भारत की आजादी में गदर पार्टी की भूमिका:
यही पाओगे महशर में जबां मेरी बयां मेरा,
मैं बंदा हिन्द वालों का हूं, है हिन्दुसतां मेरा।
मैं हिंदी, ठेठ हिंदी, खून हिंदी, जात हिंदी हूं,
यही मजहब, यही फिरका, यही है खानदां मेरा।
तेरी खिदमत में ऐ भारत, यह सिर जाए, जां जाए,
तो समझूंगा, यह मरना हयाते जादवा मेरा।
कविता की ये पंक्तियां कर्तार सिंह सराभा की रचना है। एक तरह से गदर पार्टी के उद्देश्यों को इन पंक्तियों में व्यक्त कर दिया है। कर्तार सिंह सराभा को19 साल की उम्र में लाहौर षडयंत्र मामले में 16 नवम्बर 1915 को फांसी की सजा दी गई। उनके साथ जिन अन्य शहीदों को फांसी की सजा दी गई उनके नाम हैं-
बख्शीश सिंह (अमृतसर), हरनाम सिंह (स्यालकोट), जगत सिंह(लाहौर), सुरैण सिंह-1, सुरैण-2 (अमृतसर) और विष्णु गणेश पिंगले पूना (महाराष्ट्र) हैं।
गदर पार्टी का इतिहास शहीद क्रांतिकारी
15 जुलाई 1915 में अमेरिका के सैनफ्रांसिस्को नगर में गदर पार्टी की स्थापना हुई। सन् 1857 की क्रांति से प्रेरित ‘गदर’ से जुड़े क्रांतिकारियों का उदेश्य था भारत को ब्रिटिश हुकूमत से सशत्र विद्रोह के जरिए मुक्त करना। इस योजना के तहत 21 फरवरी 1915 को ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ विद्रोह की तारीख तय किया गया। पर कहा जाता है न कि घर का भेदी लंका ढ़ावे, यहीं अंजाम विद्रोह की इस योजना का हुआ। कृपाल सिंह नाम के पुलिस के भेदिए ने इस तारीख की सूचना पहले ही पुलिस को दे दी। इसकी भनक गदरी क्रांतिकारियों हो गई। इस वजह से विद्रोह की तारीख दो दिन पूर्व करना पड़ा।
इस तारीख की खबर भी कृपाल सिंह ने पुलिस को दी। पूर्व योजना के मुताबिक 15 फरवरी को गदर को अंजाम देने के लिए क्रांतिकारियों को अपने -अपने कार्य क्षेत्रों में रवाना होना था। बंगाल के अनुशीलन समिति से जुड़े क्रांतिकारी-रासबिहारी बोस और सचिन सान्याल भी गदर की योजना से न सिर्फ जुड़ चुके थे, बल्कि ‘गदर’ योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए हर तरह से मदद के साथ-साथ स्वयं भी प्राणपण से जुटे थे। रासबिहारी बोस ने यूपी और अंबाला का प्रबंध अपने हाथ में ले लिया। इस मोर्चे पर उन्होंने विष्णु गणेश पिंगले और सुच्चा सिंह को लगाया।
निधान सिंह और डॉक्टर मथुरा सिंह झेलम रावलपिंडी सरहद की ओर गए। गुरमुख सिंह ललितो और हरनाम सिंह होती मरदान और झेलम की ओर और मुला सिंह को लाहौर पर हमला करने की जिम्मेदारी तय हुई। फिरोजपुर केंद्र की जिम्मेदारी खुद कर्तार सिंह सराभा संभाल रहे थे। कृपाल सिंह (जिसे निधान की सिफारिश पर पार्टी में शामिल किया गया।) हालांकि शक के दायरे में पहले ही आ चुका था। फिर भी पता नहीं कैसे मियांमीर छावनी (लाहौर) की जिम्मेदारी उसे सौपीं गयी। निधान सिंह ने उसे लाहौर रेलवे स्टेशन पर घूमते देखा। लाहौर की मियांमीर छावनी इस गदर योजना के केंद्र में था। इस छावनी में सैनिकों से संपर्क आसान था। इस मकसद से ही रास बिहारी बोस ने गदर पार्टी का मुख्यालय अमृतसर से लाहौर किया।