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ऋतु चक्र और प्रकृति का संसार: कुदरत की निरंतरता में रचता-बसता पतझड़

सार

बाकी देशों में जहां तीन या चार मौसम होते हैं, अपने देश में हम छह मौसम का आनंद उठाते हैं। बसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर ऋतु। मौसम के लिहाज से शरद ऋतु बारिश के मौसम के बाद आती है। शरद ऋतु का मतलब है ऑटम सीजन। सामन्य तरीके से हम सब इसे पतझड का मौसम कह देते हैं। इस मौसम में सब कुछ बदला बदला सा नजर आता है।
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शरद ऋतु का मतलब है ऑटम सीजन। सामान्य तरीके से हम सब इसे पतझड का मौसम कह देते हैं। - फोटो : Pixabay
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विस्तार
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बाकी देशों में जहां तीन या चार मौसम होते हैं, अपने देश में हम छह मौसम का आनंद उठाते हैं। बसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर ऋतु। मौसम के लिहाज से शरद ऋतु बारिश के मौसम के बाद आती है। शरद ऋतु का मतलब है ऑटम सीजन। सामान्य तरीके से हम सब इसे पतझड का मौसम कह देते हैं।

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इस मौसम में सब कुछ बदला बदला सा नजर आता है। सब कुछ ठहरा ठहरा सा। अलसाया अलसाया सा। यूं लगता है कि कुदरत जरा ठहर सी गई है। मन भी शांत और सकून से भरा सा लगता है। थोड़ा रूमानियत भरा। जब सब कुछ सुंदर लगता है। बिल्कुल वैसा ही।

इस मौसम में पत्ते झर-झर कर गिरने लगते हैं। पीले, लाल, कत्थई और नारंजी रंग के पत्ते। सुबह के वक्त बाग या पेड़ों वाले पार्क मे जाइए तो जमीन पर यह पत्ते बिखरे नजर आते हैं। दूर से देखने पर यूं लगता है मानो जमीन का रंग बदल गया हो। पेड़ों पर बचे बाकी पत्तों से छन कर आती पीली-पीली सी अलसाई सी धूप देखने में बहुत भली सी लगती है।
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जमीन पर बिखरे यह पत्ते दरअसल मौसम की पाती हैं। यह पाती बताती हैं कि मौसम का मिजाज बदल रहा है। यह बिखरे हुए से पत्ते एहसास दिलाते हैं, कुदरत के एक अटल नियम का। कुदरत का ऐसा कायदा जो कभी नहीं बदलता। कभी नहीं टलता। यह नियम है बदलाव का।
 

यह नियम है निरंतरता का। यह दुनिया निरंतरता और बदलाव पर ही टिकी है। यहां सब कुछ बदल रहा है। आहिस्ता-आहिस्ता। यहां कुछ भी नहीं ठहरता है। न यह धरती। न समय। न शाम सवेरे। न जीवन। इस धरती पर सब कुछ बदल रहा है। अपने नियमों से बंधा हुआ। मद्धम-मद्धम सा। इस बदलाव को रोका नहीं जा सकता है।


यह जमीन पर बिखरे पत्ते, निरंतरता और बदलाव का एहसास कराते हैं। पुरानी चीजों की जगह नई चीजें ले लेती हैं। ऐसा ही होता है। हमेशा से.. और आगे हमेशा से ऐसा ही होता रहेगा। यह कभी नहीं बदलेगा। यह जो पत्ते झर रहे हैं न... हर साल ऐसा होता है। शरद ऋतु में यह पेड़ों से झर जाते हैं। धीरे-धीरे... एक-एक कर के।

हर पत्ते का एक जीवन चक्र होता है। वह चक्र पूरा होने के बाद वह अपना रूप बदलते हैं। - फोटो : pexel
पेड़ों से सभी पत्ते एक साथ नहीं गिरते हैं। वह कुछ-कुछ वक्फे के बाद गिरते रहते हैं। ऊंची चोटियों पर काफी ढेर सारे हरे पत्ते बचे रहते हैं। वह भी गिरते हैं। अपना वक्त पूरा करने के बाद वह भी विदा लेते हैं, क्योंकि विदा लेना एक नियम है। यह विदाई बहुत सकारात्मक है। यह एक पॉजिटिव सिस्टम है, ताकि पेड़ों का और अंततः हम सबका और दुनिया का जीवन सौंदर्य बरकरार रहे। पेड़ों की हरियाली कभी न खत्म हो। पेड़ों का जीवन हमेशा बचा रहे। वह बहारें लाते रहें। बंसत में मुस्कुराते रहें.... खिलखिलाते रहें... खुशियां बिखेरते रहें। ऑक्सीजन देते रहें।
 
