अफगानिस्तान में तालिबान: भारत बहुत सोच-समझकर कदम उठाएगा।
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भारतीय निवेश का क्या होगा?
भारत-अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण से लेकर उसकी संसद भवन के निर्माण में भी सहायता की और उसका उद्घाटन 2015 में हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया ये भारत-अफगान रिश्तो की ऊंचाई को दर्शाता है। जाहिर है जो पाकिस्तान को फूटी आंख नहीं सुहा रहा है इसलिए अमेरिकी सैनिकों के जाते ही वे तालिबानियों की सहायता में जुट गए हैं।
पाकिस्तान तालिबान की सहायता से भारत को परेशान करने का मंसूबा पाल रखा है इसलिए भारत का सतर्क होना स्वभाविक है। हाल ही में हुए एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में वहां के राष्ट्रपति ने यहां तक कहा कि पाकिस्तान सीधे तौर पर तालिबानियों का साथ दे रहे हैं और अफगानिस्तान की वर्तमान और स्थिरता में उसका पूरा हाथ है।
अफगानिस्तान के बिगड़ते हालात का एकमात्र कारण तालिबान का बढ़ता हुआ प्रभाव है और तालिबान की सहायता में पाकिस्तान का पूरा-पूरा हाथ होने के बावजूद वैश्विक शक्तियां और यूनाइटेड नेशन जैसी संस्थाओं का चुप्पी साधे रहना कई सवाल खड़े करता है और जो बात-बात पर मानवाधिकार और मानवता की बात करते थे उनका भी कोई अता-पता नहीं लग रहा है।
जाहिर है यह कहना कि हमें तालिबानियों से वार्ता करनी चाहिए यह जल्दीबाजी होगी पर अगर वार्ता करनी ही है तो सोच-समझकर करनी क्योंकि हम उन पर कभी भी पूरी तरीके से विश्वास नहीं कर सकते क्योंकि जिन तालिबानियों का पालन पोषण पाकिस्तान ने किया आज वही उसके लिए भी खतरा बने हैं।
भारत ने सही कहा है कि अफगानिस्तान का भविष्य पहले की तरह नहीं हो सकता। पिछले 40 सालों से अफगानिस्तान में उथल-पुथल चल रहा है जिसकी शुरुआत 1979 में सोवियत संघ की सेना का प्रवेश और वहां की राजनीतिक में हस्तक्षेप और वहां पर कम्युनिस्ट की सरकार बनाने से शुरुआत हुई है। वर्तमान की विषम परिस्थितियों को देखते हुए भारत कोई उचित कदम उठाएगा।
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