क्या आपने कभी गौर किया है कि शायद ही कोई गौरैया (sparrow) आजकल आपके घर में प्रवेश करती है, और शायद ही आपको पंखे को बंद करने के लिए दौड़ने की आवश्यकता होती है, ताकि वह घायल न हो?
लॉकडाउन के दौरान जब हम सब अपने अपने घरों में बंद थे, तब एक हास्यास्पद एक्शन फिल्म देखते हुए मुझे यह एहसास हुआ कि इस तरह की घटनाएं, जो मेरे बचपन में बहुत आम थी, अब बहुत ही दुर्लभ हो गई हैं। लेकिन, अगर हम केवल थोड़ा ज़्यादा अवलोकन करें, थोड़ा अधिक सुनें, तो पाएंगे कि हमारे आसपास एक अद्भुत नाटक खेला जा रहा है।
हालांकि मैं बर्ड वॉचिंग अक्सर करता हूं, वह आमतौर पर घर के बाहर होता है, कभी-कभार घर से कुछ पक्षी दिखाई देते हैं। लेकिन लॉकडाउन ने मुझे अपने घर के आसपास पक्षियों का विस्तृत निरीक्षण करने का एक अनूठा अवसर प्रदान किया। उसका लाभ उठाते हुए, मैंने अपनी पसंद के हथियार- दूरबीन और मर्लिन बर्ड आईडी मोबाइल ऐप- थामे, और बालकनी बर्डिंग की यात्रा पर निकल गया।
मार्च के मध्य में, जब कोविड-19 देश में अपने पैर जमा रहा था और देश लॉकडाउन में प्रवेश कर रहा था, तब भी मैं सर्दियों के प्रवासी पक्षियों को देख सकता था । कुंज (demoiselle crane) के झुंडों का लालित्य मेरे सिर के ऊपर से रक्स करता सा गुजरता था।
कुछ झुंड महज चंद पक्षियों से बने हुए होते थे, तो कुछ सैकड़ों से, मगर सारे थर्मल कॉलम (उष्ण हवा की धारा) की मदद से मंडराते हुए ऊंचाई हासिल कर अपनी तीव्र ट्रम्पेटिंग (कलरव) से हंगामा मचाया करते थे। उनके साथ कभी कभी पेलिकन (pelican) के समूह भी होते था।
कुंजों की ट्रम्पेटिंग (कलरव) का कोलाहल मेरी छत पर अप्रैल के मध्य तक बना रहा। तत्पश्चात सारे कुंज हिमालय को पार करके मंगोलिया, चीन और उत्तरी एशिया के अन्य भागों में अपने प्रजनन स्थलों को चले गए।
रात्रि अपने साथ पक्षियों का एक नया समाज लेकर आती है।
स्ट्रीट लाइट चालू होने के कुछ ही मिनटों बाद, एक खूसटिया (धब्बेदार उल्लू – spotted owlet) मेरे घर के ठीक सामने लैंप के ऊपर लगे बिजली के तार पर बैठ जाया करता था। जैसे-जैसे अंधेरा बढ़ता, पतंगे और झींगुर दीपक की ओर आकर्षित होते थे, जिन पर लपकने के लिए वह उल्लू तैयार रहता था।
उल्लू का हवा में कीड़े पकड़ कर तार पर वापस बैठ जाना, कभी कीट को पूरा ही निगल जाना, तो कभी खाने से पहले बेरहमी से उसके पंख तोड़ना और तार पर पटककर बेहोश करना- यह देखना मेरे लिए रोज़ शाम का अनुष्ठान बन गया।
जून की एक सुबह, अपने घर के पीछे एक छोटे से खेत में चलते हुए, मैंने एक टिटिहरी (red-wattled lapwing) की चिड़चिड़ी आवाज सुनी। आस पास ढूंढा तो पाया कि वह जमीन पर बने मिट्टी और कंकड़ के एक छोटे से टीले से दूर भाग रही थी। वह मिट्टी का टीला एक घोंसला था, जिसमें मिट्टी जैसे रंग के चार अंडे थे। उस दिन के बाद से, मैं प्रतिदिन जाकर उस घोंसले को देखा करता था।
मैंने देखा कि नर और मादा दोनों अंडों को बारी-बारी से सेते थे, यहां तक कि दोपहर की चिलचिलाती धूप में भी। उसी समय के आसपास, मुझे खेत के दूर कोने में एक पेड़ पर एक कौआ (house crow) का घोंसला भी मिला था, जिसे मैं अपने घर की छत से अपनी दूरबीन से देख सकता था।
मैंने पाया कि कौए संवेदनशील और समर्पित माता-पिता होते हैं, और अंडों की रक्षा करने के लिए घोसले में हर वक्त एक कौआ रहता ही है। टिटिहरी के अंडों से 28 से 30 दिनों के भीतर चूजे निकल जाते हैं, और कौए के अंडे से 14 से 20 दिनों में। इसलिए, मैं बड़ी ही आतुरता से दोनों प्रजातियों के चूजों को बड़े होते और उड़ना सीखते हुए देखने के लिए इंतजार कर रहा था।