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बिहार चुनाव 2020: क्या मतदाताओं को उलझा रही है गठबंधन की राजनीति?

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Bihar Assembly Election 2020: इस बार राजनीतिक दलों के गठबंधन ने भी शुरुआत से ही मतदाताओं को उलझाए रखा है। - फोटो : अमर उजाला
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बिहार में 1990 से 2005 तक लालू-राबड़ी शासन और फिर 2005 से 2020 तक नीतीश के नेतृत्व में एनडीए शासन, मोटे तौर पर बिहार के दोनों शीर्ष नेता लालू प्रसाद और नीतीश कुमार को 15-15 साल राज करने वाले मुखिया के रूप में देखा जाता है। इन 30 सालों में कुछेक बार राष्ट्रपति शासन भी लगे, लेकिन  नीतीश सरकार का 2015-20 वाला कार्यकाल सबसे ज्यादा चौंकाने वाला रहा।

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राजनीतिक प्रयोगशाला कहे जाने वाले बिहार ने लोकतंत्र का ऐसा संयोग या दुर्योग पहले नहीं देखा था कि चुनाव में जनता द्वारा नकारी गई पार्टी (भाजपा) सत्ता में हिस्सेदार बन बैठी हो, जबकि चुनी हुई पार्टी(महागठबंधन) को विपक्ष में बैठना पड़ा। 


देश में जिस तरह भाजपा ने सर्वाधिक सीटों पर जीत दर्ज कर साल 2014 और 2019 अपने बूते एनडीए सरकार बनाई, वैसा करिश्मा बिहार में नीतीश कभी नहीं कर पाए। पहले दो कार्यकाल में उन्होंने भाजपा, लोजपा के सहयोग से सरकार बनाई लेकिन तीसरे कार्यकाल में राजनीतिक मतभेदों के कारण राजद और कांग्रेस जैसे अपने चिर प्रतिद्वंदी दलों का हाथ थाम लिया। 
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एनडीए का दामन छोड़ नीतीश महागठबंधन में शामिल हुए तो अलग-अलग विचारधाराओं और राजनीतिक झुकाव होने के बावजूद बिहार के मतदाताओं ने भाजपा के विरोध में वोट कर सरकार बनाई। नीतीश फिर से मुख्यमंत्री चुने गए।

इस बीच भागलपुर में अरबों के सृजन घोटाले में सीबीआई जांच की अनुशंसा, लालू प्रसाद का जेल से बाहर न निकल पाना, डिप्टी सीएम रहे तेजस्वी पर लगातार हो रहे राजनीतिक हमले और इन सारे घटनाक्रमों के बीच नीतीश की चुप्पी ने इशारा कर दिया था कि भाजपा अपनी राजनीतिक मंशा में कामयाबी के करीब है। आखिरकार हुआ वही जिसकी संभावना थी। जुलाई 2017 में भाजपा फिर से सत्ता में हिस्सेदार बनी और राजद-कांग्रेस को विपक्ष में बैठने को मजबूर हो गए। 

सीएम नीतीश के इस कार्यकाल ने चुनाव से पहले और चुनाव के बाद 'बिहार में गठबंधन की राजनीति' का समीकरण बदल कर रख दिया। बिहार विधानसभा चुनाव 2020 कोरोना काल में व्यापक तौर पर हो रहा पहला चुनाव है, जिसमें प्रचार से लेकर सभाएं और जनसंपर्क अभियान तक सीमाओं में बंधे हैं। इस बार राजनीतिक दलों के गठबंधन ने भी शुरुआत से ही मतदाताओं को उलझाए रखा है। 

बिहार में तीन चरणों में विधानसभा चुनाव होंगे - फोटो : अमर उजाला
इस बार फिर से मुकाबला मुख्यत: दो गठबंधन के बीच है। नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए और लालू पुत्र तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन के बीच। तीसरे मोर्चे की जो संभावना कभी जन अधिकार पार्टी वाले राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव और कभी रालोसपा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ढूंढ रहे थे, उसका भविष्य शुरुआत से ही मुश्किल और लगभग नामुमकिन-सा रहा है। दलगत राजनीति से अलग सोच प्रदर्शित करते हुए पोस्टर गर्ल पुष्पम प्रिया चौधरी ने चौंकाया तो जरूर, लेकिन जाति आधारित राजनीति के बीच उनके लिए जगह बनती नहीं दिख रही है। 

