इन दिनों मप्र और उप्र भाजपा से जो संदेश केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंच रहे हैं वे राख के नीचे चिंगारी की आशंका जता रहे हैं।
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इन दिनों मप्र और उप्र भाजपा से जो संदेश केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंच रहे हैं वे राख के नीचे चिंगारी की आशंका जता रहे हैं। इसकी शुरुआत जून के आरंभ से हुई। चौथी बार मप्र के मुख्यमंत्री बने शिवराज सिंह चौहान एक साल बीत जाने के बावजूद पूरी तरह निश्चिंत नहीं हो पाए हैं।
गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा और गोपाल भार्गव एकतरफा उनके साथ नहीं है। रही,सही कसर दमोह उप चुनाव के नतीजे ने कर दी,जिसमें कांग्रेस से आए व्यक्ति को भाजपा का टिकट देने से पहले नाराजी उपजी,फिर बुरी तरह हार हो गई। इससे उबरे भी नहीं थे कि भोपाल में भाजपा के नेताओं की मेल,मुलाकातों ने नौतपा जैसी गर्माहट घोल दी।
मप्र की सियासत और विजयवर्गीय
करीब छह साल से राष्ट्रीय महामंत्री बनाकर पहले हरियाणा,फिर पश्चिम बंगाल भेजे गए कैलाश विजयवर्गीय तीन दिन भोपाल क्या रहे,जैसे भाजपा के अंदरखाने हलचल मच गई। अरसे बाद अपने गृह प्रदेश लौटे विजयवर्गीय ने शिवराज के साथ,,साथ नरोत्तम मिश्रा,संगठन महामंत्री सुहास भगत,प्रदेश अध्यक्ष वी डी शर्मा आदि से मुलाकात की और चल पड़ा अनेक तरह की अटकलों का सिलसिला।
भोपाल से वे दिल्ली पहुंचे तो केंद्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल,नरेंद्र सिंह तोमर वगैरह से भी जब मिले तो अटकलों को नए आयाम मिल गए। इधर भोपाल में प्रदेश संगठन प्रभारी शिवप्रकाश का आना और उनका मिलना,जुलना भी चर्चा में रहा। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा भी इस बीच भोपाल आकर नेताओं से मिले। वैसे मेल,मुलाकात करने वाले नेताओं की ओर से बयान आए हैं कि शिवराज मुख्यमंत्री थे,हैं और रहेंगे। बाकी भविष्य की गर्त में है।
पीएम आवास में पीएम मोदी से मिले सीएम योगी
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यूपी में सियासी हलचल
उधर, देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश की राजनीति में भी काफी खदबदाहट हो रही है। वहां पहले अप्रैल, मई में फैले कोरोना से हुई मौतों और लाशों को गंगा आदि नदियों में बहने का हल्ला मचा। उसी दौरान हुए पंचायत चुनाव में भाजपा को मिली शिकस्त ने जैसे आग में घी का काम किया। भाजपा के भीतर ही जो लोग मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पसंद नहीं करते थे, वे मुखर होने लगे।
योगी ने भी आलाकमान को तेवर दिखाने शुरू कर दिए,ऐसे संकेत आने लगे। जैसे, कुछ अरसा पहले केंद्र से सेवा निवृत्ति लेकर आई ए एस अधिकारी अरविंद कुमार शर्मा को लखनऊ भेजा गया था,ताकि वे वहां राजनीतिक जिम्मेदारी संभालते हुए एक तरफ नौकरशाही को नियंत्रित करें तो दूसरी तरफ ब्राहमण वोट बैंक को साधे।
इस पहल से योगी की नाराजी रही और उन्होंने सीधे तौर पर शर्मा की उपेक्षा कर दी। संभावना थी कि उन्हें उप मुख्यमंत्री बना दिया जाएगा,वह तो धरा रह गया, होगी ने उन्हें वह शासकीय आवास तक नहीं दिया,जिसे शर्मा ने मांगा था। इसे सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से टकराव माना गया।
