लोकसभा और राज्यसभा दोनों जगह से पास हो चुका है 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम'
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इसी प्रकार एससी में 16 पुरूष सांसदों और सबसे कम नुकसान एसटी में होता, जहां केवल 3 तीन पुरुष सांसदों को ही अपनी सीट महिलाओं के लिए छोड़नी पड़ती। चूंकि सभी राजनीतिक दल पुरुष प्रधान ही हैं, इसलिए कम से कम इस चुनाव में उनके टिकट बचे रहने की पूरी संभावना है। राजनीतिक दुकान के हिसाब से यह राहत भी कम नहीं है।
दूसरा सवाल ओबीसी आरक्षण का है। यह अपने आप में जटिल सवाल है कि देश में उनकी कुल आबादी कितनी है। चूंकि 2011 की जनगणना पुरानी हो चुकी है, और नई जनगणना 2025 में संभावित है। इस जनगणना के बात पता चलेगा कि ओबीसी आबादी कितनी है और उसी हिसाब से सीटों परिसीमन होकर ओबीसी महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण होगा। इसमे समय लगेगा।
वैसे भी सरकार मनमर्जी से सीटों का आरक्षण तो कर नहीं सकती। करती तो भी उस पर धांधली का आरोप लगता। आखिर सीटों के आरक्षण का यह काम विधिवत, सर्वमान्य और प्रामाणिक तरीके से ही होगा। और जब तक महिला आरक्षण की यह प्रक्रिया पूरी होगी, तब तक सभी राजनीतिक दल अपनी भावी राजनीति और रणनीति आराम से तय कर सकेंगे। महिला आरक्षण बिल में एक बिंदु, जिस पर अभी बवाल मच सकता है, वो है महिला सीटों का रोटेशनल (चक्रानुक्रम) से सीटों का आरक्षण।
इसका अर्थ यह है कि जो सीट महिला के लिए एक बार आरक्षित हुई, वो अगली बार भी होगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है। इससे महिला नेतृत्व को आगे बढ़ाने की निरंतरता पर असर पड़ेगा। हालांकि स्थानीय निकाय चुनाव में अभी आरक्षण की यही प्रक्रिया है। यहां जनरल ओबीसी व महिला सीटों का आरक्षण लॉटरी से होता है।
एक और खतरा सांस दपति नामक असंवैधानिक संस्था का और मजबूत होने का है। निर्वाचित जनप्रतिनिधि के रूप में महिलाएं इस आंतरिक चुनौती का मुकाबला कैसे करती हैं, यह देखने की बात है।
कितना व्यवहारिक होगा यह बिल?
यूं भी महिला आरक्षण की बात करना और वास्तव में उतनी संख्या में महिलाओं को टिकट देने में जमीन-आसमान का फर्क है, क्योंकि राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं ज्यादा हावी होती हैं। ऐसे में कौन सांसद अपनी सीट छोड़ना चाहेगा। यानी इसको लेकर राजनीतिक दलों के भीतर घमासान मचना तय है।
सियासी पार्टियों के लिए सीटों को छोड़ना कितने जिगर का काम है, यह हम उस इंडिया गठबंधन में ही देख रहे हैं, जो नरेन्द्र मोदी और भाजपा को हराने के मुद्दे पर एकमत होने के बाद भी सहयोगी दलों के बीच सीटों के बंटवारे पर कोई फैसला नहीं कर पा रहा है।
अभी तक कोई ऐसा फार्मूला तैयार हुआ है, जो सभी दलों के राजनीतिक स्वार्थों और वैचारिक आग्रहों को साथ लेकर चले। खुद बीजेपी में भी महिला आरक्षण आसानी से नहीं होने वाला है। ऐसे में सभी राजनीतिक दलों में संभावित नए घमासान का बीजारोपण भी इस महिला आरक्षण ने कर दिया है।
इसका असर हमे जल्द ही दिखाई देगा। इसीलिए महिला आरक्षण को सिद्धांत रूप में स्वीकार करते हुए भी इस पर तत्काल अमल सुविचारित तरीके से टाला गया है, क्योंकि सभी राजनीतिक दल भीतर से यही चाहते थे। बावजूद इसके इस बिल का राजनीतिक, सामाजिक और लैंगिक समानता की दृष्टि से दीर्घकालिक महत्व है। वो ये कि भारतीय समाज अब महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने के लिए मानसिक रूप से तैयार है।
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