सिर्फ एक जीत से इतिहास में कितना कुछ बदल सकता है? सिर्फ एक जीत के चलते किसी कप्तान की साधारण सी दिखने वाली विरासत कैसे स्वर्णिम होने लगती है? सिर्फ एक जीत से पूरी दुनिया को कैसे एहसास हो सकता है कि वाकई में बीसीसीआई ना सिर्फ पैसों के मामले में सबसे अमीर बोर्ड है बल्कि भारत के क्रिकेट संसाधनों की नैसर्गिकता के मामले में भी उसका कोई जोड़ नहीं है।
आज कोहली या उनके चाहने वाले ऐसा सोचते हैं तो ओवल टेस्ट की जीत उसकी वजह है। वरना यह टेस्ट हारते या ड्रॉ होता तो शायद इंग्लैंड में सीरीज जीतने का सपना पूरा नहीं होता औऱ बाकि के सपने तो आप देख भी नहीं सकते।
पिछले 42 सालों में टीम इंडिया ने विदेशी ज़मीं पर पहली पारी में इतने ज़्यादा रन (99) की बढ़त गंवाकर टेस्ट मैच जीता नहीं था। इससे पहले लॉर्ड्स में आखिरी सत्र में छह विकेट लेकर भारत ने जो मैच जीता उसकी भी मिसाल विदेशी ज़मीं पर टीम इंडिया ने कभी नहीं दिखाई थी।
ऑस्ट्रेलिया में एडिलेड में 36 रन पर ऑलआउट होने के बाद ये टीम ऐसा पलटवार करती है कि सीरीज़ जीतती है, इंग्लैंड में हैडिंग्ले में 78 रन पर ऑलआउट होने के बाद ये टीम ऐसा पलटवार करती है कि इसने क्रिकेट में संवेग के नियम को झूठा साबित कर दिया है जिसे अब तक पत्थर की लकीर के बराबर का दर्जा हासिल हुआ करता था।
चलते-चलते आखिरी बात-
अक्सर महान टीमों की महानता का आकलन इस बात से होता है कि उस टीम की सबसे कमज़ोर कड़ी क्या है। बल्लेबाज़ी में इस टीम की सबसे कमजोर कड़ी अंजिक्य रहाणे हैं, जिनके टेस्ट करियर को इतिहास कमज़ोर करके नहीं आंक सकता है। गेंदबाज़ी में इस टीम के लिए कमज़ोर कड़ी शार्दुल ठाकुर दिखते हैं जिन्होंने बेशकीमती विकेट लेकर मैच का पासा ही पलट डाला। स्पिन गेंदबाज़ी में रविंद्र जडेजा को 227 टेस्ट विकेट लेने के बावजूद एक ऑलराउंडर ही ज्यादा माना जाता है।
अब आप खुद सोचिए कि अगर कोहली इतने अहम टेस्ट से पहले ईशांत शर्मा, अश्विन और मोहम्मद शमी के बगैर मैदान में उतर सकते हैं तो टीम इंडिया के पास क्रिकेट संसाधनों की नैसर्गिकता के मामले में कोई जोड़ नहीं है।
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