उप्र में भाजपा के बीच मची हलचल अब तो सतह पर दिखाई देने लगी है। हाल ही में उप्र सरकार ने कुछ विज्ञापन जारी किए तो उनमें मोदी के फोटो गायब रहे। इसने योगी,मोदी टकराहट को हवा ही दी। इतना ही नहीं तो योगी के मुख्यमंत्री बनने के पहले दिन से खफा रहे उप्र भाजपा के दमदार नेता स्वतंत्र देव सिंह उन विज्ञापनों में नजर आए,जिनमें मोदी नहीं थे।
इसी बीच 9 जून को उप्र के कांग्रेस नेता नितिन प्रसाद ने दिल्ली जाकर भाजपा की सदस्यता ले ली। वे उप्र के ब्राहमण नेता हैं और उनके पिता जितेन्द्र प्रसाद आजीवन कांग्रेस नेता रहे और केंद्र में मंत्री भी रहे। उप्र की राजनीति यादव,दलित,ठाकुर और ब्राहमण के इर्द,गिर्द घूमती है।
पश्चिम बंगाल भी भाजपा और मोदीजी को चैन नहीं लेने दे रहा है। पहले तो वहां नतीजे आने के साथ ही तृणमूल कार्यकर्ताओं ने भाजपा कार्यकर्ताओं,समर्थकों को चुन,चुन कर मारा,लूटा,आगजनी की ।इसे रोकने के लिए ममता बनर्जी ने लॉक डाउन लगा दिया,ताकि समर्थक थोड़ा रुक जाएं और भाजपा को भी तात्कालिक राहत रहे। फिर उसने भाजपा नेताओं के खिलाफ पुलिस प्रकरण का सिलसिला प्रारंभ कर दिया है।
नंदीग्राम में ममता बनर्जी को हरा चुके सुवेंदू अधिकारी और उनके भाई सौमेंदू के खिलाफ राहत सामग्री चुराने के आरोप में एफ आई आर हो चुकी है तो प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष और अर्जुन सिंह के खिलाफ क्रमशः 65 और 70 प्रकरण लंबित होने की बात पुलिस कह चुकी है। जाहिर सी बात है कि तलवार लटका दी गई है। जब ममता की मर्जी होगी,वह गिरा दी जाएगी।
उप्र में फरवरी ,मार्च में विधानसभा चुनाव हैं,जहां अहम का टकराहट गहरा गड्ढा कर सकता है।
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बंगाल में नई चुनौतियां
इसी तरह से चुनाव पूर्व तृणमूल से भाजपा में आए कुछ महत्वपूर्ण नेताओं के घर वापसी की अटकलें भी चल पड़ी है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण नाम मुकुल रॉय का है,जो इस समय भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। उनके साथ शमिक भट्टाचार्य और राजीव बैनर्जी के नाम भी लिए जा रहे हैं।
इसी बीच भाजपा की ओर से केंद्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार की चर्चाएं भी चल पड़ी है,जिनमें मुकुल रॉय को शरीक करना बताया जा रहा है। दरअसल ये चर्चाएं प्रारंभ हुई ममता के भतीजे अभिषेक के मुकुल रॉय की पत्नी को अस्पताल में देखने जाने के बाद।वे करीब एक माह से भर्ती हैं,लेकिन तब तक कोई भाजपा नेता उन्हें देखने नहीं गया था।जैसे ही अभिषेक पहुंचे तो पीछे,पीछे सारे काम छोड़कर दिलीप घोष भी पहुंचे,लेकिन तब तक काफी दर हो चुकी थी।
इस तरह से भाजपा का जहाज तूफान में फंसता नजर आ रहा है। बंगाल की लड़ाई लंबी है। उप्र में फरवरी ,मार्च में विधानसभा चुनाव हैं,जहां अहम का टकराहट गहरा गड्ढा कर सकता है। मप्र में भी सियासी हलचल वातावरण को अशांत तो कर ही चुकी है। इन सारी उठापटक के बीच दिल्ली में 3 दिन तक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की बैठक हुई। इस तरह की बैठकों से राजनीतिक तकाजों का कभी जिक्र बाहर नहीं आता,किन्तु माना तो यही जा रहा है कि उसमें उप्र के चुनाव को लेकर अहम फैसले लिए गए। जिसमें यह भी है कि वहां चुनाव तक तो योगी का चेहरा ही सामने रहेगा।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि 2024 के आम चुनाव तक भाजपा को बाहरी और भीतरी हमलों का खतरा बना रहेगा। ऐसे में भाजपा का जहाज टाइटैनिक बनेगा या विक्रांत की तरह तूफान से टक्कर लेकर भी सलामत रहेगा?
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