समस्याओं की जड़ जनसंख्या वृद्धि
मानवता के सामने कोरोना से लेकर जितनी भी गंभीर समस्याएं आज खड़ी हैं उनके पीछे जनसंख्या की अनियंत्रित वृद्धि को जिम्मेदार माना जा रहा है। विश्व की जनसंख्या 7.7 अरब तक पहुंच चुकी है जबकि एक सदी पहले इस धरती पर 2 अरब से कम लोग रहते थे। ऐसा अनुमान है कि वर्ष 2025 तक जनसंख्या का यह आंकड़ा 8 अरब तक और यही रफ्तार रही तो वर्ष 2100 तक दुनिया की जनसंख्या 11 अरब तक पहुंच जाएगी।
ऐसी परिस्थितियों में सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि आखिर इस धरती के संसाधन इतने लोगों का भरण पोषण कर पाएंगे? अगर लाखों जीव और पादप प्रजातियों में से एक इंसान ने जीवन के लिए जरूरी इतने संासाधनों को हड़प लिया तो बाकी प्रजातियों का अस्तित्व कैसे बचेगा? सच्चाई तो यह है कि संसार की प्रजातियों का अस्तित्व बिना इंसान के सलामत रह जाएगा मगर वनस्पतियों के बिना इंसान का अस्तित्व नहीं बचेगा।
पृथ्वी के संसाधन अनन्त नहीं
पृथ्वी का आकार करोड़ों साल पहले जितना था, उतना ही आज भी हैं लेकिन पृथ्वी पर जीवधारियों के जीने के लिए भोजन, जल और ऊर्जा के जितने संसाधन थे उनमें कमी आ रही है। हम विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी के सहारे अन्य वस्तुओं के साथ ही कुछ समय के लिए अन्न का उत्पादन बढ़ा सकते हैं। पानी और हवा का इंतजाम भी कर सकते है। लेकिन इसकी भी तो कोई सीमा होगी। अंतरिक्ष अनंत हो सकता है लेकिन धरती अनन्त नहीं है।
इसीलिए सवाल उठता रहा है कि आखिर इस धरती पर कितने लोग सामान्य रूप से रह सकते हैं। धरती की धारक क्षमता पर प्लेटो से लेकर कार्ल माक्र्स और थाॅमस राॅबर्ट माल्थस तक प्राणि विज्ञानी, अर्थशास्त्री और मानव विज्ञानी अपनी-अपनी विवेचनाएं दे चुके हैं। लेकिन अर्थशास्त्री एवं वैज्ञानिक धरती की धारक क्षमता पर एक राय नहीं रहे। किसी ने यह क्षमता 5 अरब बताई तो किसी का अनुमान 1 खरब की जनसंख्या तक गया मगर सभी ने अनियंत्रित हो रही जनसंख्या पर चिन्ता अवश्य ही प्रकट की।
प्रकृति स्वयं भी करती है जनसंख्या को कम
धरती के लोगों की आय बढ़ने के साथ ही उनकी विलासिता की आवश्यकताऐं अगर इसी तरह बढ़ती रहीं तो प्राकृतिक संसाधन वर्तमान जनसंख्या के लिए भी पर्याप्त नहीं हो पाएंगे। उन असीमित आवश्यकताओं का संसाधनों पर पड़ रहे दबाव का परिणाम आज ओजोन परत पर छेद, वैश्विक तापमान में वृद्धि, अकाल, बाढ़, सुनामी, भूकंप और नवीनतम् आफत कोविड-19 के रूप में सामने आ रहा है। शायद इसीलिए प्रख्यात ब्रिटिश अर्थशास्त्री थाॅमस माल्थस ने 1798 में अपने बहुचर्चित जनसंख्या के सिद्धान्त ‘‘प्रिंसिपल आॅफ पाॅपुलेशन’’ में कहा था कि जब जनसंख्या और भोजन सहित प्राकृतिक संसाधनों में सन्तुलन गड़बड़ा जाता है तो प्रकृति अपने तरीके से इनके बीच सन्तुलन कायम रखती है।
माल्थस ने जनसंख्या नियंत्रण के प्राकृतिक तरीकों में भूख, महामारी, अकाल, बीमारी, प्राकृतिक आपदा और युद्ध जैसी विभीषिकाओं का उल्लेख किया था। ये सभी प्रकार की विभीषिकाएं आज प्रत्यक्ष नजर आ रही हैं, जिनमें कोरोना भी एक है। माल्थस के अनुसार जनसंख्या वृद्धि ज्यामितीय तरीके जैसे 1,2,4,16,32,64 आदि से होती है जबकि भोजन और अन्य संसाधनों में वृद्धि अंकगणितीय तरीके से होती है, जैसे 1,2,3,4,5,6 आदि।