राहुल गांधी के कांग्रेस को युवा बनाने के सपने का क्या हुआ?
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कांग्रेस को 'युवा' बनाने के सपने का क्या?
राहुल गांधी के अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद कांग्रेस पार्टी युवाओं को छोड़कर पुनः वयोवृद्ध नेताओं पर विश्वास जताने लगी। सोनिया गांधी को कार्यकारी अध्यक्ष बनना पड़ा। अभी राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के चुनाव में यह साफ-साफ झलक भी रहा है।
पहले चर्चा राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को अध्यक्ष बनाने की थी, जो 72 साल के हैं। 66 साल के शशि थरूर पहले दिन से चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुके हैं। राजस्थान में 25 सितंबर की रात कांग्रेस पार्टी में भारी उठा-पटक के बाद अशोक गहलोत रेस से बाहर हुए तो दिग्विजय सिंह का नाम सामने आया, जो 75 साल के हैं।
यदि आज पार्टी में नजर दौड़ाकर देखें तो युवा कहीं नजर नहीं आ रहे हैं। सवाल उठता है कि राहुल गांधी के कांग्रेस को युवा बनाने के सपने का क्या हुआ? क्या कारण थे कि वो पुनः अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठने को तैयार नहीं हुए? क्या इसके पीछे यही वयोवृद्ध नेताओं की ब्रिगेड है? जिसकी कार्यपद्धति से राहुल खुन्नस खाते रहे हैं, जिसके संकेत वो अपने पूर्व के बयानों में देते रहे हैं।
अब मल्लिकार्जुन खड़गे को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने से पार्टी कैसे युवाओं को जोड़ेगी? यह सवाल है। बेशक मल्लिकार्जुन खड़गे बहुत ही अनुभवी नेता हैं। कर्नाटक में प्रदेश अध्यक्ष और मंत्री, केंद्र में मंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष रह चुके हैं। राज्यसभा में वर्तमान में कांग्रेस पार्टी के नेता हैं। हालांकि, आज के समय में केवल अनुभव होने से काम नहीं चलता है।
कांग्रेस को ऐसे जननेता की जरूरत है, जो पार्टी को पुनः भाजपा के मुकाबले में लाकर खड़ाकर सके। सोनिया गांधी ने अध्यक्ष बनने के बाद दो बार केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनवाई। वैसा ही करिश्मा दिखाने की आवश्यकता है।
खड़गे के आगे बड़ी चुनौतियां
मल्लिकार्जुन खड़गे के आगे सबसे बड़ी चुनौती आगामी गुजरात और हिमाचल विधानसभा चुनाव की होगी। गुजरात में अशोक गहलोत पर्यवेक्षक की भूमिका हैं। अब खड़गे किसी नए नेता को जिम्मेदारी देंगे या गहलोत पर ही विश्वास जताएंगे। जी-23 के नेताओं से वो कैसे डील करेंगे? क्योंकि हिमाचल प्रदेश में आनंद शर्मा सख्त तेवर दिखा चुके हैं।
खड़गे के आगे राजस्थान और छत्तीसगढ़ की चुनौती भी होगी। राजस्थान में बगावत की धूल अभी बैठी नहीं है। उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में क्या 80 वर्षीय खड़गे पार्टी में जोश भर पाएंगे? जहां पार्टी का झंडे उठाने वाले गायब हो चुके हैं। पंजाब, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र के साथ दक्षिण भारत के केरल, अपने खुद के राज्य कर्नाटक में भी खड़गे को चुनौतियों से दो-चार होना पड़ेगा।
अंत में गांधी परिवार से वो कैसे समन्वय बनाकर चलेंगे? क्योंकि परिवार के प्रति निष्ठा के चलते कुर्सी तो मिल जाएगी, लेकिन पर्दे के पीछे से राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के दिशा-निर्देशों को साधकर चलना आसान नहीं होगा। कुल मिलाकर कांग्रेस अध्यक्ष की कांटों भरी कुर्सी मल्लिकार्जुन खड़गे को मिलेगी। समय बताएगा कि उनके नेतृत्व में कांग्रेस का कितना भला हो पाएगा?
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