हर पत्ते का एक जीवन चक्र होता है। वह चक्र पूरा होने के बाद वह अपना रूप बदलते हैं। हरे से धीरे धीरे पीले और लाल हो जाते हैं। या फिर नारंजी। फिर यह विदा हो जाते हैं अपनी शाखों से। जमीन पर बिखर कर यह उड़ेंगे। यहां वहां फिरेंगे। फिर यह एक बार और अपना रूप बदलेंगे।

यह धीरे धीरे खाद में तब्दील हो जाएंगे। अंत में उन्हीं पेड़ों की जड़ों में समा जाएंगे। फिर उन पेड़ों को नई ऊर्जा देंगे। इस तरह से इस धरती पर कुछ भी नष्ट नहीं होता है। कुछ भी खत्म नहीं होता है। बस सब कुछ अपना रूप बदलता है। इस रूप बदलने में भी एक निरंतरता है। समय का चक्र है... और यह चक्र पूरा करना ही होता है। सभी चीजों को।

पत्ते गिरने के बाद भी पेड़ों का जीवन बचा रहता है। धीरे-धीरे कुछ अंतराल के बाद, इन पेड़ों पर नई-नई हरी कचूर सी कोपलें आ जाएंगी। वह कोपलें धीरे-धीरे अपना आकार बदलती जाएंगी और पेड़ फिर से हरे भरे हो जाएंगे। और इन पत्तों के बीच नए फूल आएंगे। फिर यह फूल फल में तब्दील हो आएंगे।

इस तरह पुराने पत्तों की जगह नए पत्ते और फिर फल आते हैं। यह फल अपने अंदर बीज ले कर आते हैं... और हर बीज एक नया पेड़ पैदा करता है। इस तरह से एक नए जीवन का उदय होता है। यह फल तमाम तरह के पशु-पक्षियों को भोजन और जीवन देता है, इसलिए इन पत्तों का झरना जरूरी है। यह इसलिए झरते भी हैं। सदियों से ऐसा हो रहा है... और जब तक यह सूरज है... तब तक ऐसा होता रहेगा। हजारों-करोड़ों साल तक।
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शरद ऋतु से पहले गर्मी का मौसम होता है। गर्मी में पेड़ सूरज की किरणों की मदद से अपने लिए भोजन बनाते हैं। - फोटो : pexels
कभी इन पत्तों को उठा कर देखिए। यह बहुत शांत और संतुष्ट से नजर आते हैं। यह पेड़ों से जुदा होने के बाद भी अंत में उनके ही काम आते हैं। यही शायद इनकी खुशी भी है कि यह जुदा होकर भी उसमें ही समा जाते हैं। इन पत्तों के झरने के पीछे, जिंदगी का एक और खूबसूरत फलसफा और साइंस है। दरअसल यह पत्ते खुद झर कर पेड़ों को जीवन दान देते हैं।

शरद ऋतु से पहले गर्मी का मौसम होता है। गर्मी में पेड़ सूरज की किरणों की मदद से अपने लिए भोजन बनाते हैं। गर्मी का मौसम खत्म होने पर पेड़ों को अपने लिए भोजन बनाने में दिक्कत होती है, इसलिए वह भोजन को जमा कर के भी रखते हैं। जब शरद ऋतु आती है तो पेड़ों को गर्मी जैसी धूप नहीं मिल पाती है। नतीजे में वह संचय किया गया भोजन इस्तेमाल करने लगते हैं। 


इस दौरान पेड़ों का बहुत सारा पानी, पत्तों के छोटे छोटे छेदों से वाष्प की शक्ल में बाहर निकल जाता है। इस से पेड़ों का जमा पानी भी धीरे-धीरे खत्म होने लगता है। नतीजे में पेड़ उस जगह को ब्लॉक कर देते हैं, जहां से पत्तों को पानी जाता है। इस वजह से पत्तों को रसद यानी भोजन और पानी की कमी हो जाती है। फिर वह धीरे-धीरे पीले और लाल होने लगते हैं। फिर वह टूट कर नीचे गिर जाते हैं, लेकिन यह पत्ते झरने से पहले एक महान काम कर जाते हैं।

अपने हिस्से का खाना और पानी दे कर पेड़ों को जिंदा रहने की मदद कर जाते हैं। इस से पेड़ों का जीवन बचा रहता है। और उन में बसंत में फिर से नई कोपलें आ जाती हैं। वह धीरे धीरे हरे भरे हो जाते हैं। सब कुछ फिर से सुंदर और शांत हो जाता है।

 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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