उस वक्त हमारी मुलाकात के दौरान पंडित जी माधुरी दीक्षित के नृत्य की खूब तारीफ करते थे।
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क्लासिकल डांस को लेकर नई पीढ़ी और खासकर लड़कों की दिलचस्पी के बारे में पूछे गए एक सवाल पर पंडित जी ने कहा था-
लड़कों का रुझान नृत्य की तरफ खूब है। फिल्मी गीतों पर कितने लड़के थिरकते हैं, वेस्टर्न से लेकर ब्रेक डांस तक कितने लड़के करते हैं। जब आप ऐसे डांस कर सकते हैं तो फिर क्लासिकल क्यों नहीं। फिर यहां लड़का-लड़की का सवाल ही नहीं है। सोच का सवाल है। जो कला के पारखी लोग हैं, उन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता कि डांस करने वाला कौन है। कितने डांस रियलिटी शो आ गए हैं। ये तो बहुत अच्छी स्थिति है और मुझे तो बहुत उम्मीद है कि क्लासिकल डांस के लिए और अच्छा वक्त है, नई पीढ़ी इसे और बेहतर तरीके से अपनाएगी।
उस वक्त हमारी मुलाकात के दौरान पंडित जी माधुरी दीक्षित के नृत्य की खूब तारीफ करते थे। तबतक वो फिल्म देवदास का नृत्य निर्देशन कर चुके थे।
कहते थे-
‘माधुरी बेहद बारीकी से उनके हर भाव को पकड़ती थीं। ‘काहे छेड़ मोहे...’ जैसे मुश्किल गीत और डांस सीक्वेंस के दौरान माधुरी दीक्षित ने जिस तरह आंखों की भाव भंगिमाएं पकड़ीं, वो अद्भुत है।‘
बाद में पंडित जी ने बाजीराव मस्तानी के मशहूर गीत ‘मोहे रंग दो लाल’ के डांस सीक्वेंस में दीपिका पाडुकोण को नृत्य की बारीकियां बताईं और यह गीत भी जबरदस्त हिट हुआ। जाहिर है शास्त्रीय गीतों और नृत्य संरचनाओं का कोई तोड़ नहीं है और कितना भी वक्त गुज़र जाए, इन्हें हमेशा पसंद किया जाता रहेगा।
बहुत योगदान रहा पंडित जी का
पंडित जी के इस फिल्मी योगदान को अगर किनारे भी कर दें तो वो लगातार एक संस्था रहे। जगह-जगह उन्होंने नृत्य और हमारी शास्त्रीय परंपराओं के प्रति नई पीढ़ी को जागरूक करने की हर संभव कोशिश की। पद्म विभूषण, संगीत नाटक अकादमी जैसे पुरस्कारों की लंबी फेहरिस्त तो उनके साथ है ही, उनकी सहजता, सरलता और एकदम अपना सा हो जाना उनकी खासियत थी।
पंडित जी 83 साल के थे। कोरोना काल के पिछले दो सबसे खतरनाक सालों में बेशक उनकी सक्रियता उतनी नहीं थी और उनका ज्यादातर वक्त घर में ही कटता था। करीब एक महीने से उनकी तबीयत कुछ ठीक नहीं चल रही थी। दरअसल पंडित जी ने एक बार कहा था कि कलाकार के लिए काम, रियाज, मंच, दर्शक और लोगों के प्यार सम्मान से बड़ा कुछ नहीं।
जब तक वो सक्रिय है तब तक उसकी कला बरकरार है। बेशक इन दो सालों में पंडित जी शायद इस सक्रियता से मजबूरन दूर महसूस कर रहे थे। फिर भी वो अपने घर में ही अपनी आंखों से, भाव भंगिमाओं से बैठे बैठे ही रियाज करते रहते थे।
पंडित जी के बारे में तमाम लोगों ने अपने अपने अनुभव सोशल मीडिया पर साझा किए हैं, उनकी सरलता के तमाम किस्से बताए हैं। संगीत और संस्कृति के तमाम आयामों को बारीकी से समझने और लगातार इनके तमाम पहलुओं पर लिखने वाले यतीन्द्र मिश्र पंडित जी पर किताब लिख रहे थे। पिछले छह महीनों से लगातार पंडित जी के जीवन, संस्मरण, साधना और नृत्य के तमाम पक्षों को जमा कर रहे थे।
बेशक बीच में ही पंडित जी के छोड़ जाने की पीड़ा यतीन्द्र की भी है और उनके परिजनों की तो है ही। लेकिन उससे भी बड़ा शून्य नृत्य और संगीत की दुनिया के उन करोड़ों चाहने वालों के लिए है जिनके लिए पंडित बिरजू महाराज एक आइकॉन रहे हैं।
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