केजरीवाल सरकार के संसदीय सचिवों को लेकर भेजे गया बिल खारिज होने के बाद 21 विधायकों के अयोग्य होने का खतरा बढ़ गया है। मगर इसके दायरे में आने वाले विधायकों ने इसे मोदी सरकार की साजिश करार दिया है।
विधायकों का कहना है कि दूसरे राज्यों में भी संसदीय सचिव रहते है। विधायकों ने कहा कि हम विधायकों को जो सैलरी मिलती है उसके अतिरिक्त कोई लाभ सरकार से नहीं लेते है।
चांदनी चौक से विधायक और पर्यटन विभाग की संसदीय सचिव अलका लांबा ने कहा कि अगर कोई यह साबित कर दे की मैं विधायक की सैलरी के अलावा बतौर संसदीय सचिव कुछ और भत्ते का लाभ सरकार से ले रही हूं तो सजा काटने को तैयार हूं।
उन्होंने कहा कि यह सब आरोप सिर्फ दिल्ली सरकार को परेशान करने के लिए किया जा रहा है। मोदी सरकार ना खुद काम कर रही है ना ही आप की सरकार को काम करने दे रही है।
विधायक और परिवहन विभाग के संसदीय सचिव संजीव झा ने भी लाभ लेने के आरोपों को खारिज किया। उन्होंने कहा कि बतौर विधायक उन्हें जो सैलरी व भत्ते मिलते है उसी से वह सब काम करते है।
संसदीय सचिव होने का कोई लाभ उन्हें सरकार से नहीं मिलता है। गांधी नगर से विधायक अनिल वाजपेयी जो कि संसदीय सचिव भी है उन्होंने कहा कि यह सब केंद्र सरकार के इशारे पर हो रहा है। मोदी सरकार से दिल्ली सरकार की उपलब्धियां देखी नहीं जा रही है।
मोदी जी को सिर्फ दिल्ली के संदीय सचिव क्यों दिखते हैं: केजरीवाल
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दिल्ली सरकार में मंत्रियों के संसदीय सचिवों को लाभ के पद से बाहर रखने वाला बिल राष्ट्रपति से लौटाए जाने के बाद अरविंद केजरीवाल ने नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधा है।
केजरीवाल ने कहा है, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश प्रदेश समेत देश के कई राज्यों में संसदीय सचिव हैं लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी को सिर्फ दिल्ली के संसदीय सचिव दिखते हैं। सिर्फ इन्हे अयोग्य ठहराने में लगे हैं। क्योंकि मोदी जी को अब कांग्रेस से नहीं आम आदमी पार्टी से डर लगता है।
मुख्यमंत्री ने कहा है, मोदी जी कहते हैं सोनिया जी संसद नहीं चलने दे रही हैं क्योंकि वह लोकसभा चुनाव की हार नहीं पचा पा रही हैं। मैं कहता हूं मोदी जी दिल्ली के संसदीय सचिवों को आयोग्य करने केपीछे क्यों लगे हुए हैं। क्योंकि वह दिल्ली विस चुनाव में हुई हार को पचा नहीं पा रहे हैं इसलिए दिल्ली सरकार को काम नहीं करने दे रहे हैं।
अरविंद केजरीवाल से जब पूछा गया कि राष्ट्रपति ने बिल नामंजूर किया है तो फिर प्रधानमंत्री पर अरोप क्यों? इस पर केजरीवाल ने कहा है कि बिल को राष्ट्रपति की तरफ से लौटाया जाना तो एक बहाना है।
राष्ट्रपति किसी भी मामले में निर्णय नहीं लेते। फैसला गृह मंत्रालय से होता है। राष्ट्रपति तक तो शायद फाइल भी नहीं जाती होगी। राष्ट्रपति के नाम से काम होता है।
केजरीवाल ने कहा-पंजाब में 24 संसदीय सचिव हैं। पंजाब में संसदीय सचिवों को एक-एक लाख रुपये महीने, कार और बंगला मिलता है। हमारे विधायकों को एक धेला(कुछ नहीं) तक नहीं मिलता। लेकिन आयोग्य सिर्फ दिल्ली के संसदीय सचिव को ठहराने में लगे हैं।
पश्चिम बंगाल में संसदीय सचिव हैं। नागालैंड में 24 संसदीय सचिव, गुजरात व राजस्थान में 5-5 संसदीय सचिव हैं लेकिन इन्हें तो दिल्ली के संसदीय सचिव हटाने हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा, हमें लगा कई विधायक अपने क्षेत्र का काम देखते हुए अतिरिक्त जिम्मेदारी उठा सकते हैं इसलिए हमें इन्हें स्कूल, सड़क, अस्पताल, पर्यटन, बिजली की जिम्मेदारी दे दी।
अधिसूचना में साफ लिखा हुआ है कि इन्हें कोई सुविधा या भत्ता नहीं मिलेगा। अगर फ्री में विधायक ये सब काम देख रहा है तो मोदी जी को क्या तकलीफ है? हमारा विधायक प्रवीण देशमुख स्कूल का दौरा करने सुबह निकल जाता है।
कहीं गड़बड़ी मिलती है तो मनीष को बताता है। रेड के पहले का हमिवर्क करता है। राजेश गुप्ता केपास अस्पतालों की जिम्मेदारी है, रात को दो बजे तक जगकर गरीब मरीजों को अस्पताल में भर्ती करता है। इसमें क्या गड़बड़ है? मोदी जी इन्हें अयोग्य करने में लगे हुए हैं। इन सबको घर बैठा देने में मोदी जी को क्या मिलेगा?
उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने दिल्ली सरकार की तरफ से दिल्ली विस में पास करके 13 मार्च, 2015 को बनाए गए 21 संसदीय सचिवों को लाभ के पद से फरवरी, 2015 से बाहर रखने वाला बिल पास करकेजून में उपराज्यपाल के माध्यम से राष्टïरपति को भेजा था।
क्योंकि दिल्ली अभी तक दिल्ली में मुख्यमंत्री के संसदीय सचिव को ही लाभ के पद से बाहर रखा गया है। ऐसे में इन 21 विधायकों की सदस्यता खत्म करने की एक याचिका दाखिल हुई। जिस पर राष्ट्रपति की तरफ से चुनाव आयोग से जबाव मांगे जाने पर चुनाव आयोग ने सभी 21 विधायकों से जबाव मांगा हुआ है।