बिहार में सवर्ण मतदाताओं की संख्या लगभग 15 फीसदी है। एमवाई यानी मुस्लिम और यादव वोट की हिस्सेदारी करीब 30 फीसदी है। गैर यादव वैश्य वोट करीब 35 फीसदी, जबकि दलित मतदाताओं की संख्या करीब 20 फीसदी है। इस बाद के चुनाव में दलित राजनीति का भी प्रयोग हो रहा है। केंद्र में एनडीए में सहयोगी लोजपा यहां जदयू से अलग है। सीट बंटवारे से पहले से ही लोजपा नेता नीतीश कुमार पर आंखे तरेरते दिख रहे हैं। 

भाजपा भले ही यह कहे कि वह जदयूनीत एनडीए के विरोधी के साथ नहीं, लेकिन चिराग पासवान का स्पष्ट कहना है कि वह जदयू के खिलाफ हर सीट पर उम्मीदवार उतारेंगे, जोकि वह कर भी रहे हैं। चुनाव बाद भाजपा के साथ सरकार बनाने में उनकी दिलचस्पी अभी से दिख रही है।

इधर, सीट बंटवारे पर ही महागठबंधन से छिटके मुकेश सहनी वाली वीआईपी को भाजपा ने 11 सीटें दी है। निश्चित ही उनके जरिए अति पिछड़ों का वोट अपने पाले में करना उनका उद्देश्य रहा होगा। अपने पुराने सहयोगी रहे जीतन राम मांझी की हम पार्टी को सात सीट देकर नीतीश ने महागठबंधन के पाले से झटक लिया है। 
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हालिया परिस्थितियां ना तो नीतीश कुमार के लिए सहज है और ना ही महागठबंधन के लिए - फोटो : अमर उजाला
राजनीतिक पार्टियों के लिए दलबदल कोई नई बात नहीं, लेकिन 2015 विधानसभा चुनाव में सरकार चुनने के बावजूद सत्ता में हुई फेरबदल झेल चुकी जनता गठबंधन की राजनीति से संशय में है। महागठबंधन में तेजस्वी मुख्यमंत्री का चेहरा बने हुए हैं, जिनसे उन्हीं के सहयोगी दलों के कुछ नेताओं और समर्थकों को आपत्ति हो सकती है। भले ही चुप रहना उनकी मजबूरी हो। लोजपा केंद्र में एनडीए में शामिल है और बिहार में जदयू की विरोधी।

हालिया परिस्थितियां ना तो नीतीश कुमार के लिए सहज है और ना ही महागठबंधन के लिए। नीतीश को कोरोना संकट, रोजगार, पलायन आदि मुद्दों पर सरकार विरोधी लहर का सामना करना पड़ सकता है तो महागठबंधन को राजद के पुराने कार्यकाल और शीर्ष नेता रहे लालू यादव की अनुपस्थिति का नुकसान उठाना पड़ सकता है। कुल मिलाकर मतदाताओं तो फिलहाल के हिस्से संशय की स्थिति ही है। 

राजनीतिक रुचि वाले अनुभवी लोगों का तो यहां तक कहना है कि बिहार में भाजपा के पास मुखिया के चेहरे का संकट रहा है और वह इतनी मजबूत स्थिति में नहीं है कि अकेले ताल ठोक पाए, इसलिए नीतीश के साथ साझेदारी को वे मजबूरी का गठबंधन मानते हैं।

एक आशंका यह भी है कि 2019 आम चुनाव में जिस तरह विपक्ष सरकार विरोधी लहर को अपने पक्ष में नहीं कर पाया और मौका गंवा दिया, वही हाल कहीं बिहार विधानसभा चुनाव में भी न हो जाए। चुनाव बाद समीकरण एक बार फिर से बदल जाए और दोनों महागठबंधन के विघटन से कोई तीसरी ही तस्वीर उभर जाए तो ऐसे में आश्चर्य नहीं होना चाहिए। फिलवक्त मतदान होना शेष है और 10 नवंबर अभी दूर है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 
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