नमामि गंगे अभियान के तहत गंगा में जलीय जंतुओं के संसार को संकट से उबारने की तैयारी की जा रही है। ‘जन, जल और जंतु’ के नारे को सूत्र वाक्य मानकर नमामि गंगे अभियान से जुड़े संस्थान जलीय जीवों की तादाद में सुधार की योजना पर अमल के लिए जोर-शोर से जुट गए हैं।
इसके तहत गंगा को उसके मूल स्वरूप में लाने की कोशिश होगी ताकि विलुप्त प्राय डॉल्फिन, कछुए व अन्य जलीय जंतुओं की संख्या में वृद्धि हो सके।
मुख्य जलधारा के दोनों ओर किनारों पर 15 से 20 मीटर तक घास लगाई जाएगी जिससे जमीन गीली रहे और गर्मी के मौसम में पानी की कमी से जूझ रहे जलस्रोत रिचार्ज होते रहें।
देहरादून और पश्चिम बंगाल को मिली जिम्मेदारी
अभियान के तहत गंगा में जलीय जंतुओं के संसार को संकट से उबारने की जिम्मेदारी देहरादून स्थित भारतीय वन्य जीव संस्थान, वन अनुसंधान संस्थान और पश्चिम बंगाल के फिशरीज इंस्टीट्यूट को दी गई है।
गंगा बेसिन के सर्वेक्षण के बाद ये संस्थान अपनी कार्ययोजना तैयार कर चुके हैं। केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने भी इन संस्थानों को मई तक काम में जुट जाने को कहा है। अपनी कार्ययोजना के तहत भारतीय वन्य जीव संस्थान पूरे गंगा बेसिन में जलीय जन्तुओं के वासस्थलों को चिह्नित करेगा ताकि पुनर्वास हो सके।
प्रजनन क्षमता की जांच करेगा संस्थान
संस्थान सभी जलीय जंतुओं की प्रजनन क्षमता की भी जांच करेगा। जलीय जंतुओं के उपचार के लिए गंगा तट के नजदीक बचाव एवं पुनर्वास केंद्र खोले जाएंगे। गंगा किनारे के गांवों में गंगा रक्षकों की भर्ती की जाएगी। जलीय जंतुओं की रक्षा के लिए जागरूकता अभियान चलाने की योजना है।
वहीं वन अनुसंधान संस्थान अपनी कार्ययोजना के तहत भौगोलिक स्थितियों के मुताबिक वनस्पतियां, जड़ी-बूटियां, देवदार और बांस लगाएगा। ये वनस्पतियां गंगा के पारिस्थितिक तंत्र को मजबूत करेंगी और कटान रोकेंगी।
गोमुख के नीचे ऊंचाई वाले इलाकों में देवदार लगाए जाएंगे। पश्चिम बंगाल का फिशरीज इंस्टीट्यूट अपनी कार्ययोजना के तहत गंगा से गायब हो रहीं महाशीर, डॉल्फिन सहित अन्य छोटी-बड़ी मछलियों के पुनर्वास की व्यवस्था करेगा।
गंगा में विलुप्त प्राय हो चुकी है डॉल्फिन
अब तक हुए सर्वेक्षणों के मुताबिक गंगा में डॉल्फिन विलुप्त होने के कगार पर हैं। गंगा के पानी को साफ रखने वाले माइक्रो आर्गेनिज्म की संख्या भी लगातार घट रही है। इससे गंगा में जलीय जंतुओं का संसार संकट में है।
गोमुख से गंगा सागर तक लगभग ढाई हजार किलोमीटर में जलीय जंतुओं के एक चौथाई से अधिक वासस्थल नष्ट हुए हैं। साथ ही इन जंतुओं की प्रजनन क्षमता भी घटी है।
प्रदूषण और अवैध खनन के कारण कछुओं की आबादी विलुप्त प्राय होने के कगार पर है। गंगा बेसिन से ऐसी वनस्पतियां भी गायब हुई हैं जो इसके परिस्थितिक तंत्र के लिए सहायक थीं। ये वनस्पतियां अब गंगा बेसिन से 30-35 किलोमीटर दूर हैं।
‘केंद्रीय जल संसाधन मंत्री के समक्ष संस्थानों द्वारा कार्ययोजना पेश की जा चुकी है। अब सभी संस्थान गंगा में जलीय जंतुओं के संसार को सुरक्षित करने की कार्ययोजना में जुट गए हैं। गंगा में प्रदूषण से जलीय जंतुओं के संसार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। युद्ध स्तर पर इसे ठीक करने के प्रयास किए जाएंगे।’
- डॉ. वीबी माथुर (निदेशक, भारतीय वन्य जीव संस्थान)