा है कि वो सिर्फ सकारात्मक सोचें। ऑक्सीजन के अभाव में मरने वाले कोरोना मरीजों पर  पर आंसू बहाने के बजाए ठीक होने वाले संक्रमितों की कहानी सुनकर ताली बजाएं। लेकिन सकारात्मकता कोई चुनावी अभियान नहीं है कि जहां दावे ही सच महसूस होने लगें। जमीनी  हकीकत यह है कि लोग अस्पतालो में बेड के लिए, बेड मिला तो दवाई के लिए, दवा मिली तो ऑक्सीजन के लिए दर-दर भटक रहे हैं। रो रहे हैं, गिड़गिड़ा रहे हैं कि एक ठो इंजेक्शन दिलवा दो, बेड दिलवा दो, वेंटीलेटर दिलवा दो, ऑक्सीजन सिलेंडर का जुगाड़ करवा दो, अस्पताल का बिल कम करवा दो।’ कुछ लोग मदद कर भी रहे हैं। लेकिन इन सबके बाद भी मरीज की सांसें हमेशा के लिए थम गई तो एम्बुलेंस वाजिब रेट में दिलवाने और विश्रामघाट पर जल्दी अंत्येष्टि तक के लिए हाथ-पैर जोड़ने पड़ रहे हैं। यह ‘आपात काल’ जैसी स्थिति नहीं है तो क्या है? उस पर मीडिया इस कड़वी सचाई को दिखाए तो  टीआरपी का शिकार!
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कैसे पूरी होगी देश में ऑक्सीजन की मांग? - फोटो : iStock
इस दौरान सरकार के कहने पर सेना भी मदद को आगे आई और उसने अपने अस्पताल कोविड मरीजों के लिए खोल दिए हैं। लेकिन सैनिक अस्पतालों की भी मर्यादा है। उनके पास सुसज्जित बेड हैं, उपकरण भी हैं। लेकिन ये अस्पताल भी ऑक्सीजन की कमी से जूझ रहे हैं। ऐेसे में वहां मरीज भर्ती कर भी दिए तो वास्तविक राहत उन्हें कैसे मिलेगी? इसका जवाब तो सेना के पास भी नहीं है।

बहरहाल बुनियादी सवाल वही कि देश में ऑक्सीजन का भारी टोटा क्यों है? एक तर्क यह है कि दिक्कत ऑक्सीजन उत्पादन में कमी की या उसके विदेशों को निर्यात की नहीं है, बल्कि ऑक्सीजन वितरण व्यवस्था में भारी खामी की है। तथ्य यह भी है कि जब देश से ऑक्सीजन निर्यात हो रही थी, उस वक्त मेडिकल ऑक्सीजन की घरेलू मांग केवल 700 से 2800 मी.टन प्रतिदिन की थी। लेकिन कोरोना की दूसरी लहर तेज होते ही यह मांग  बढ़कर 5 हजार मी.टन प्रतिदिन हो गई है। हालांकि अभी भी यह देश की कुल ऑक्सीजन उत्पादन क्षमता 7200 मी.टन से कम ही है। एक बड़ी ऑक्सीजन निर्माता कंपनी के संचालक का कहना है कि असल समस्या ऑक्सीजन उत्पादक संयत्रों और जहां  ऑक्सीजन की जरूरत है, उन स्थानों के बीच की बहुत दूरी भी है। देश में ज्यादातर ऑक्सीजन उत्पादक संयंत्र महाराष्ट्र और गुजरात में हैं, जबकि मेडिकल ऑक्सीजन की भारी मांग आज देश के लगभग सभी राज्यों में है। जाहिर है बाकी राज्यों ने ऑक्सीजन उत्पादन संयंत्र अपने यहां स्थापित करने को कभी गंभीरता से नहीं लिया। मप्र. जैसे बड़े राज्य में तो एक भी बड़ा ऑक्सीजन उत्पादक संयंत्र नहीं है। ईश्वर न करे कि अगर कोविड-2 की लहर इसी रफ्ताकर से बढ़ती रही और कोरोना संक्रमितों की संख्या प्रतिदिन  5 लाख ( अभी तीन लाख पार कर चुकी है) तक जा पहुंची तो फिर क्या होगा? कहां से आएगी, इतनी ऑक्सीजन? है कोई जवाब ?
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