बिहार में तीन चरणों में विधानसभा चुनाव होंगे
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इस बार फिर से मुकाबला मुख्यत: दो गठबंधन के बीच है। नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए और लालू पुत्र तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन के बीच। तीसरे मोर्चे की जो संभावना कभी जन अधिकार पार्टी वाले राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव और कभी रालोसपा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ढूंढ रहे थे, उसका भविष्य शुरुआत से ही मुश्किल और लगभग नामुमकिन-सा रहा है। दलगत राजनीति से अलग सोच प्रदर्शित करते हुए पोस्टर गर्ल पुष्पम प्रिया चौधरी ने चौंकाया तो जरूर, लेकिन जाति आधारित राजनीति के बीच उनके लिए जगह बनती नहीं दिख रही है।
बिहार में सवर्ण मतदाताओं की संख्या लगभग 15 फीसदी है। एमवाई यानी मुस्लिम और यादव वोट की हिस्सेदारी करीब 30 फीसदी है। गैर यादव वैश्य वोट करीब 35 फीसदी, जबकि दलित मतदाताओं की संख्या करीब 20 फीसदी है। इस बाद के चुनाव में दलित राजनीति का भी प्रयोग हो रहा है। केंद्र में एनडीए में सहयोगी लोजपा यहां जदयू से अलग है। सीट बंटवारे से पहले से ही लोजपा नेता नीतीश कुमार पर आंखे तरेरते दिख रहे हैं।
भाजपा भले ही यह कहे कि वह जदयूनीत एनडीए के विरोधी के साथ नहीं, लेकिन चिराग पासवान का स्पष्ट कहना है कि वह जदयू के खिलाफ हर सीट पर उम्मीदवार उतारेंगे, जोकि वह कर भी रहे हैं। चुनाव बाद भाजपा के साथ सरकार बनाने में उनकी दिलचस्पी अभी से दिख रही है।
इधर, सीट बंटवारे पर ही महागठबंधन से छिटके मुकेश सहनी वाली वीआईपी को भाजपा ने 11 सीटें दी है। निश्चित ही उनके जरिए अति पिछड़ों का वोट अपने पाले में करना उनका उद्देश्य रहा होगा। अपने पुराने सहयोगी रहे जीतन राम मांझी की हम पार्टी को सात सीट देकर नीतीश ने महागठबंधन के पाले से झटक लिया है।
हालिया परिस्थितियां ना तो नीतीश कुमार के लिए सहज है और ना ही महागठबंधन के लिए
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राजनीतिक पार्टियों के लिए दलबदल कोई नई बात नहीं, लेकिन 2015 विधानसभा चुनाव में सरकार चुनने के बावजूद सत्ता में हुई फेरबदल झेल चुकी जनता गठबंधन की राजनीति से संशय में है। महागठबंधन में तेजस्वी मुख्यमंत्री का चेहरा बने हुए हैं, जिनसे उन्हीं के सहयोगी दलों के कुछ नेताओं और समर्थकों को आपत्ति हो सकती है। भले ही चुप रहना उनकी मजबूरी हो। लोजपा केंद्र में एनडीए में शामिल है और बिहार में जदयू की विरोधी।
हालिया परिस्थितियां ना तो नीतीश कुमार के लिए सहज है और ना ही महागठबंधन के लिए। नीतीश को कोरोना संकट, रोजगार, पलायन आदि मुद्दों पर सरकार विरोधी लहर का सामना करना पड़ सकता है तो महागठबंधन को राजद के पुराने कार्यकाल और शीर्ष नेता रहे लालू यादव की अनुपस्थिति का नुकसान उठाना पड़ सकता है। कुल मिलाकर मतदाताओं तो फिलहाल के हिस्से संशय की स्थिति ही है।
राजनीतिक रुचि वाले अनुभवी लोगों का तो यहां तक कहना है कि बिहार में भाजपा के पास मुखिया के चेहरे का संकट रहा है और वह इतनी मजबूत स्थिति में नहीं है कि अकेले ताल ठोक पाए, इसलिए नीतीश के साथ साझेदारी को वे मजबूरी का गठबंधन मानते हैं।
एक आशंका यह भी है कि 2019 आम चुनाव में जिस तरह विपक्ष सरकार विरोधी लहर को अपने पक्ष में नहीं कर पाया और मौका गंवा दिया, वही हाल कहीं बिहार विधानसभा चुनाव में भी न हो जाए। चुनाव बाद समीकरण एक बार फिर से बदल जाए और दोनों महागठबंधन के विघटन से कोई तीसरी ही तस्वीर उभर जाए तो ऐसे में आश्चर्य नहीं होना चाहिए। फिलवक्त मतदान होना शेष है और 10 नवंबर अभी दूर है।
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