साल 1991 में जब राजीव गांधी की हत्या कर दी गई तो पत्रकार ने वाजपेयी से संपर्क किया। उन्होंने पत्रकार को अपने घर बुलाया और कहा कि अगर वह विपक्ष के नेता के नाते उनसे राजीव गांधी के खिलाफ कुछ सुनना चाहते हैं तो वह एक शब्द भी उनके खिलाफ नहीं कह सकते क्योंकि आज अगर वह जीवित है तो उनकी मदद कारण ही है।
वाजपेयी ने बेहद भावुक होकर यह किस्सा बयान किया था। उन्होंने कहा कि जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे तो उन्हें पता नहीं कैसे पता चल गया कि मेरी किडनी में समस्या है और इलाज के लिए मुझे विदेश जाना है। उन्होंने मुझे अपने दफ्तर में बुलाया और कहा कि वह मुझे संयुक्त राष्ट्र में न्यूयॉर्क जाने वाले भारत के प्रतिनिधिमंडल में शामिल कर रहे हैं और उम्मीद है कि इस अवसर का लाभ उठाकर आप अपना इलाज करा लेंगे। मैं न्यूयॉर्क गया और आज इसी वजह से मैं जीवित हूं।
फिर वाजपेयी बहुत भावविह्वल होकर बोले कि मैं विपक्ष का नेता हूं तो लोग उम्मीद करते हैं कि मैं विरोध में ही कुछ बोलूंगा। लेकिन ऐसा मैं नहीं करने वाला। मैं राजीव गांधी के बारे में वही कह सकता हूं जो उन्होंने मेरे लिए किया। आपको मंजूर है तो बताएं। नहीं तो मैं एक शब्द नहीं कहने वाला।
उनका राजनीतिक जीवन इतना सरल था कि विरोधी भी उनके सामने बोलने से पहले सोचते थे। लेकिन वाजपेयी के साथ कुछ काले अध्याय भी जुड़े हुए हैं, जिनसे न कभी वाजपेयी ने पर्दा उठाया और न उनके करीबियों ने उसका कभी जवाब दिया। और यह आरोप लगाने वाले कोई राजनीतिक व्यक्ति नहीं, बल्कि वाजपेयी के ही गांव के एक स्वतंत्रता सेनानी लीलाधर वाजपेयी उर्फ काकुआ थे।
बात 1942 की है जब भारत के लोग अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन चला रहे थे, तब अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने पैतृक गांव, आगरा के बाह तहसील के अंतर्गत बटेश्वर गांव के स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ अंग्रेजों का साथ देकर गवाही दी थी, जिसके बदले में लीलाधर वाजपेयी एवं अन्य एक सेनानी महुआ को 5-5 साल की सजा हुई तथा पूरे बटेश्वर गांव में 10 हजार रुपये जुर्माना भी लगाया गया। इस संदर्भ में दस्तावेजी सबूत अखबारों में भी प्रकाशित हो चुके हैं। आज यह काला अध्याय उसी संदेह के साथ समाप्त हो गया है।
उनके कृतित्व की बात करें तो अटल बिहारी वाजपेयी को कविता विरासत में मिली थी। उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी ग्वालियर रियासत में शिक्षक एवं कवि थे। उनकी कविताओं में कभी नाराजगी, हौसला और खुशी झलकती थी। जनता पार्टी जब बिखरी, तब उन्होंने 'गीत नहीं गाता हूं' कविता लिखी थी। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की स्थापना पर कविता लिखी - 'गीत नया गाता हूं'।
इस संबंध में अपने काव्य संग्रह 'मेरी इक्यावन कविताएं' में वाजपेयी ने लिखा है : कविता मुझे विरासत में मिली है। मेरे पिताजी पं. कृष्ण बिहारी वाजपेयी ग्वालियर रियासत के अपने जमाने के जाने-माने कवियों में थे। वह ब्रजभाषा व खड़ी बोली दोनों में लिखते थे। उनकी लिखी 'ईश्वर प्रार्थना' रियासत के सभी विद्यालयों में सामूहिक रूप से गाई जाती थी। उनके द्वारा रचित कवित्त और सवैया मुझे आज तक याद हैं।
स्वयं अटल बिहारी वाजपेयी मासिक पत्रिका 'राष्ट्रधर्म' के प्रथम संपादक रहे। साथ ही पांचजन्य, स्वदेश, वीर अर्जुन और कई अन्य समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए कार्य किया। 20 जनवरी, 1982 में 'तरुण भारत' की रजत जयंती पर उन्होंने ने कहा था, 'समाचार पत्र के ऊपर एक बड़ा राष्ट्रीय दायित्व है। भले हम समाचार पत्रों की गणना उद्योग में करें, कर्मचारियों के साथ न्याय करने की दृष्टि से आज यह आवश्यक भी होगा, लेकिन समाचार पत्र केवल उद्योग नहीं है, उससे भी कुछ अधिक है।'
महान व्यक्तित्व के धनी अटल बिहारी वाजपेयी, जिन्होंने हमेशा राजनीति की स्वच्छ परिभाषा गढ़ने की कोशिश की। अपने विरोधियों को जितना सम्मान उन्होंने दिया है, उतना ही सम्मान उन्होंने पाया भी है। आज ये शुचिता, ये स्वच्छता राजनीति से गायब है। कब नई पीढ़ी अपने पुराने नेताओं से सीखेगी। कब ये पीढ़ी एक दूसरे पर कीचड़ उछालने की बजाय स्वस्थ राजनीति करना शुरू करेगी।
शायद ऐसा ना हो क्योंकि अटल बिहारी वाजपेयी का कोई पर्याय नहीं हो सकता, उनके मार्ग पर चलना कठिन है, उन्होने कुर्सी से ज्यादा देशहित को तवज्जो दी है, अधिकांश समय विपक्ष में रहकर सरकार को सचेत करने की भूमिका का उन्होंने पूरी ईमानदारी से पालन किया है। आज रातोंरात राजनेताओं को पद चाहिए और इसके लिए वो किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।
धैर्य जो अटल बिहारी वाजपेयी ने दिखाया, उतना धैर्य किसी राजनेता के पास नहीं दिखता। इतना धैर्य, इतनी शुचिता, इतनी ईमानदारी और ऐसा व्यक्तित्व बनने के लिए बहुत बड़ा कलेजा चाहिए और वो किसी राजनेता के पास शायद नहीं है। मृत्यु शाश्वत है, सनातन है, अटल है, एक ध्रुव सत्य है। हार नहीं मानूंगा रार नहीं ठानूंगा का उद्घोषक, काल के कपाल पर लिखने व मिटाने वाला भी अपवाद नहीं। लेकिन कुछ शख्सियत ऐसी होती हैं, जो समय की रेत पर आपनी निशानियां छोड़ जाती हैं, वक्त के कैनवास पर एक ऐसी तस्वीर बना जाती हैं, जिन्हें सदियों याद किया जाता है। अटल बिहारी वाजपेयी काल के कपाल पर ऐसे ही एक अमिट हस्ताक्षर हैं।